रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)
Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan
महाकवि केशवदास द्वारा
पृष्ठ 17, कुल 286 में से
संदर्भ में पढ़ें२ ( १७ )
जहाँ परिहास शृंगार में रहता है वहाँ वह संचारी का काम करता है। स्वच्छंद
रूप में वह रस की स्थिति उत्पन्न करने में इसलिए समर्थ नहीं होता कि उससे
साधारणीकरण होने में बाधा होती है । जिसका परिहास किया जाता है वह
परिहास करनेवाले की दृष्टि में नीचा होता है । इसलिए भाव की स्थिति तो
वहाँ हो सकती है, पर रस की नहीं । समरस अर्थात् शांत रस के जो उदा-
हरण इन्होंने दिए हैं उनमें से अंतिम के अतिरिक्त शेष शृंगार के अंतर्गत ही
हैं अर्थात् उनमें निर्वेद संचारी मात्र है, स्थायी नहीं ।
केशवदास ने अधिकांश विचारसरणि रसिकप्रिया में शृंगारतिलक के ही
आधार पर रखी हैं । मंगलाचरण से ही अनुकथन का मंगलाचरण हो जाता
है । शृंगारतिलक का मंगलाचरण यह है—
शृंगारी गिरिजानने सकरुणो रत्यां प्रवीरः स्मरे
बीभत्सोऽस्थिभिरुत्फणौ च भयकृन्मूर्त्याद्भुतस्तुंगया ।
रौद्रो दक्षविमर्दने च हसकृन्नग्नः प्रशान्तश्चिरा-
दित्यं सर्वरसाश्रयः पशुपतिर्भूयात्सतां भूतये ॥
इसमें शिव ( नटराज ) को सर्वरसाश्रय कहा गया है और रसिकप्रिया
में ब्रजराज को नवरसमय बताया गया है—
श्रीवृषभानुकुमारिहित सृंगाररूप भय ।
बास हासरस हरे मातुबंधन करुनामय ।
केसी प्रति अति रौद्र बीर मारो बत्सासुर ।
भय दावानलपान, पियो बीभत्स बकीउर ।
अति अद्भुत बंचि बिरंचिमति, सांत संततै सोच चित ।
कहि केसव सेवहु रसिकजन, नवरसमय ब्रजराज नित ॥
लक्षणों का आधार प्रायः वही है । उदाहरणों में कहीं उसकी छाया है
और बहुधा स्वतंत्र निर्माण हैं । उदाहरण कहीं अनूदित नहीं हैं । जो विषय
'शृंगारतिलक' में हैं और 'रसिकप्रिया' में भी गृहीत हैं वह प्रायः विवेचन की
दृष्टि से ज्यों का त्यों है । परकीया और गणिका के वर्णन में शृंगारतिलक ने
अधिक रस लिया है, पर रमिकप्रिया में गणिका का पूरा परित्याग है । पर-
कीया के वर्णन में भी अभिनिवेश नहीं है । नीचे दोनों ग्रंथों के समानांतर
विषयों की तालिका पद्य-संख्यारूप में दी जा रही है—
शृंगारतिलक रसिकप्रिया शृंगारतिलक रसिकप्रिया
१।१-८ × १।११-१४ ६।१२-१४
१।६ १।१५ १।१५ ६।१०
१।१० ६।६ १।१६-१८ ×