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सर्वकोश
रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished286 पृष्ठ

पृष्ठ 10, कुल 286 में से

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पृष्ठ 10

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'कविप्रिया' कविशिक्षा की पुस्तक है, इसमें संस्कृत के अलंकार-संप्रदाय-
वाले आचार्यों का अनुगमन है। इसके मुख्य आधार-ग्रंथ हैं—कविकल्पलतावृत्ति
और काव्यादर्श । आरंभ में अंधबधिरादि दोष डिंगल के काव्यप्रवाह से ले
लिए गए हैं । बारहमासा लोकप्रवाह से आया है और नखशिख की परंपरा
फारसी की है । यद्यपि केशव के पूर्व संस्कृत में ध्वनि की स्थापना भली भाँति
हो चुकी थी तथापि इन्होंने अलंकार की पुरानी धारणा को ही प्रधानता दी ।
इन्होंने 'अलंकार' शब्द को उसी व्यापक अर्थ में ग्रहण किया है जिसमें उसको
दंडी, वामन आदि प्राचीन आचार्यों ने लिया है । इसी से पारिभाषिक अर्थ के
अनुसार 'विशेषालंकार' के अतिरिक्त इन्होंने 'सामान्यालंकार' के अंतर्गत काव्य
की शोभा बढ़ानेवाली सभी सामग्री जुटा दी है । इनके दूसरे लक्षण-
ग्रंथ 'रसिकप्रिया' में संस्कृत के तद्विषयक बहुप्रचलित ग्रंथों से कुछ भिन्नता
है । पर इसका यह अर्थ नहीं कि केशव ने इसमें कोई नई बात लिखी है ।
इन्होंने नायिकाभेद का सूक्ष्म तत्त्व न समझकर इसमें कुछ बातें 'कामतंत्र' की
भी जोड़ दी हैं । इनके अनुकरण पर आगे चलकर कुछ कवियों ने नायिकाभेद
के ऐसे ग्रंथ भी प्रस्तुत किए जिनमें कामशास्त्र का रंग गहरा चढ़ गया । शृंगार के
जो दो भेद 'प्रकाश' और 'प्रच्छन्न' किए गए हैं वे भी पुराने हैं । रासिकप्रिया
के आधारभूत ग्रंथ 'नाट्यशास्त्र', 'कामसूत्र' तो हैं ही, रुद्रभट्ट के शृंगारतिलक
का पूरा आधार इसमें ग्रहण किया गया है ।
केशव ने 'विज्ञानगीता' संस्कृत के 'प्रबोधचंद्रोदय' नाटक के आधार पर
लिखी है । पर जिस प्रकार इन्होंने अन्य ग्रंथों में मूल ग्रंथों से कुछ न कुछ
भिन्नता रखी है उसी प्रकार इसमें भी । कथा के नाटकीय रूप में थोड़ा
सा परिवर्तन कर दिया गया है, यद्यपि संवादों का रूप-रंग और पात्र प्रायः वे
ही हैं । एक बात और है । केशव ने जिस प्रकार रामचंद्रचंद्रिका में यथास्थान
पांडित्य-प्रदर्शन की प्रवृत्ति दिखाई है उसी प्रकार 'विज्ञानगीता' में भी शरद्
आदि के वर्णन अनावश्यक ही जोड़ दिए गए हैं ।

नायिकाभेद

नायक-नायिकाभेद का संबंध रसप्रवाह और नाट्यप्रवाह से है । वहाँ
अभिनय के लिए नायकादि के भेद की अपेक्षा थी । उसी दृष्टि से उसका
विचार वहाँ किया गया । नाट्यशास्त्र में नायिका के जो भेद दिए गए हैं वे कई
प्रकार के हैं । जब नाट्य और काव्य दोनों का भेदक अभिनय नहीं रह गया
केवल स्वरूपभेद ही रह गया तब नायिकाभेद नाटक के रूपभेद के अंतर्गत
व्यवस्थित कर दिया गया । भरत के नाट्यशास्त्र से दशरूपक तक आते आते