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सर्वकोश
रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished286 पृष्ठ

पृष्ठ 13, कुल 286 में से

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पृष्ठ 13

( १३ )
३ उद्भिन्नप्रागल्भ्या प्रगल्भवचना ईषत्प्रगल्भवचना ✕
४ किंचिदुद्गतसुरतचातुर्या किंचिद्विचित्रसुरता विचित्रसुरता ✕
५ ✕ ✕ मध्यमव्रीडिता ✕
प्रौढ़ा—
१ लब्धायति लब्धायति गाढतारुण्या रतिप्रीता
२ रतिकर्मपंडिता समस्तरतिकोविदा समस्तरतकोविदा आनंदसंमोहा
३ आक्रांतनायकमना आक्रांतनायका आक्रांता ✕
४ निर्व्यूढविलासविस्तारा विराजद्विभ्रमा भावोन्नता ✕
५ ✕ ✕ स्मरांधा ✕
६ ✕ ✕ दरव्रीडा ✕
इन विशेषणों में यौवन, काम, लज्जा, रति प्रगल्भता और अधिकार के
तारतम्य का विचार किया गया है। 'लब्धायति' विशेषण को न समझने के
कारण हिंदी में आचार्य मन्य और आलोचकंमन्य इसे 'लब्धापति' या 'लुब्धापति
समझते हैं। संस्कृत-व्याकरण से न 'लब्धापति' बनेगा न 'लुब्धापति' ।
तत्त्वतः शब्द लब्धायति है—'लब्धा आयतिर्यया सा लब्धायतिः' । 'आयति'
शब्द के अनेक अर्थ हैं—भविष्य, विस्तार आदि। 'साहित्यदर्पण' की
'गाढतारुण्या' कदाचित् 'लब्धायति' है। 'भावोन्नता' विराजद्विभ्रमा ही है।
काव्यालंकार, शृंगारतिलक और साहित्यदर्पण एक ही परंपरा में हैं।
रसमंजरी का प्रवाह भिन्न है।
हिंदी में नायिकाभेद के क्षेत्र में कोई नई उद्भावना नहीं की गई है। जो
उद्भावना नई समझी जाती है वह पहले कोई उद्भावना भी हो । हिंदी के
दो आचार्यों में कुछ नवीन कहने का हौसला दिखाई देता है—देव में और
दास में । देव की जैसी उद्भावना जातिविलास में दिखाई देती है वह साहित्यिक
मर्यादा के अंतर्गत नहीं आती । यथार्थवाद के नाम पर कहाँ तक उसकी पुष्टि
की जायगी । दास ने जो भी नूतन सरणि रखी है वह विमर्शपूर्वक है, भले ही
उसका विशेष महत्त्व न हो । हिंदी में विशेष महत्त्व की उद्भावना के लिए
अवकाश भी संस्कृत के आचार्य नहीं छोड़ गए थे । इसलिए यदि किसी की
दृष्टि नवीन विचारपरंपरा की ओर जाती है तो यही उसके लिए बहुत बड़ी
बात है । जैसे, दास ने यह सोचा कि श्रीमानों के यहाँ अनेक महिलाएँ रहती
हैं और वे एक ही पति की अनेक महिलाएँ होती हैं। पाणिगृहीता तो स्वकीया
है, पर ये 'रक्षिताएँ' या 'परदायतें' क्या मानी जाएँ—परकीया या स्वकीया ।
इनके परकीया मानने में बाधा थी । उसके लिए 'परपुरुष' की शर्त थी ।