सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished286 पृष्ठ

पृष्ठ 16, कुल 286 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 16

( १६ )
तिन कबि केसवदास सों कीन्हो धर्मसनेहु ।
सब सुख दैकरि यों कह्यो 'रसिकप्रिया' करि वेहु ॥
संबत सोरह सै बरस बीते अठतालीस ।
कातिग सुदि तिथि सप्तमी बार बरनि रजनीस ॥
किंतु यह न समझना चाहिए कि केशव ने केवल इंद्रजीत का ही ध्यान
रखकर इसकी रचना की है । वे प्रेरक मात्र थे । रसिकों के लिए ही रसिक-
प्रिया बनी है । वह रसिकप्रिया है, इंद्रजीतप्रिया नहीं—
श्रुति रति मति गति एक करि बिबिध बिबेक बिलास ।
रसिकन कों रसिकप्रिया कीन्ही केसवदास ॥
काव्य भी नरकाव्य न होना चाहिए—
तातें रुचि सों सोचि पचि कीजै सरस कवित्त ।
केसव स्याम सुजान को सुनत होइ बस चित्त ॥
'कबित्त' का अन्वय 'सुजान को' से है अर्थात् स्याम सुजान का काव्य ।
सुजान शब्द श्रीकृष्ण और राधा दोनों के लिए प्रयुक्त होता था । इसलिए
यदि कोई चाहे तो स्याम सुजान का अर्थ राधाकृष्ण भी कर सकता है ।
इसमें प्रधान रूप से शृंगार का और गौण रूप से अन्य रसों का विचार
किया गया है । रस में प्रच्छन्न और प्रकाश भेद रुद्रभट्ट के शृंगारतिलक के
अनुगमन पर रखे गए हैं—
सुभ संजोग बियोग पुनि द्वै सिंगार की जाति ।
पुनि प्रच्छन्न प्रकास करि दोऊ द्वै द्वै भांति ॥
प्रच्छन्न-प्रकाश का तात्पर्य इन्होंने यों समझाया है—
सो प्रच्छन्न संजोग अरु कहैं बियोग प्रमान ।
जानै पीव प्रिया कि सखि होहिं जो तिन्हहि समान ॥
सो प्रकास संजोग अरु कहैं प्रकास बियोग ।
अपने अपने चित्त में जानैं सिगरे लोग ॥
नायिकाभेद में नायिका की जाति का वर्णन कामशास्त्र के अनुसार पद्मिनी-
चित्रिणी-शंखिनी-हस्तिनी किया गया है । मुग्धामध्यादि के विशेषण शृंगारतिलक
के आधार पर हैं । हिंदी में आगे नायिकाभेद की जो परंपरा चली वह रस-
मंजरी के अनुसार । केशव ने उसका अनुगमन नहीं किया, किंतु हावों का
ग्रहण रसमंजरीकार के अनुकूल ही किया है । हास के चार भेद किए हैं—
मंदहास, कलहास, अतिहास और परिहास । अन्यत्र परिहास को हास्यरस के
भीतर नहीं रखा गया है, शृंगारतिलक में भी नहीं । इसका हेतु यह है कि