रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)
Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan
महाकवि केशवदास द्वारा
पृष्ठ 11, कुल 286 में से
संदर्भ में पढ़ें( ११ )
यही स्थिति रह गई थी । इसलिए आगे चलकर वह अंश केवल काव्योपयोगी
समझकर पृथक् कर लिया गया । भानुदत्त ने रसतरंगिणी और रसमंजरी ग्रंथ
लिखकर इसे स्पष्ट कर दिया है । पर इसके पूर्व रस के साथ ही नायिकाभेद
का भी विचार होता था । पार्थक्य नहीं किया गया था ।
भरत के नाट्यशास्त्र के अनंतर काव्यप्रवाह या श्रव्यप्रवाह के जिस ग्रंथ में
सर्वप्रथम नायिकाभेद का उल्लेख मिलता है वह रुद्रट का काव्यालंकार है । रुद्रट
के अनंतर रुद्र या रुद्रभट्ट ने 'शृंगारतिलक' नाम के ग्रंथ में प्रधान रूप से शृंगार
का और तदंतर्गत नायक-नायिका-भेद का पर्याप्त विवेचन किया है । अंत में
अन्य रसों का संक्षेप में निरूपण है । यही हिंदी के शृंगारी ग्रंथों की मूल वृत्ति
है । विस्तार मे शृंगार का विचार करना और संक्षेप में अन्य रसों का विवेचन
कर देना । अन्य रसों का विवेचन होने पर भी रुद्रभट्ट ने अपने ग्रंथ का नाम
'शृंगारतिलक' ही रखा है, 'रसतलक' नहीं । अतः जो यह कहते हैं कि हिंदी
के रीतिकाल का नाम शृंगारकाल नहीं होना चाहिए, क्योंकि उसमें शृंगार के
अतिरिक्त अन्य रसों का भी साथ ही विवेचन किया गया है उन्हें 'शृंगारतिलक'
तथा इसी प्रकार के अन्य अनेक ग्रंथों का अध्ययन करना चाहिए और परंपरा
से परिचय प्राप्त करने का अभ्यास डालना चाहिए । संस्कृत में स्वयम् 'रस'
शब्द शृंगार का पर्यायवाची हो गया था ।
रुद्रट का समय आनंदवर्धन के पूर्व माना जाता है, क्योंकि उन्होंने आनंद-
वर्धन के ध्वनिसिद्धांत की चर्चा अपने ग्रंथ में नहीं की है । इसलिए विक्रम
की नवीं शताब्दी के अंत में उनका सत्ताकाल प्रतीत होता है । उनका दूसरा
नाम शतानंद भी था ।* पहले कुछ सज्जन रुद्रटभट्ट और रुद्रभट्ट को एक ही
मानते थे । पर अब यह सिद्ध हो गया है कि ये दो पृथक् व्यक्ति हैं—एक का
नाम रुद्रट है और दूसरे का केवल रुद्र । काव्यसंबंधी दृष्टि भी दोनों की भिन्न
है । रुद्रट अलंकार-प्रवाह के आचार्य हैं और रुद्रभट्ट रस-प्रवाह के । रुद्रभट्ट ने
रुद्रट के ग्रंथ से सहायता भी प्राप्त की है, इसलिए ये विशिष्ट आचार्य नहीं
माने जाते । रुद्रभट्ट संकलयिता के रूप में ही माने जाते हैं। रुद्रट उद्भावना
करनेवाले आचार्य हैं । उन्होंने रसप्रवाह के नौ रसों के अतिरिक्त 'प्रेयस्'
नामक दसवें रस की कल्पना की है । अन्यत्र भी उनमें नवीन कल्पनाएँ
मिलती हैं ।
रुद्रभट्ट का केवल एक ही ग्रंथ 'शृंगारतिलक' मिलता है । इन्होंने और भी
- शतानन्दापराख्येन भट्टवामुकसूनुना ।
साधितं रुद्रटेनेदं सामाजाधीमतां हितम् ॥ -- काव्यालंकार-टीका ।