रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)
Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan
महाकवि केशवदास द्वारा
प्रथम एवं द्वितीय प्रभाव: मंगलाचरण, रस-स्वरूप एवं शृंगार भेद
आचार्य केशवदास कृत
रसिकप्रिया
का
प्रियाप्रसाद तिलक
‘स्वारथ परमारथ लहै रसिकप्रिया की प्रीति’
टीकाकार
विश्वनाथप्रसाद मिश्र
!
In line 13, does that letter have a notch on the left?
Wait, look at:
Wait, could it be 'पा'?
Wait, look at the letter after 'खि':
Is it 'या'? "साखियादेवी"?
Wait, is there a "साखिया देवी" or "साखियादेवी"?
Wait, what about "डाकियादेवी"?
Wait, what if the first letter is NOT 'स'?
Could it be 'म'?
"माखियादेवी"?
What if the first letter is 'ज'?
"जाखियादेवी"?
What if the first letter is 'ग'?
"गांगियादेवी"?
Wait! What about "गोविन्द"? No.
Wait, let's look at the first letter again.
Could it be:
'स' + 'ा' = 'सा'
'क' + '्' + 'ष' + 'ि' = 'क्षि'?
Wait! Look at 'क्षि':
How is 'क्षि' printed in old Hindi typesets?
In old Hindi typesets, 'क्ष' is a ligature of 'क' and 'ष'.
Sometimes it is written as 'क्' attached to 'ष', or as the special character 'क्ष'.
Wait, in 'क्ष', there is a vertical line on the right, and the left side has a loop at top and a loop at bottom with a tail.
Under 'ि', the matra comes down to the left of the whole
प्रस्तावना
आचार्य केशवदास
केशवदास का प्राचीन काल में काव्यजगत् में क्या माहात्म्य था इसकी
कल्पना आज नहीं की जा सकती । इस युग में भी उनका जैसा मान पहले था
वैसा अब नहीं रहा । केशव को अपदस्थ करने में मलिक मुहम्मद जायसी
हेतु हुए । मध्यकाल में केशव और बिहारी का काव्य-प्रवाह में जैसा मान था
वैसा जायसी और कबीर का नहीं । कबीर का नाम तो प्रवाह में सुना भी
जाता था, पर जायसी का कोई नामलेवा तक न था । भारतेंदु-युग के अंत में
उनकी पदमावत चंद्रप्रभा प्रेस से छपी थी । महामहोपाध्याय सुधाकर द्विवेदी
ने जैसा उसका संस्करण निकलवाया उसका कहना ही क्या । फिर लाला
भगवानदीनजी का पदमावत का पूर्वार्ध हिंदी-साहित्य-संमेलन से निकला,
पंडित रामचंद्रजी शुक्ल की जायसी-ग्रंथावली सामने आई, शेरिफ ने उनकी
कृति का संस्कार किया, माताप्रसादजी की वैज्ञानिक प्रणाली से संपादित
स्थूलकाय जायसी-ग्रंथावली दिखाई पड़ी और डा० वासुदेवशरण अग्रवाल ने
पदमावत पर महाभाष्य ही लिख डाला ।
केशव की रचना की पढ़ाई पहले सर्वत्र होती थी । धीरे धीरे वे हटाए गए ।
यह उन केशवदास की स्थिति है जिनकी कृतियों पर प्राचीन युग में सूरति मिश्र
ऐसे पंडित और सरदार कवि ऐसे कवि-सरदार ने टीकाएँ लिखी थीं। जायसी
पर टीका-टिप्पणी की बात ही पृथक् है, उनकी पदमावत के नागरी में हस्तलेख
ही कितने थे । कोई काव्य-संसार में उन्हें पढ़ता होता तब न !
हिंदी में भारी गड्डुलिका-प्रवाह है। केशव के दोषों की चर्चा, उनकी कड़ी
आलोचना क्या कर दी गई लोगों ने समझ लिया कि केशव बेकार हैं, हटाओ
इन्हें । 'हटाओ' में उनके काव्य की कठिनाई भी हेतु है । जिन शुक्लजी ने
केशव की कड़ी आलोचना की उन्होंने उन्हें पढ़ाई में बराबर बनाए रखा ।
रामचंद्रचंद्रिका हिंदी में संस्कृत-परंपरा के महाकाव्यों के प्रतिनिधि-रूप में
उन्हें स्वीकार थी । उस परंपरा के ग्रंथरूप में उसका महत्व उन्हें मान्य था ।
इधर केशव के संबंध में जितने प्रयत्न हुए उनसे भी उनकी उपेक्षा का परिहार
नहीं हुआ । 'केशव की काव्यकला' श्रीकृष्णशंकर शुक्ल ने लिखी, 'केशवदास'
स्वर्गीय पं० चंद्रबली पांडे ने प्रस्तुत किया । श्रीहीरालाल दीक्षित ने 'आचार्य
केशवदास' पर पूरा प्रबंध ही लिख डाला । सर्वश्री किरणचंद्र शर्मा, विजयपाल
( ४ )
सिंह तथा प्रयाग से दो-एक सज्जन उनकी रचनाओं में अनुसंधान करके डाक्टर
हो गए । हिंदुस्तानी अकादमी ( प्रयाग ) से केशव-ग्रंथावली अब निकली है ।
जायसी पर विस्तृत आलोचना पहले लिखी गई, जायसी-ग्रंथावली पहले निकली
केशव-ग्रंथावली पिछड़ गई ।
यही नहीं केशव को ‘हिंदी-नवरत्न’ में जो स्थान मिला वह भी उनके
अनुरूप उस समय बहुतों को नहीं लगा था । अब तो केशव पर अधिक ध्यान
देने की आवश्यकता का भरपूर अनुभव करना ही त्याग दिया गया है । उनके
संबंध में प्राय: ये उद्धरण दिखाई देते हैं—
कठिन काव्य के प्रेत ।
कबि को दीन न चहै बिदाई । पूछै केशव की कबिताई ।
उड़गन केसवदास ।
‘केसव अर्थ गंभीर को’ की चर्चा अब कोई नहीं करता । ‘प्रेत’ शब्द
का क्या प्रासंगिक अर्थ है ? केशव के संबंध में प्रचलित किंवदंती का स्मरण
कीजिए । कहते हैं कि जो सुख-भोग केशव और उनकी मंडली तुंगारण्य के
बीच ओड़छे में कर रही थी वह परलोक में भी खंडित न हो इस विचार से
उन्होंने प्रेत-यज्ञ कराया । सबके सब प्रेत हो गए । केशव प्रेतयोनि में जिस कष्ट
का अनुभव कर रहे थे उसे उन्होंने तुलसीदास से निवेदित किया और उनके
आदेशानुसार अपनी रामचंद्रचंद्रिका का पाठ कर मुक्त हुए । औरों की मुक्ति के
संबंध में किंवदंती मौन है । बस, केशव ‘कठिन काव्य के प्रेत’ हो गए । ‘एक
भए प्रेत एक मींजि मारे हाथी हैं’ में भी यही जनश्रुति मुखर है । इसका अर्थ
यही है कि केशव का काव्य कठिन है । कठिन काव्य पहले समझ में आए
तब न ! बस, ‘कबि को दीन न चहै विदाई, पूछै केसव की कबिताई’ । केशव
के कठिन काव्य को पहले स्मरण कौन करे और स्मरण करे भी तो जो
सुनेगा उसे पहले अर्थ लगेगा तभी तो कार्य सधेगा । कवि अर्थात् भाट कविताई
सुना देगा, वह कोई टीकाकार या महाभाष्यकार तो है नहीं कि उसका अर्थ
भी श्रोता को बतलाए । अर्थ लगता नहीं तो अर्थ हाथ कैसे लगे । इस कठिनाई
का अर्थ यह भी लगाया जाने लगा कि उनकी कविता में ‘रस’ नहीं. ‘सहृदयता’
नहीं । आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने उन्हें हृदयहीन क्या लिख दिया, वे बेचारे
रसिकों, सहृदयों, कवियों सबकी मंडली से खारिज किए जाने लगे । केशव
परंपरा से इतने अभिभूत थे कि वे अपने हृदय का उपयोग उस अवसर पर
नहीं कर पाते थे जिस अवसर पर शुक्लजी के विचार से हृदय का योग अनि-
वार्य रूप से होना चाहिए । प्रकृति के प्रति उनके हृदय में वह राग नहीं था जो
होना कवि के लिए अपेक्षित है । पर यह तो हिंदी के सभी कवियों के लिए है ।
( ५ )
केवल केशव ही प्रकृति से उदासीन नहीं, सारा मध्यकालीन काव्य उदासीन है।
एक प्राध्यापक से, जो केशव की रामचंद्रचंद्रिका पढ़ाते थे, महामना
मालवीयजी ने पूछा कि आजकल क्या पढ़ाते हो। उन्होंने तुरंत सोत्साह उत्तर
दिया-केशवदास की रामचंद्रिका। फिर पृच्छा हुई- केशव की कोई रचना तो
सुनाओ । प्राध्यापक मौन । केशव की कविता भी स्मरण रखनी चाहिए इसका
ध्यान प्राध्यापक को नहीं था । अर्थ लगाने में सहायक थी स्वर्गीय लाला भग-
वानदीनजी की केशव-कौमुदी टीका । अत्र तत्र सर्वत्र । रामचंद्रचंद्रिका के छंद
प्राचीनों ने तो कुछ कंठाग्र भी किए, रामलीला में संवादों के बीच अब भी वे सुनाई
पड़ते हैं। नवीनों को, पढ़ने-पढ़ानेवाले शिक्षितों-सुशिक्षितों को इसकी आवश्यकता !
बेचारे परीक्षार्थी अवश्य ही कुछ अंश, कभी पूरा पद्य और कभी पद-पदांश मात्र
परीक्षा के त्रास से मुखाग्र-कंठाग्र कर लिया करते थे । प्राध्यापक इस बखेड़े से
बरी । यह उन केशव की रचना की कथा है जिन्होंने कभी अकबर के यह पूछने
पर कि युग का सबसे उत्तम कवि कौन है, उत्तर दिया था- मैं । सूरदास और
तुलसीदास को भक्तों की मंडली में बिठाया था । इस विस्मरण या अस्मरण
का हेतु है केशव के काव्य का काठिन्य । केशव की कुत्सा काव्य-पांडित्य के
स्खलन के कारण नहीं थी । मध्यकाल में किसी के पांडित्य या विदग्धता की
जाँच की कसौटी थी केशव की कविता । उन्हें धीरे धीरे बहुत भुला दिया
गया । ये केशव जिस प्रदेश में हुए थे वही ब्रजी का प्रदेश था । वह ब्रजी के
काव्य-वाङ्मय का केंद्र था । 'वे बुंदेली के कवि थे' कहना उनका मान कम
करना है । ब्रजी के कवियों का भारी जमघट उसी अंचल में था । मुगल
सम्राटों का निवास दिल्ली में नहीं आगरे के पास था । दिल्ली से रसखानि
भी भागकर वृंदावन आ बसे । घनानंद ने भी दिल्ली छोड़ी, वृंदावन
आए । जिस भू-भाग पर केशव ( उड़गन ही होकर सही ) चमक रहे थे
वही ब्रजी का आरंभिक भूभाग था । भाषाकाव्य-निर्माण का स्रोत वहीं से
फूटा है । उस अंचल में जैसे जैसे प्राचीन कवि हुए हैं और उन्होंने जैसी जैसी
रचनाएँ की हैं उनमें से बहुतों का पता तक हिंदी के महंतों को नहीं है ।
नैषध का हिंदी में उल्था करनेवाले गुमान ने केशव की रामचंद्रचंद्रिका के
जोड़-तोड़ में कृष्णचंद्रिका लिखी । यह कृष्णचंद्रिका यदि हिंदी के आलोचकों
ने देख ली होती तो पता चलता कि हिंदी में ऐसे प्रबंध भी लिखे गए हैं ।
इनके भाई खुमान ने कृष्णायन लिखा है रामायण के जोड़तोड़ पर, जो अभी
तक अप्रकाशित है । समझा यह जाता है कि श्रीद्वारकाप्रसाद मिश्र ने
कदाचित् सबसे पहले इस नाम की कल्पना की और कृष्ण पर रामायण के
ढंग का काव्य लिखा । उस कविधरा भूमि में अनेक सरस कवि हुए । उन
( ६ )
सबके नगड़दादा थे केशवदास, जिनका लोहा सभी मानते थे, जिनकी रचना
का अध्ययन निरंतर होता रहा ।
उस भूभाग के कवियों की विशेषता रही है कि वे सब प्रकार का काव्य-
चमत्कार दिखा सकने की शक्ति रखते थे । केशव के पूर्व जिस प्रकार का प्रवाह
था सबका नमूना उन्होंने प्रस्तुत कर दिया है । उन्होंने रामचंद्रचंद्रिका के
अतिरिक्त प्रशस्तिकाव्य भी कई लिखे हैं—वीरचरित्र, रतनबावनी और जहाँ-
गीरजसचन्द्रिका । संस्कृत के प्रबोधचंद्रोदय का पद्यबद्ध भाषानुवाद 'विज्ञानगीता'
के रूप में है, जिसमें अपनी ओर से भी बहुत सी सामग्री पौराणिक वृत्ति वाले
पंडित कवि ने जोड़ रखी है । इस भूभाग का कवि बहुश्रुत होता था । अनेक
काव्यों और शास्त्रों का पहले अध्ययन करना, फिर उस निपुणता से अपने काव्य
का उपबृंहण । प्राचीन काव्य और शास्त्र संस्कृत के भी पढ़े जाते थे और फल-
स्वरूप उनसे प्रभावित होना स्वाभाविक था । संस्कृत का आग्रह इनमें होता
ही था । शौरसेनी की प्रकृति भी तो संस्कृत ही मानी जाती है । इसलिए
संस्कृत के शब्दों और प्रयोगों का ग्रहण इनमें सहज था । केशव 'देवता' को
स्त्रीलिंग ही लिखते रहे, देह को पुंलिंग । संस्कृत के उन शब्दों का भी प्रयोग
'भाखा' में करते रहे जो भाखावालों के लिए दुरूह हैं । यह ब्रजी की प्रवृत्ति
थी, केशव की—जिनके कुल के दास 'भाखा' बोलना नहीं जानते थे—
व्यक्तिगत प्रवृत्ति मात्र नहीं थी । इस भूभाग में सांप्रदायिक आग्रह नहीं रहा,
साहित्य ही उन्हें सांप्रदायिकता से नहीं पृथक् करता रहा, उनमें ऐसी
उदारता, हृदय की विशालता जन्मभूमि साहित्यभूमि भी लाती रही । रीति
का आग्रह करनेवाले भी यहाँ थे, उससे स्वच्छंद रहनेवाले भी यहाँ थे । केशव
निंबार्क-संप्रदाय में 'दीक्षित थे । उन्होंने रसिकप्रिया में प्रियाजू की प्रशस्ति
लिखी । पर रामचंद्रचंद्रिका भी लिखी ।
कर्तृत्व
केशवदास ने लक्षण-ग्रंथ ही नहीं, लक्ष्य-ग्रंथ भी लिखे हैं । शृंगार की ही
नहीं, अन्य रसों की भी रचनाएँ की हैं । मुक्तक ही नहीं, प्रबंध भी प्रणीत
किए हैं । इनके ग्रंथ ये हैं—रसिकप्रिया, कविप्रिया, नखशिख, शिखनख,
बारहमासा, छंदमाला, रामचंद्रचंद्रिका, रतनबावनी, वीरचरित्र, जहाँगीरजस-
चंद्रिका और विज्ञानगीता । वीरचरित्र और रतनबावनी में वीररसपूर्ण
रचनाएँ हैं । वीरचरित्र या वीरसिंहदेवचरित्र प्रबंधकाव्य है, किंतु प्रबंध के
गुण पूर्ण मात्रा में इसमें नहीं पाए जाते । जहाँगीरजसचन्द्रिका प्रशस्तिकाव्य
है । इनके प्रसिद्ध महाकाव्य रामचंद्रचंद्रिका में भी प्रबंधत्व परिपूर्ण नहीं ।
( ७ )
प्रबंध के लिए कथा का क्रमबद्ध रूप और अवसर के अनुकूल विस्तार-सकोच
अपेक्षित होता है । रामचंद्रचंद्रिका में इसका ध्यान नहीं रखा गया है । केशव-
दास वस्तुतः दरबारी जीव थे । इसी से जितनी बातें दरबार के अनुकूल थीं
उन्हीं का वर्णन विस्तार से इन्होंने किया । पांडित्य का प्रदर्शन भी इनमें
प्रधान था जो रामचंद्रचंद्रिका में स्थान स्थान पर लक्षित होता है । शास्त्र-
स्थितिसंपादन की इच्छा इनमें प्रबल थी ।
महाकाव्य वर्णन-प्रधान भी होता है । किंतु इसका यह तात्पर्य नहीं कि
वर्णनों पर ही दृष्टि रखकर कर्ता चले और वर्ण्य विषयों का ठीक ठीक
निरूपण न करे या वर्णनों के लिए कथा की क्रमबद्धता का त्याग कर दे ।
संस्कृत में पिछले खेवे का प्रबंधकाव्य श्रीहर्ष का 'नैषधचरित' है । उसमें कथा-
भाग बहुत कम है । इसी से वर्णन प्रधान दिखाई देता है । किंतु श्रीहर्ष ने
वर्ण्य विषयों के साथ तादात्म्य की प्रतीति खोई नहीं । कवि का निरूपण
इतना सूक्ष्म और व्यापक है कि उन वर्णनों का पढ़नेवाला उनसे ऊबता नहीं ।
किंतु केशव के वर्णन वैसे मार्मिक नहीं हुए हैं । सच बात तो यह है कि ये
चमत्कारवादी कवि थे । स्थान स्थान पर चमत्कार दिखलाना ही इनका
लक्ष्य था । चमक-दमक के चक्कर में अधिक रहने से ही प्रबंधकाव्य के अन्य
आवश्यक गुणों का ध्यान इन्हें विशेष नहीं था । अतः यह कहने में कोई
संकोच नहीं कि केशव में भाव-पक्ष प्रधान नहीं । रचना में कलापक्ष की
प्रधानता इनकी व्यक्तिगत अभिरुचि मात्र नहीं थी । ये संस्कृत के पंडित थे ।
इन्होंने जिन जिन ग्रंथों को आदर्श बनाया वे चमत्कारपूर्ण उक्तियों से लदे
हुए थे । उत्प्रेक्षा, श्लेष, विरोधाभास, परिसंख्या आदि अलंकारों की जैसी
भरमार रामचंद्रचंद्रिका में दिखाई पड़ती है वैसी उसके आदर्शग्रंथ बाण की
'कादंबरी' में भी । अंतर इतना ही है कि कादंबरीकार ने जिन जिन
दृश्यों, स्थानों आदि का वर्णन किया है उनकी विशेषताओं का ध्यान भी
बराबर रखा है, पर इन्होंने चमत्कार के फेर में उनका ध्यान बहुधा छोड़
दिया है । इसके अतिरिक्त प्रबंध के बीच अनावश्यक उपदेशात्मक प्रसंगों का
जोड़ना ठीक नहीं जान पड़ता । पर ये इससे कहीं भी विरत नहीं हुए, यहाँ
तक कि संस्कृत के 'प्रबोधचंद्रोदय' नाटक का आधार लेकर जो 'विज्ञानगीता'
लिखी उसमें भी इस प्रकार के कई प्रसंग जोड़ दिए ।
ऐसा होते हुए भी रामचंद्रचंद्रिका में एक गुण विशेष ध्यान देने योग्य है।
वह है संवादों का उपयुक्त विधान । इन्होंने संस्कृत के कई ऐसे नाटक देखे थे
जो रामाख्यान पर थे । फल यह हुआ कि रामचंद्रचंद्रिका में संवादों की इन्होंने
बहुत ही अच्छी योजना की । कई प्रसंग तो अनुवाद करके ही रखे हुए हैं ।
( ८ )
नाटकों का आधार लेने से और कथाभाग को छोड़ देने से संवाद के वक्ताओं
के नाम इन्हें पद्य से पृथक् रखने पड़े हैं। इनमें भी ध्यान देने योग्य संवाद
राजनीतिक प्रसंग के ही हैं। कुछ पात्रों का चरित्र भी इन्होंने विशेष रूप में
लक्षित कराया है। उत्तरार्ध में लवकुश की उक्तियाँ विशेष मार्मिक बन पड़ी
हैं। पर ऐसे प्रसंग इतने बड़े काव्य में थोड़े ही दिखाई देते हैं। शैली देखते
हैं तो उसमें भी विविध प्रकार के छंदों के उदाहरण प्रस्तुत करने की प्रवृत्ति
है। प्रबंधकाव्य में धारा चला करती है। इस धारा को बनाए रखने में छंद
भी सहायक होते हैं। यही कारण था कि कवि लोग एक सर्ग में प्रायः एक ही
छंद का प्रयोग करते थे। केवल अंत में मोड़ की सूचना के लिए दो-चार छंद
बदल दिए जाते थे। किंतु रामचंद्रचंद्रिका में छंदों का परिवर्तन इतना
शीघ्र और इतने अधिक रूपों में किया गया है कि एकरसता आ ही नहीं
पाती। अतः प्रबंधकाव्य के विचार से रामचंद्रचंद्रिका समर्थ रचना नहीं
दिखाई देती। कथाक्रम यथावश्यक न होने से वह मुक्तक उक्तियों का संग्रह-ग्रंथ
जान पड़ती है।
लक्ष्य-ग्रंथों को छोड़कर लक्षण-ग्रंथों की ओर देखते हैं तो वहाँ भी पूर्ण
अवधानता नहीं दिखाई पड़ती। इन्होंने काव्यकल्पलतावृत्ति, काव्यादर्श आदि
के अनुगमन पर 'कविप्रिया' नाम से कविशिक्षा की एक अच्छी पुस्तक प्रस्तुत
की। किंतु उसमें भी कोई अपनी सूझ नहीं। उलटे अलंकार ( विशेष ) के
निरूपण में उलटी-सीधी बातें भी आ गई हैं। कविप्रिया से यह अवश्य हुआ
कि निरीक्षण की शक्ति न रखनेवालों या उससे भागनेवालों के लिए भी
काव्यपरंपरा का ज्ञान सुलभ हो गया। कवि केवल पुस्तक पढ़कर ही काव्य-
रचना में प्रवृत्त होने लगे, उन्होंने स्वतः निरीक्षण करना छोड़ ही दिया।
दक्षिणापथ के वर्णन में उत्तरापथ के वृक्षों की उद्धरणी या उत्तरापथ के वर्णन
में दक्षिणापथ के वृक्षों की नामावली अथवा मथुरा में मेवे के पौधे केशव की ही
जमाई हुई परिपाटी का परिणाम है। कविप्रिया के ही अंतर्गत पहले नखशिख,
शिखनख और बारहमासा थे, पर आगे चलकर ये पृथक् प्रचारित किए गए।
यह हो सकता है कि इनका निर्माण कविप्रिया से पहले ही हो गया हो और
उसकी रूपरेखा बनाते समय इन सबका या किसी का समावेश किया गया हो।
आरंभ में इसी से इनका निर्देश पृथक् कृति के रूप में ही किया गया है।
नखशिख देवी-देवताओं या अवतारों के रूपवर्णन के लिए और शिखनख नर-
नारी के रूपवर्णन के लिए होता है। बारहमासा वियोगवर्णन से संबद्ध है और
लोकगीतों के प्रवाह से साहित्य में आया है।
( ६ )
'रसिकप्रिया' में इन्होंने नायिकाभेद और थोड़ा सा रसों का भी परिचय दिया
है । किंतु इसमें श्रृंगार की रसनायकता विलक्षण ढंग से प्रमाणित की गई है ।
इन्होंने संस्कृत की ही सारी सामग्री ली है। जहाँ कहीं अपनी ओर से कुछ करने
का हौसला दिखलाया है वहीं इन्हें धोखा हुआ है। संस्कृत की पूरी सामग्री भी
ठीक ठीक नहीं ली जा सकी। हाँ, 'रसिकप्रिया' को देखते हुए मानना पड़ता है
कि केशव में प्रसंग-कल्पना की शक्ति थी अवश्य । काव्यभाषा से भी ये भली
भाँति परिचित थे। रसिकप्रिया की पद्धति पर ही यदि इनकी सारी रचनाएँ होतीं
तो भी ये 'कठिनकाव्य के प्रेत' होने से बच जाते । सच बात तो यह है कि
कुछ कारणों से इन्हें महाकाव्य लिखने का उत्साह हुआ । इस धारा में पाठक
को मग्न करने के विचार से नहीं, पांडित्य-प्रदर्शन के विचार से । इसीलिए
रामचंद्रचंद्रिका की रचना बेढंगी हो गई । शब्द भी इन्होंने संस्कृत के कुछ
अधिक रखे और कहीं कहीं अप्रचलित तक । ये कहते भी तो थे—
भाषा बोलि न जानहीं जिनके कुल के दास ।
भाषा-कबि भो मंदमति तेहि कुल केसवदास ॥—कविप्रिया
केशवदास का उद्देश्य संस्कृत की साहित्य-परंपरा की हिंदी में प्रतिष्ठा
थी । यही इन्होंने किया ।
रचना के आधार
केशव जब हिंदी में ग्रंथ प्रस्तुत करने लगे तब इनके नेत्रों में संस्कृत के
ग्रंथ नाच रहे थे । इसी से इनके अधिकतर ग्रंथ संस्कृत को ही आधार बनाकर
खड़े हुए । इनके प्रशस्ति-काव्यों में पांडित्य संस्कृत का अवश्य झलकता है पर
सीधे संस्कृत-ग्रंथों के आधार पर उनका निर्माण नहीं है । रतनबावनी में तो
वह झलक भी नहीं है। इसका कारण यही है कि वह इनकी आरंभिक रचना
है । उस समय इन्होंने आचार्यत्व का बाना नहीं धारण किया था। जब से
इन्होंने आचार्य का आसन ग्रहण किया तब से इन्हें संस्कृत की शास्त्रीय पद्धति
को हिंदी में प्रचलित करने की चिंता हुई । उसे इन्होंने जीवन के अंत तक
नहीं छोड़ा । रामचंद्रचंद्रिका के देखने से जान पड़ता है, मानो ये किसी को
पिंगल की पद्धति सिखला रहे हों । पुस्तक के आरंभ से ही इसका आभास
मिलने लगता है । एक वर्ण के छंद से क्रमशः कई वर्णों के छंदों तक वर्णन
चला चलता है। आगे चलकर वर्णवृत्तों के विभिन्न रूपों का भी कम विस्तार
नहीं है । केशव ने इतने अधिक और ऐसे ऐसे वर्णवृत्तों का प्रयोग किया है जो
पिंगल के प्रस्तार से ही जाने जा सकते हैं; साधारणतः जिनका प्रयोग नहीं
होता । 'रामचंद्रचंद्रिका' में 'प्रसन्नराघव', 'हनुमन्नाटक', 'कादंबरी' आदि कई
ग्रंथों की छाया है, कितने अंश तो कोरे अनुवाद ही हैं।
( १० )
'कविप्रिया' कविशिक्षा की पुस्तक है, इसमें संस्कृत के अलंकार-संप्रदाय-
वाले आचार्यों का अनुगमन है। इसके मुख्य आधार-ग्रंथ हैं—कविकल्पलतावृत्ति
और काव्यादर्श । आरंभ में अंधबधिरादि दोष डिंगल के काव्यप्रवाह से ले
लिए गए हैं । बारहमासा लोकप्रवाह से आया है और नखशिख की परंपरा
फारसी की है । यद्यपि केशव के पूर्व संस्कृत में ध्वनि की स्थापना भली भाँति
हो चुकी थी तथापि इन्होंने अलंकार की पुरानी धारणा को ही प्रधानता दी ।
इन्होंने 'अलंकार' शब्द को उसी व्यापक अर्थ में ग्रहण किया है जिसमें उसको
दंडी, वामन आदि प्राचीन आचार्यों ने लिया है । इसी से पारिभाषिक अर्थ के
अनुसार 'विशेषालंकार' के अतिरिक्त इन्होंने 'सामान्यालंकार' के अंतर्गत काव्य
की शोभा बढ़ानेवाली सभी सामग्री जुटा दी है । इनके दूसरे लक्षण-
ग्रंथ 'रसिकप्रिया' में संस्कृत के तद्विषयक बहुप्रचलित ग्रंथों से कुछ भिन्नता
है । पर इसका यह अर्थ नहीं कि केशव ने इसमें कोई नई बात लिखी है ।
इन्होंने नायिकाभेद का सूक्ष्म तत्त्व न समझकर इसमें कुछ बातें 'कामतंत्र' की
भी जोड़ दी हैं । इनके अनुकरण पर आगे चलकर कुछ कवियों ने नायिकाभेद
के ऐसे ग्रंथ भी प्रस्तुत किए जिनमें कामशास्त्र का रंग गहरा चढ़ गया । शृंगार के
जो दो भेद 'प्रकाश' और 'प्रच्छन्न' किए गए हैं वे भी पुराने हैं । रासिकप्रिया
के आधारभूत ग्रंथ 'नाट्यशास्त्र', 'कामसूत्र' तो हैं ही, रुद्रभट्ट के शृंगारतिलक
का पूरा आधार इसमें ग्रहण किया गया है ।
केशव ने 'विज्ञानगीता' संस्कृत के 'प्रबोधचंद्रोदय' नाटक के आधार पर
लिखी है । पर जिस प्रकार इन्होंने अन्य ग्रंथों में मूल ग्रंथों से कुछ न कुछ
भिन्नता रखी है उसी प्रकार इसमें भी । कथा के नाटकीय रूप में थोड़ा
सा परिवर्तन कर दिया गया है, यद्यपि संवादों का रूप-रंग और पात्र प्रायः वे
ही हैं । एक बात और है । केशव ने जिस प्रकार रामचंद्रचंद्रिका में यथास्थान
पांडित्य-प्रदर्शन की प्रवृत्ति दिखाई है उसी प्रकार 'विज्ञानगीता' में भी शरद्
आदि के वर्णन अनावश्यक ही जोड़ दिए गए हैं ।
नायिकाभेद
नायक-नायिकाभेद का संबंध रसप्रवाह और नाट्यप्रवाह से है । वहाँ
अभिनय के लिए नायकादि के भेद की अपेक्षा थी । उसी दृष्टि से उसका
विचार वहाँ किया गया । नाट्यशास्त्र में नायिका के जो भेद दिए गए हैं वे कई
प्रकार के हैं । जब नाट्य और काव्य दोनों का भेदक अभिनय नहीं रह गया
केवल स्वरूपभेद ही रह गया तब नायिकाभेद नाटक के रूपभेद के अंतर्गत
व्यवस्थित कर दिया गया । भरत के नाट्यशास्त्र से दशरूपक तक आते आते
( ११ )
यही स्थिति रह गई थी । इसलिए आगे चलकर वह अंश केवल काव्योपयोगी
समझकर पृथक् कर लिया गया । भानुदत्त ने रसतरंगिणी और रसमंजरी ग्रंथ
लिखकर इसे स्पष्ट कर दिया है । पर इसके पूर्व रस के साथ ही नायिकाभेद
का भी विचार होता था । पार्थक्य नहीं किया गया था ।
भरत के नाट्यशास्त्र के अनंतर काव्यप्रवाह या श्रव्यप्रवाह के जिस ग्रंथ में
सर्वप्रथम नायिकाभेद का उल्लेख मिलता है वह रुद्रट का काव्यालंकार है । रुद्रट
के अनंतर रुद्र या रुद्रभट्ट ने 'शृंगारतिलक' नाम के ग्रंथ में प्रधान रूप से शृंगार
का और तदंतर्गत नायक-नायिका-भेद का पर्याप्त विवेचन किया है । अंत में
अन्य रसों का संक्षेप में निरूपण है । यही हिंदी के शृंगारी ग्रंथों की मूल वृत्ति
है । विस्तार मे शृंगार का विचार करना और संक्षेप में अन्य रसों का विवेचन
कर देना । अन्य रसों का विवेचन होने पर भी रुद्रभट्ट ने अपने ग्रंथ का नाम
'शृंगारतिलक' ही रखा है, 'रसतलक' नहीं । अतः जो यह कहते हैं कि हिंदी
के रीतिकाल का नाम शृंगारकाल नहीं होना चाहिए, क्योंकि उसमें शृंगार के
अतिरिक्त अन्य रसों का भी साथ ही विवेचन किया गया है उन्हें 'शृंगारतिलक'
तथा इसी प्रकार के अन्य अनेक ग्रंथों का अध्ययन करना चाहिए और परंपरा
से परिचय प्राप्त करने का अभ्यास डालना चाहिए । संस्कृत में स्वयम् 'रस'
शब्द शृंगार का पर्यायवाची हो गया था ।
रुद्रट का समय आनंदवर्धन के पूर्व माना जाता है, क्योंकि उन्होंने आनंद-
वर्धन के ध्वनिसिद्धांत की चर्चा अपने ग्रंथ में नहीं की है । इसलिए विक्रम
की नवीं शताब्दी के अंत में उनका सत्ताकाल प्रतीत होता है । उनका दूसरा
नाम शतानंद भी था ।* पहले कुछ सज्जन रुद्रटभट्ट और रुद्रभट्ट को एक ही
मानते थे । पर अब यह सिद्ध हो गया है कि ये दो पृथक् व्यक्ति हैं—एक का
नाम रुद्रट है और दूसरे का केवल रुद्र । काव्यसंबंधी दृष्टि भी दोनों की भिन्न
है । रुद्रट अलंकार-प्रवाह के आचार्य हैं और रुद्रभट्ट रस-प्रवाह के । रुद्रभट्ट ने
रुद्रट के ग्रंथ से सहायता भी प्राप्त की है, इसलिए ये विशिष्ट आचार्य नहीं
माने जाते । रुद्रभट्ट संकलयिता के रूप में ही माने जाते हैं। रुद्रट उद्भावना
करनेवाले आचार्य हैं । उन्होंने रसप्रवाह के नौ रसों के अतिरिक्त 'प्रेयस्'
नामक दसवें रस की कल्पना की है । अन्यत्र भी उनमें नवीन कल्पनाएँ
मिलती हैं ।
रुद्रभट्ट का केवल एक ही ग्रंथ 'शृंगारतिलक' मिलता है । इन्होंने और भी
- शतानन्दापराख्येन भट्टवामुकसूनुना ।
साधितं रुद्रटेनेदं सामाजाधीमतां हितम् ॥ -- काव्यालंकार-टीका ।
( १२ )
ग्रंथ लिखे या नहीं, कुछ पता नहीं । हिंदी में केशवदास ने 'श्रृंगारतिलक' का
प्रधान रूप में आधार लेकर रसिकप्रिया का निर्माण किया । केशवदास की
परंपरा भी हिंदी में कुछ दूर तक दिखाई देती है । 'देव' ने एक ओर केशव की
शैली लेकर श्रृंगारतिलक से अपने को जोड़ा दूसरी और रसत रंगिणी से
सहायता ली । श्रृंगार और नायिकाभेद के इस प्रकार हिंदी में दो प्रवाह हैं ।
एक का संबंध रुद्रट-रुद्रभट्ट से जुड़ता है दूसरे का भानुभट्ट या भानुदत्त से ।
नायिकाभेद की शाखा ने भानुभट्ट का ही प्रधान रूप में ग्रहण किया है ।
उज्ज्वलनीलमणि में जो भक्तिभावित नायिकाभेद आया है उसका प्रवाह हिंदी
में नहीं चला । उसका हिंदी की परंपरा में ग्वाल ने अपने रसिकानंद में उल्लेख
किया है । वह भी नायिकाभेद के प्रसंग में नहीं ।
'रसिकप्रिया' और 'श्रृंगारतिलक' का मिलान करने से स्पष्ट हो जाता है
कि केशव ने उसी ग्रंथ को सामने रखा है । सामग्री कामशास्त्र से भी ली गई
है, पर बहुत थोड़ी । केशव ने वेश्या का उल्लेख भर किया है । रसों के प्रकाश-
प्रच्छन्न रूप भी इन्होंने वहीं से रखे हैं । प्रकाश-प्रच्छन्न का उल्लेख रुद्रट ने
भी किया है । फिर आगे भी ये भेद चले । श्रृंगारतिलक के नायिकाभेद-संबंधी
प्रवाह में रसमंजरी से मुख्य पार्थक्य है-मुग्धा, मध्या और प्रौढ़ा के निरूपण में ।
मुग्धादि के जो विशेषण दिए गए हैं वे भिन्न भिन्न प्रकार के हैं । रुद्रट के
यहाँ भी इनके विशेषण भिन्न हैं । यहाँ विस्तारभय से दिग्दर्शन मात्र कराया
जाता है । काव्यालंकार और श्रृंगारतिलक के साथ साहित्यदर्पण को इसलिए
जोड़ लिया जाता है कि हिंदी के नायिकाभेद के प्रसंग में आधारग्रंथ के रूप में
उसका भी उल्लेख किया गया है—
काव्यालंकार श्रृंगारतिलक साहित्यदर्पण रसमंजरी
मुग्धा—
१ नवोढ़ा नववधू प्रथमावतीर्णयौवना नवोढ़ा
२ नवयौवनजनित- नवयौवनभूषिता प्रथमावतीर्ण- विश्रब्धनवोढ़ा
मन्मथोत्साहा मदनविकारा
३ रतिनैपुण्यानभिज्ञा नवानंगरह्त्या रतिवामा अंकुरितज्ञातयौवना
४ साध्वसपिहितानुरागा लज्जाप्रायरति मानमृदु अंकुरितअज्ञातयौवना
५ ✕ ✕ समधिकलज्जावती ✕
मध्या—
१ आरूढयौवनभरा आरूढयौवना प्ररूढयौवना ✕
२ आविर्भूतमनमथोत्साहा प्रादुर्भूतमनोभवा प्ररूढस्मरा ✕
( १३ )
३ उद्भिन्नप्रागल्भ्या प्रगल्भवचना ईषत्प्रगल्भवचना ✕
४ किंचिदुद्गतसुरतचातुर्या किंचिद्विचित्रसुरता विचित्रसुरता ✕
५ ✕ ✕ मध्यमव्रीडिता ✕
प्रौढ़ा—
१ लब्धायति लब्धायति गाढतारुण्या रतिप्रीता
२ रतिकर्मपंडिता समस्तरतिकोविदा समस्तरतकोविदा आनंदसंमोहा
३ आक्रांतनायकमना आक्रांतनायका आक्रांता ✕
४ निर्व्यूढविलासविस्तारा विराजद्विभ्रमा भावोन्नता ✕
५ ✕ ✕ स्मरांधा ✕
६ ✕ ✕ दरव्रीडा ✕
इन विशेषणों में यौवन, काम, लज्जा, रति प्रगल्भता और अधिकार के
तारतम्य का विचार किया गया है। 'लब्धायति' विशेषण को न समझने के
कारण हिंदी में आचार्य मन्य और आलोचकंमन्य इसे 'लब्धापति' या 'लुब्धापति
समझते हैं। संस्कृत-व्याकरण से न 'लब्धापति' बनेगा न 'लुब्धापति' ।
तत्त्वतः शब्द लब्धायति है—'लब्धा आयतिर्यया सा लब्धायतिः' । 'आयति'
शब्द के अनेक अर्थ हैं—भविष्य, विस्तार आदि। 'साहित्यदर्पण' की
'गाढतारुण्या' कदाचित् 'लब्धायति' है। 'भावोन्नता' विराजद्विभ्रमा ही है।
काव्यालंकार, शृंगारतिलक और साहित्यदर्पण एक ही परंपरा में हैं।
रसमंजरी का प्रवाह भिन्न है।
हिंदी में नायिकाभेद के क्षेत्र में कोई नई उद्भावना नहीं की गई है। जो
उद्भावना नई समझी जाती है वह पहले कोई उद्भावना भी हो । हिंदी के
दो आचार्यों में कुछ नवीन कहने का हौसला दिखाई देता है—देव में और
दास में । देव की जैसी उद्भावना जातिविलास में दिखाई देती है वह साहित्यिक
मर्यादा के अंतर्गत नहीं आती । यथार्थवाद के नाम पर कहाँ तक उसकी पुष्टि
की जायगी । दास ने जो भी नूतन सरणि रखी है वह विमर्शपूर्वक है, भले ही
उसका विशेष महत्त्व न हो । हिंदी में विशेष महत्त्व की उद्भावना के लिए
अवकाश भी संस्कृत के आचार्य नहीं छोड़ गए थे । इसलिए यदि किसी की
दृष्टि नवीन विचारपरंपरा की ओर जाती है तो यही उसके लिए बहुत बड़ी
बात है । जैसे, दास ने यह सोचा कि श्रीमानों के यहाँ अनेक महिलाएँ रहती
हैं और वे एक ही पति की अनेक महिलाएँ होती हैं। पाणिगृहीता तो स्वकीया
है, पर ये 'रक्षिताएँ' या 'परदायतें' क्या मानी जाएँ—परकीया या स्वकीया ।
इनके परकीया मानने में बाधा थी । उसके लिए 'परपुरुष' की शर्त थी ।
( १४ )
अतः इन्होंने उन्हें स्वकीया ही घोषित किया—
श्रीमाननि के भौन में भोग्य भामिनी और ।
तिनहूँ कों सुकियाहि में गनें सुकवि-सिरमौर ॥-शृंगारनिर्णय ।
जातिविलास में जिन्हें आलंबन के रूप में रखा गया उनमें से अधिकतर
को उद्दीपन के अंतर्गत दूती के रूप में दास ने जो उपस्थित किया वह
पारंपरिक प्रवाह के कारण। केशवदास ने इनमें से अधिकतर को सखीरूप
में रखा है, वह भी रुद्रभट्ट के शृंगारतिलक के ही आधार पर* । हिंदी में
अधिकांश संस्कृत का ही है, नवीन उद्भावना के कण उसमें नहीं के समान हैं।
परकीया के उद्बुद्धा और उद्बोधिता वस्तुतः भेद नहीं हैं, उनकी स्थिति का
कथन मात्र है। उसमें अवैज्ञानिकता नहीं है जैसा कहा जाता है। वह भी
पारंपरिक कथन है। परकीया के मिलने के प्रयत्न की त्रिधा स्थिति हो सकती
है—नायिका की ओर से प्रयत्न, नायक की ओर से प्रयत्न, दोनो की ओर से
प्रयत्न । इनमें से उभयात्मक स्थिति का उल्लेख नहीं है। नायिका की ओर
से प्रयत्न होने पर वह उद्बुधा है, नायक की ओर से प्रयत्न होने पर वह
उद्बोधिता है । 'शृंगारतिलक' में भी इस स्थिति का उल्लेख है—
विज्ञातनायिकाचित्ता सखी वदति नायकम् ।
नायको वा सखीं तस्याः प्रेमाभिव्यक्तये यथा ॥
दोनों स्थितियों के दो उदाहरण भी वहाँ दिए गए हैं। यह कहना भ्रांति-
शून्य नहीं कि उद्बोधिता तो अनूढ़ा ही है। ऊढ़ा और अनूढ़ा दोनों ही उद्-
बोधिता हो सकती हैं। कैसी अविचारित रमणीय उक्ति है—अनूढ़ा को न
स्वकीया में ही रखा जा सकता है और न परकीया में । जब तक अनूढ़ा है
तब तक वह परकीया ही रहेगी और जब प्रेमी से ही उसका विवाह हो
जायगा तब वह स्वकीया होगी। स्थितिभेद से स्वरूपभेद होगा ।
संस्कृत में कार्यभेद से नायिकाओं के आठ रूप माने गए हैं, पर हिंदी में
बहुत पहले से 'अष्टनायिका' के स्थान पर 'दशनायिका' का निरूपण होता
आया है। इस आठ और दस में कोई बड़ा अंतर नहीं है। सात भेद तो
उभयनिष्ठ हैं। केवल प्रोषितभर्तृका के ही तीन-चार भेद और कर डाले
गए हैं, अथवा यों कहिए कि नायक के प्रवास-प्रसंग को लेकर इन भेदों की
कल्पना कर ली गई है—प्रोषितपतिका, प्रवत्सत्पतिका, प्रवत्स्यत्पतिका और
आगतपतिका । प्रवत्सत्पतिका को किसी ने छोड़ भी दिया है, जैसे-पद्माकर
- कारुदासी नटी धात्री प्रातिवेश्या च शिल्पिनी ।
बाला प्रव्रजिता चेति स्त्रीणां ज्ञेयः सखीजनः ॥
( १५ )
ने । कहीं कहीं यह भेद मिलता है, जैसे भाषाभूषण में ।
इनमें से प्रोस्यत्पतिका का उदाहरण प्राचीनों के अनुसार भानुदत्त ने भी
रसमंजरी में रखा है।* उन्होंने बतलाया है कि इसका अंतर्भाव यदि विप्र-
लब्धा, कलहांतरिता या खंडिता में करना चाहें तो नहीं हो सकता । इसलिए
इसे स्वतंत्र भेद ही स्वीकार करना चाहिए ।
दास विचारशील आचार्य थे । उन्होंने नायिकाभेद के प्रसंग में कुछ
स्थितियाँ कल्पित की हैं । रससारांश में वे लिखते हैं—
गुप्त विदग्धा लक्षिता मुदिता तिय को भाइ ।
किये बनें सुकियाहु में त्रपा हास्यरस पाइ ॥
त्यों ही परकीयाहु में है मुग्धादिक कर्म ।
जैसै अस्त्र कोऊ गहै क्षत्रिजाति को धर्म ॥
उस युग में इतना ही विचार क्या कम है। आज जब नायिकाभेद में ही
अपनी सारी साहित्यिक योग्यता का व्यय करनेवाले भी इस विषय पर कुछ
नहीं सोच पाते तो संस्कृत की समृद्ध चिंतनपरंपरा में हिंदी के मध्यकाल के
इन शृंगारयुगीन कवियों या आचार्यों ने इतना भी सोचा तो बहुत किया ।
शृंगार-काल के आचार्यों ने महत्त्वपूर्ण बातें चाहे न सोची हों, पर उन्होंने
अपने क्षेत्र में समय समय पर कुछ चिंतन अवश्य किया है। उनके चिंतन के
कणों को संचित करने से पर्याप्त राशि इकट्ठी हो सकती है।
रसिकप्रिया और शृंगारतिलक
रसिकप्रिया लक्षणग्रंथों में केशव की सबसे प्रथम कृति है । इसका निर्माण
सं० १६४८ में हुआ था । ओड़छा के इंद्रजीत के कहने से इस ग्रंथ का निर्माण
किया गया—
रची विरंचि विचारि तहं नृपमनि मधुकर साहि ।
गहिरवार कासीसरबि कुलमंडन जसु जाहि ॥
ताको पुत्र प्रसिद्ध महिमंडन दूलहराम ।
इंद्रजीत ताको अनुज सकल धर्म को धाम ॥
दोन्ही ताहि नृसिंहजू तन मन रन जयसिद्धि ।
हित करि लच्छन-राम ज्यों भई राज की वृद्धि ॥
* प्राचीनलेखनादग्रिमक्षणे देशान्तरनिश्चितगमने प्रेयसि प्रोत्स्यत्पतिका
नवमी नायिका भवितुमर्हति ।
( १६ )
तिन कबि केसवदास सों कीन्हो धर्मसनेहु ।
सब सुख दैकरि यों कह्यो 'रसिकप्रिया' करि वेहु ॥
संबत सोरह सै बरस बीते अठतालीस ।
कातिग सुदि तिथि सप्तमी बार बरनि रजनीस ॥
किंतु यह न समझना चाहिए कि केशव ने केवल इंद्रजीत का ही ध्यान
रखकर इसकी रचना की है । वे प्रेरक मात्र थे । रसिकों के लिए ही रसिक-
प्रिया बनी है । वह रसिकप्रिया है, इंद्रजीतप्रिया नहीं—
श्रुति रति मति गति एक करि बिबिध बिबेक बिलास ।
रसिकन कों रसिकप्रिया कीन्ही केसवदास ॥
काव्य भी नरकाव्य न होना चाहिए—
तातें रुचि सों सोचि पचि कीजै सरस कवित्त ।
केसव स्याम सुजान को सुनत होइ बस चित्त ॥
'कबित्त' का अन्वय 'सुजान को' से है अर्थात् स्याम सुजान का काव्य ।
सुजान शब्द श्रीकृष्ण और राधा दोनों के लिए प्रयुक्त होता था । इसलिए
यदि कोई चाहे तो स्याम सुजान का अर्थ राधाकृष्ण भी कर सकता है ।
इसमें प्रधान रूप से शृंगार का और गौण रूप से अन्य रसों का विचार
किया गया है । रस में प्रच्छन्न और प्रकाश भेद रुद्रभट्ट के शृंगारतिलक के
अनुगमन पर रखे गए हैं—
सुभ संजोग बियोग पुनि द्वै सिंगार की जाति ।
पुनि प्रच्छन्न प्रकास करि दोऊ द्वै द्वै भांति ॥
प्रच्छन्न-प्रकाश का तात्पर्य इन्होंने यों समझाया है—
सो प्रच्छन्न संजोग अरु कहैं बियोग प्रमान ।
जानै पीव प्रिया कि सखि होहिं जो तिन्हहि समान ॥
सो प्रकास संजोग अरु कहैं प्रकास बियोग ।
अपने अपने चित्त में जानैं सिगरे लोग ॥
नायिकाभेद में नायिका की जाति का वर्णन कामशास्त्र के अनुसार पद्मिनी-
चित्रिणी-शंखिनी-हस्तिनी किया गया है । मुग्धामध्यादि के विशेषण शृंगारतिलक
के आधार पर हैं । हिंदी में आगे नायिकाभेद की जो परंपरा चली वह रस-
मंजरी के अनुसार । केशव ने उसका अनुगमन नहीं किया, किंतु हावों का
ग्रहण रसमंजरीकार के अनुकूल ही किया है । हास के चार भेद किए हैं—
मंदहास, कलहास, अतिहास और परिहास । अन्यत्र परिहास को हास्यरस के
भीतर नहीं रखा गया है, शृंगारतिलक में भी नहीं । इसका हेतु यह है कि
२ ( १७ )
जहाँ परिहास शृंगार में रहता है वहाँ वह संचारी का काम करता है। स्वच्छंद
रूप में वह रस की स्थिति उत्पन्न करने में इसलिए समर्थ नहीं होता कि उससे
साधारणीकरण होने में बाधा होती है । जिसका परिहास किया जाता है वह
परिहास करनेवाले की दृष्टि में नीचा होता है । इसलिए भाव की स्थिति तो
वहाँ हो सकती है, पर रस की नहीं । समरस अर्थात् शांत रस के जो उदा-
हरण इन्होंने दिए हैं उनमें से अंतिम के अतिरिक्त शेष शृंगार के अंतर्गत ही
हैं अर्थात् उनमें निर्वेद संचारी मात्र है, स्थायी नहीं ।
केशवदास ने अधिकांश विचारसरणि रसिकप्रिया में शृंगारतिलक के ही
आधार पर रखी हैं । मंगलाचरण से ही अनुकथन का मंगलाचरण हो जाता
है । शृंगारतिलक का मंगलाचरण यह है—
शृंगारी गिरिजानने सकरुणो रत्यां प्रवीरः स्मरे
बीभत्सोऽस्थिभिरुत्फणौ च भयकृन्मूर्त्याद्भुतस्तुंगया ।
रौद्रो दक्षविमर्दने च हसकृन्नग्नः प्रशान्तश्चिरा-
दित्यं सर्वरसाश्रयः पशुपतिर्भूयात्सतां भूतये ॥
इसमें शिव ( नटराज ) को सर्वरसाश्रय कहा गया है और रसिकप्रिया
में ब्रजराज को नवरसमय बताया गया है—
श्रीवृषभानुकुमारिहित सृंगाररूप भय ।
बास हासरस हरे मातुबंधन करुनामय ।
केसी प्रति अति रौद्र बीर मारो बत्सासुर ।
भय दावानलपान, पियो बीभत्स बकीउर ।
अति अद्भुत बंचि बिरंचिमति, सांत संततै सोच चित ।
कहि केसव सेवहु रसिकजन, नवरसमय ब्रजराज नित ॥
लक्षणों का आधार प्रायः वही है । उदाहरणों में कहीं उसकी छाया है
और बहुधा स्वतंत्र निर्माण हैं । उदाहरण कहीं अनूदित नहीं हैं । जो विषय
'शृंगारतिलक' में हैं और 'रसिकप्रिया' में भी गृहीत हैं वह प्रायः विवेचन की
दृष्टि से ज्यों का त्यों है । परकीया और गणिका के वर्णन में शृंगारतिलक ने
अधिक रस लिया है, पर रमिकप्रिया में गणिका का पूरा परित्याग है । पर-
कीया के वर्णन में भी अभिनिवेश नहीं है । नीचे दोनों ग्रंथों के समानांतर
विषयों की तालिका पद्य-संख्यारूप में दी जा रही है—
शृंगारतिलक रसिकप्रिया शृंगारतिलक रसिकप्रिया
१।१-८ × १।११-१४ ६।१२-१४
१।६ १।१५ १।१५ ६।१०
१।१० ६।६ १।१६-१८ ×
( १८ )
१।१६ १५।१ १।६१-७१ ×
१।२० × १।७२ ७।२
१।२१ १।१७* १।७३ ७।१
१।२२ १।१८ १।७४ ७।४
१।२३-२५ २।१-३ १।७५ ७।७
१।२६ २।७ १।७६ ७।१०
१।२७ २।११ १।७७ ७।१३
१।२८ २।१४ १।७८ ७।२२
१।२९-३२ × १।७९ ७।१६*
१।३३ ३।१४ १।८० ७।२५
१।३४-३५ ३।१६-१७ १।८१ ७।१६
१।३६ ३।२६ १।८२-८६ ×
१।३७ ३।३० १।८७-८८ ७।३३-३४*
१।३८ × १।८९ ७।३५
१।३९ ३।३२ १।९० ७।३७
१।४० × १।९१ ७।३६
१।४१ ३।४६ १।९२ ७।४१
१।४२ ३।५० १।९३-९४ ×
१।४३ × १।९५ ७।४२-४३
१।४४ ३।५६ २।१-२ ८।२-३
१।४५ ३।६३ २।३ ×
१।४६-४८ × २।४-७ ८।८-१०
१।४९ ३।१५ २।८ ८।१५
१।५०
१६ )
२२।१ × | ३।३ १४।८*
२।२२ १६।१३ | ३।४ १४।१२*
२।२३-२६ × | ३।५ १४।१८*
२।२७ ५।२४ | ३।६ ×
२।२८-३१ × | ३।७ १४।२१
२।३२ ६।१* | ३।८ ×
२।३३-३४ ६।२-३ | ३।९ १४।२४*
२।३५ ६।१५ | ३।१०-११ ×
२।३६ ६।६ | ३।१२ १४।२७
२।३७-४१ × | ३।१३ ×
२।४२ १०।२ | ३।१४ १४।३०*
२।४३ १०।१ | ३।१५ ×
२।४४ १०।३* | ३।१६ १४।३३*
२।४५ १०।६ | ३।१७ ×
२।४६ १०।११ | ३।१८ १४।३७*
२।४७ १०।२० | ३।१९-२० ×
२।४८ १०।१४ | ३।२१ १६।२
२।४९ १०।२३ | ३।२२-३८ ×
२।५० × | ३।३९ १५।२
२।५१ १०।२६-३० | ३।४० ×
२।५२ × | ३।४१ १५।६
२।५३ १०।३१' | ३।४२ ×
२।५४-५५ × | ३।४३ १५।८*
२।५६ १०।३२ | ३।४४ १५।४
२।५७ ११।७ | ३।४५ ×
२।५८-५९ × | ३।४६ १६।१
२।६० ११।१* | ३.४७ १६।६
२।६१-६४ × | ३।४८ १६।४*
२।६५ १२।१ | ३।४९ ×
२।६६ × | ३।५० १६।८
२।६७ १३।१ | ३।५१ १६।४
२।६८-७० × | ३।५२ १६।१०
३।१ १४।१* | ३।५३-५७ ×
३।२ १४।३ |
( २० )
ऊपर जहाँ गुणन का चिह्न ( × ) है वहाँ 'शृंगारतिलक' और 'रसिक-
प्रिया' में मेल नहीं है । 'शृंगारतिलक' की समस्त बातें 'रसिकप्रिया' में नहीं
गृहीत की गई हैं । जहाँ तारा-चिह्न ( * ) है वहाँ कहीं अधिक और कहीं कम
पार्थक्य है । 'शृंगारतिलक' में तीन परिच्छेद हैं । पहले परिच्छेद में ६५,
दूसरे में ७० तथा तीसरे में ५७ छंद हैं । इतने लक्षण के छंद हैं । उदाहरणों
की संख्या इनमें नहीं हैं । उदाहरण उसमें कम ही दिए गए हैं, केवल १४० ।
प्रकाश-प्रच्छन्न भेद सभी रसों में होता है । रसिकप्रिया में केवल शृंगार के
अंतर्गत इन दोनों भेदों के उदाहरण दिए गए हैं । शृंगारतिलक में इन भेदों
के उदाहरण दिए ही नहीं गए हैं । यहाँ प्रकाश-प्रच्छन्न का लक्षण भी नहीं
दिया गया है । मुग्धा-मध्या-प्रौढ़ा के जितने विशेषण दिए गए हैं उनका
विवेचन वहाँ नहीं है । वहाँ लक्षणों के अनंतर कुछ उदाहरण भी यथास्थान
संकलित कर दिए गए हैं तथापि विस्तार नहीं है । रसिकप्रिया में प्रत्येक
विषय का लक्षण और उदाहरण देकर पूरा विस्तार किया गया है ।
रसिकप्रिया में नायक श्रीकृष्ण माने गए हैं, साथ ही नायिका राधाजी या
प्रियाजू हैं । इसका परिणाम यह हुआ है कि सामान्या का विवेचन केशवदास
ने परित्यक्त कर दिया । भक्ति के विभिन्न संप्रदायों में से कुछ में राधिका का
परकीयाभाव भी मान्य है । इसलिए उसका विचार केशव ने नहीं छोड़ा, फिर
भी परकीया का विस्तृत विवेचन करने और उदाहरण देने से वे विरत हो
रहे हैं । शृंगार का वर्णन चाहे रसिकप्रिया में बहिरंग भी यथास्थान आया
हो, चाहे उसमें शास्त्रीय पद्धति की पूर्णता के लिए सुरतांत-वर्णन भी रखे
गए हों, पर सामाजिक मर्यादा का ध्यान रखकर उसमें बहुत से अनभीप्सित
वर्णन परित्यक्त कर दिए गए हैं । 'जिन केशव की शृंगारी प्रवृत्ति की कुत्सा
की जाती हैं उन्होंने सामाजिक दृष्टि से शृंगार के अनपेक्षित प्रसंगों का
परित्याग किया है ।' इसकी साक्षी उनकी रसिकप्रिया भरती है । ऐसे प्रसंग
उन्होंने परंपरा में स्वीकृत होते हुए, आधार-ग्रंथ में वर्णित होते हुए छोड़े हैं ।
इसलिए त्याग प्रयत्नपूर्वक है ।
यह भी कहा जाता है कि केशव की प्रवृत्ति दरबारी थी । उन्होंने राज-
विलास का वर्णन करने का विशेष प्रयास किया है। पर रसविवेचन में उन्होंने
राजकीय प्रवृत्तियों का सर्वत्र अवलंबन नहीं किया है। शास्त्रविवेजन में जीवन
के सभी पक्षों का आकलन किया जाता रहा है । वहाँ संपन्न जीवन के अधिक
विवरण बलात्कृत नहीं हैं, विषयापेक्षा से संकलित हैं । केशव ने इस विषय में
राजा-रंक को एक ही माना-है—