रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)
Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan
महाकवि केशवदास द्वारा
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सिंह तथा प्रयाग से दो-एक सज्जन उनकी रचनाओं में अनुसंधान करके डाक्टर
हो गए । हिंदुस्तानी अकादमी ( प्रयाग ) से केशव-ग्रंथावली अब निकली है ।
जायसी पर विस्तृत आलोचना पहले लिखी गई, जायसी-ग्रंथावली पहले निकली
केशव-ग्रंथावली पिछड़ गई ।
यही नहीं केशव को ‘हिंदी-नवरत्न’ में जो स्थान मिला वह भी उनके
अनुरूप उस समय बहुतों को नहीं लगा था । अब तो केशव पर अधिक ध्यान
देने की आवश्यकता का भरपूर अनुभव करना ही त्याग दिया गया है । उनके
संबंध में प्राय: ये उद्धरण दिखाई देते हैं—
कठिन काव्य के प्रेत ।
कबि को दीन न चहै बिदाई । पूछै केशव की कबिताई ।
उड़गन केसवदास ।
‘केसव अर्थ गंभीर को’ की चर्चा अब कोई नहीं करता । ‘प्रेत’ शब्द
का क्या प्रासंगिक अर्थ है ? केशव के संबंध में प्रचलित किंवदंती का स्मरण
कीजिए । कहते हैं कि जो सुख-भोग केशव और उनकी मंडली तुंगारण्य के
बीच ओड़छे में कर रही थी वह परलोक में भी खंडित न हो इस विचार से
उन्होंने प्रेत-यज्ञ कराया । सबके सब प्रेत हो गए । केशव प्रेतयोनि में जिस कष्ट
का अनुभव कर रहे थे उसे उन्होंने तुलसीदास से निवेदित किया और उनके
आदेशानुसार अपनी रामचंद्रचंद्रिका का पाठ कर मुक्त हुए । औरों की मुक्ति के
संबंध में किंवदंती मौन है । बस, केशव ‘कठिन काव्य के प्रेत’ हो गए । ‘एक
भए प्रेत एक मींजि मारे हाथी हैं’ में भी यही जनश्रुति मुखर है । इसका अर्थ
यही है कि केशव का काव्य कठिन है । कठिन काव्य पहले समझ में आए
तब न ! बस, ‘कबि को दीन न चहै विदाई, पूछै केसव की कबिताई’ । केशव
के कठिन काव्य को पहले स्मरण कौन करे और स्मरण करे भी तो जो
सुनेगा उसे पहले अर्थ लगेगा तभी तो कार्य सधेगा । कवि अर्थात् भाट कविताई
सुना देगा, वह कोई टीकाकार या महाभाष्यकार तो है नहीं कि उसका अर्थ
भी श्रोता को बतलाए । अर्थ लगता नहीं तो अर्थ हाथ कैसे लगे । इस कठिनाई
का अर्थ यह भी लगाया जाने लगा कि उनकी कविता में ‘रस’ नहीं. ‘सहृदयता’
नहीं । आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने उन्हें हृदयहीन क्या लिख दिया, वे बेचारे
रसिकों, सहृदयों, कवियों सबकी मंडली से खारिज किए जाने लगे । केशव
परंपरा से इतने अभिभूत थे कि वे अपने हृदय का उपयोग उस अवसर पर
नहीं कर पाते थे जिस अवसर पर शुक्लजी के विचार से हृदय का योग अनि-
वार्य रूप से होना चाहिए । प्रकृति के प्रति उनके हृदय में वह राग नहीं था जो
होना कवि के लिए अपेक्षित है । पर यह तो हिंदी के सभी कवियों के लिए है ।