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सर्वकोश
रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished286 पृष्ठ

पृष्ठ 12, कुल 286 में से

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पृष्ठ 12

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ग्रंथ लिखे या नहीं, कुछ पता नहीं । हिंदी में केशवदास ने 'श्रृंगारतिलक' का
प्रधान रूप में आधार लेकर रसिकप्रिया का निर्माण किया । केशवदास की
परंपरा भी हिंदी में कुछ दूर तक दिखाई देती है । 'देव' ने एक ओर केशव की
शैली लेकर श्रृंगारतिलक से अपने को जोड़ा दूसरी और रसत रंगिणी से
सहायता ली । श्रृंगार और नायिकाभेद के इस प्रकार हिंदी में दो प्रवाह हैं ।
एक का संबंध रुद्रट-रुद्रभट्ट से जुड़ता है दूसरे का भानुभट्ट या भानुदत्त से ।
नायिकाभेद की शाखा ने भानुभट्ट का ही प्रधान रूप में ग्रहण किया है ।
उज्ज्वलनीलमणि में जो भक्तिभावित नायिकाभेद आया है उसका प्रवाह हिंदी
में नहीं चला । उसका हिंदी की परंपरा में ग्वाल ने अपने रसिकानंद में उल्लेख
किया है । वह भी नायिकाभेद के प्रसंग में नहीं ।
'रसिकप्रिया' और 'श्रृंगारतिलक' का मिलान करने से स्पष्ट हो जाता है
कि केशव ने उसी ग्रंथ को सामने रखा है । सामग्री कामशास्त्र से भी ली गई
है, पर बहुत थोड़ी । केशव ने वेश्या का उल्लेख भर किया है । रसों के प्रकाश-
प्रच्छन्न रूप भी इन्होंने वहीं से रखे हैं । प्रकाश-प्रच्छन्न का उल्लेख रुद्रट ने
भी किया है । फिर आगे भी ये भेद चले । श्रृंगारतिलक के नायिकाभेद-संबंधी
प्रवाह में रसमंजरी से मुख्य पार्थक्य है-मुग्धा, मध्या और प्रौढ़ा के निरूपण में ।
मुग्धादि के जो विशेषण दिए गए हैं वे भिन्न भिन्न प्रकार के हैं । रुद्रट के
यहाँ भी इनके विशेषण भिन्न हैं । यहाँ विस्तारभय से दिग्दर्शन मात्र कराया
जाता है । काव्यालंकार और श्रृंगारतिलक के साथ साहित्यदर्पण को इसलिए
जोड़ लिया जाता है कि हिंदी के नायिकाभेद के प्रसंग में आधारग्रंथ के रूप में
उसका भी उल्लेख किया गया है—
काव्यालंकार श्रृंगारतिलक साहित्यदर्पण रसमंजरी
मुग्धा—
१ नवोढ़ा नववधू प्रथमावतीर्णयौवना नवोढ़ा
२ नवयौवनजनित- नवयौवनभूषिता प्रथमावतीर्ण- विश्रब्धनवोढ़ा
मन्मथोत्साहा मदनविकारा
३ रतिनैपुण्यानभिज्ञा नवानंगरह्त्या रतिवामा अंकुरितज्ञातयौवना
४ साध्वसपिहितानुरागा लज्जाप्रायरति मानमृदु अंकुरितअज्ञातयौवना
५ ✕ ✕ समधिकलज्जावती ✕
मध्या—
१ आरूढयौवनभरा आरूढयौवना प्ररूढयौवना ✕
२ आविर्भूतमनमथोत्साहा प्रादुर्भूतमनोभवा प्ररूढस्मरा ✕