मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)
Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi
by विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र)
Source: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (origin)
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About this granth
This is Bharatendu Harishchandra's Hindi rendering of Vishakhadatta's Sanskrit play Mudrarakshasa (मुद्राराक्षस). Bharatendu (1850–1885), often called the father of modern Hindi literature, described it as a remarkable drama on politics, and his translation is one of the important early works of Hindi theatre.
The play follows Chanakya's scheme, after the fall of the Nanda dynasty, to bring the Nanda minister Rakshasa over to Chandragupta's side. The cast list names Chandragupta, Rakshasa, Chanakya, Malayaketu, Chanakya's agent Siddharthaka, Rakshasa's friend the jeweller Chandanadasa, Shakatadasa, and the spy Viradhagupta disguised as a snake-charmer.
This printing was compiled by Babu Ramdin Singh, editor of the Kshatriya Patrika, published by Rai Ramranvijay Singh Bahadur and printed at the Khadgavilas Press, Bankipur; the title page marks it as the eighth printing and carries the year 1925. Bharatendu dedicated the work to Raja Shivaprasad "Sitara-e-Hind". At about 173 pages, it shows the Hindi of the Bharatendu era and its approach to translating Sanskrit drama.
शेषपूरण। १६०
बलात्कार से ग्रसने चाहता है, सूर्य से बुध
का योग रक्षा करता है। आङ् अव्यय मर्यादा वा अभिविधि
अर्थ मे ले कर उस से इन शब्द से समास "आङ् मर्यादाभि-
विध्यो" इस सूत्र से करते है तब "एन" बनता है अनाङ् निषेध
रहने से "निपात एकाजनाङ्" सूत्र से प्रगृह्य संज्ञा हो के ५
प्रकृतिभाव नही हो सकता।
यदि कोई कहे कि 'एन' इदम् वा एतद् शब्द से बना है
तो विचारो कि "द्वितीयाटौस्वेनः" इस सूत्र से जो इदम्
वा एतद् शब्द के स्थान मे एन आदेश होता है सो "अन्वादेश"
ही मे होता है। अन्वादेश उसे कहते हैं कि किसी कार्य के १०
लिये उसी का फिर प्रयोग करना पड़े। उदाहरण—अनेन
व्याकरणमधीत एनं छन्दो ऽध्यापय। अनयो पवित्र कुल
एनयो प्रभूत स्वम्। इत्यादि। यहा समस्त श्लोक भर मे कही
इदम् वा एतद् शब्द का प्रयोग नही है तो अन्वादेश भी नही
हुआ। और अन्वादेश नही रहने से "एन" इदम् वा एतद् १५
शब्द का व्याकरणरीति से बन नही सकता इस लिये पूर्वोक्त
अर्थ करना पड़ा।
बुधाना योग बुधयोग इस अर्थ से—अधिक बुद्धिमान
बुध, गुरु, शुक्र तीनों का योग सूर्य को रहने से ग्रहण नही हो
सकता वा ग्रहण का अशुभफल नही हो सकता, ऐसा सूत्रधार २०
नटी से कहता है यही अभिप्राय ठीक है।
पञ्चग्रहसंयोगान्न किल ग्रहणस्य सम्भवो भवति।
(वाराहीसंहिता राहुचार श्लोक १७)
अर्थ—पाच ग्रहों का सयोग होने से ग्रहण का सम्भव
नही होता। यहा भी राहु, सूर्य, बुध, गुरु और शुक्र पाच ग्रहों २५
का सयोग हुआ ही, इस लिये ग्रहण का सम्भव नही हय
सूत्रधार का तात्पर्य होगा।
अथवा, वाराही संहिता राहुचार श्लोक ६२ देखो।
१७० मुद्राराक्षस—
यदशुभमवलोकनाभिरुक्तं ग्रहजनितं ग्रहणे प्रमोक्षणे वा ।
सुरपतिगुरुणावलोकिते तच्छममुपयाति जलैरिवाग्निरिद्ध ॥
अर्थ जो ग्रहजनित अशुभफल दृष्टि के वश से ग्रहण और मोक्ष समय मे कहा वह बृहस्पति की दृष्टि होने से शात हो जाता है, जैसे सुलगा हुआ अग्नि जल से शांत होता है। यहा भी उक्त अर्थ से बृहस्पति की दृष्टि है, अत अशुभफल नही हो सकता। यह सूत्रधार का तात्पर्य होगा—ऐसा भी कह सकते है।
उक्त श्लोक का अन्वयसहित अर्थ जो चन्द्रगुप्त के अर्थ को प्रकाश कर के चाणक्य के प्रवेश की प्रस्तावना करता है।
इदानीं सकेतु क्रूरग्रह असम्पूर्णामंडल चन्द्रं बलात् अभिभवितुमिच्छति एनं बुधयोगस्तु रक्षति। इस समय केतु (मलयकेतु) सहित क्रूरग्रह (राक्षस) जिस का मण्डल (राज्य) पूरा नही हुआ है उस चन्द्र (चन्द्रगुप्त) को बलात्कार से पराजय करने चाहता है, प्रभून्क बुद्धिमानों का (गुप्त पुरुष जो चाणक्य के भेजे थे उन का) योग तो रक्षा करता है। एन शब्द की सिद्धि पूर्वप्रकार से ही जानो, केवल भेद इतना ही है कि पहले अर्थ मे इन शब्द से सूर्ये और दूसरे अर्थ मे प्रभु (राजा वा बड़े लोक) लेते है। “इन सूर्ये प्रभौ” नानार्थ-वर्ग अमरकोष मे लिखा भी है।
सारांश—इस लिखित अर्थ पर सब लोक विचार कर के फिर उस के गुण दोषों पर ध्यान देवें इतनी ही प्रार्थना है।
इति शुभम्
$\left.\begin{array}{l}\text{उदयपुर,} \ \text{१८ नवम्बर}\end{array}\right}$ विनायक शास्त्री ।
केतुवर्णन
कवि वचनसुधा जिल्द १२ नम्बर ४६—१८—७—८१
प्राचीन भारतवर्षीय सिद्धान्तज्ञों का केतु सम्बन्धी विचार।
जो अकस्मात् अग्नि सदृश आकाश मे देख पड़े उसे केतु कहते है, परन्तु खद्योतादि से भिन्न हो। ये केतु तीन प्रकार के होते है—दिव्य, आन्तरिक्ष और भौम। जिनकी स्थिति न वायु से ऊपर है वे दिव्य, जिन के रूप घोड़े, हाथी, ध्वज, वृक्षादि के सदृश होते है, अर्थात् जो भूवायु से उत्पन्न होते है वे आन्तरिक्ष और इन से भिन्न भौम हैं।
बहुत विद्वान् कहते हैं कि एक सौ एक केतु हैं, कितने कहते हैं कि हजार केतु है, परन्तु नारद मुनि कहते हैं कि यह एक ही केतु है अनेक रूप और स्थान बदल बदल कर दर्शन देता है।
तीन पक्ष के अनन्तर जितने दिनों तक केतुओं का दर्शन होता है उतने मास तक इनका फल होता है और जितने मास तक दर्शन होता है उतने वर्ष तक फल होता है। प्राचीनों ने इन केतुओं के रङ्ग, रूप और उदयास्त पर से सञ्ज्ञा विशेष और उन पर से शुभाशुभ ज्ञान जैसा किया है उसे हम संक्षेप से लिखते है। जिन केतुओं की चोटी सुवर्ण और मणि के सदृश हो और पूरब पश्चिम दोनों दिशाओ मे उदय हों वे रविपुत्र कहलाते है और इनके उदय से राजाओं मे परस्पर विरोध होता है, ऐसे पच्चीस केतु है। जो अग्नि दिशा मे उदय होते है और जिनका रङ्ग लाल होता है वे अग्निपुत्र है, उनके उदय से संसार मे भय होता है उनकी संख्या भी पच्चीस ही है।
जिनकी चोटी टेढ़ी और काली हो ऐसे केतु भी पच्चीस है। ये दक्षिण दिशा मे उदय होते हैं, इनके उदय से मनुष्य बहुत मरते हैं, इनको मृत्युपुत्र कहते हैं। बाईस केतु ऐसे हैं
१७० मुद्राराक्षस-
जिनको चोटी नही होती और उनका आकार दर्पण सा
चिपटा और गोल होता है । रङ्ग जल मे पड़ा हुआ तैल के
सदृश जान पड़ता ह । ये ईशान कोण मे उदय होते है । इन
के उदय से भी भय उत्पन्न होता है और इनको मङ्गलभ्रातृ
५ कहते हैं । तीन केतु चन्द्रपुत्र है । इनका रूप चान्दी ऐसा
श्वेत होता है, ये उत्तर दिशा मे देख पड़ते है, इनका दर्शन
सुभिक्षकारक है । एक केतु ब्रह्मपुत्र है । इसको तीन चोटी
होती है और तीनों तीन रङ्ग की । इसके उदय की दिशा का
नियम नही, यह युगान्त मे उदय होता है ।
१० चौरासी शुक्रपुत्र है । इनका तारा शुक्ल और बड़ा होता
है और इनका उत्तर और ईशान मे उदय होता है और तीव्र
फल है । साठ शनैश्चर के पुत्र हैं । इनको दो चोटी होती है,
आकाश मे सर्वत्र इनका उदय होता है और नाम कनक है,
ये अतिकष्टद हैं ।
१५ गुरु के पुत्र विकच ना मक पैंसठ है, इनको चोटी नही
होती, याम्य दिशा म उदय होते है, बुरे फल देते हैं । तस्कर
नाम के इक्यावन बुध के पुत्र हैं, ये स्पष्ट दिखाई नही देते
और लम्बे और श्वेत होते हैं, सब दिशाओं मे इनका उदय
होता ह, ये भी बुरे फल देने वाले हैं । तीन चोटी के कौकुम
२० नाम के मङ्गल के पुत्र साठ केतु हैं, ये उत्तर दिशा मे उदय
होते है और बुरे हे, तेतीस राहुपुत्र तामसकिलक नाम के है,
ये रवि, चन्द्रमा के साथ देख पड़ते है, इनका फल रविचार के
अधीन हे । एक सौ बीस अग्नि के पुत्र विश्व-रूप नाम के हैं
ये अग्निबाधा करने वाले हैं ।
२५ जिनकी चोटी चामर ऐसी और कृष्ण रङ्ग वर्ण की होती
हैं वे वायुपुत्र हैं और उनका अरुण नाम है । ये पाप फल
देनेवाले हैं और इनकी संख्या सतहत्तर है । बहुत तारोंवाले
केतुवर्णन । १७३
प्रजापति के आठ पुत्र गणक नाम के है और दो सै चार ब्रह्म-
सन्तान चतुर्भुजाकार है । बत्तीस वरुण के पुत्र कङ्का
नाम के है, इनमे चन्द्रमा ऐसी कान्ति रहती है । ये केतु
बहुत तीव्र फल को देने वाले है, इनका रूप बांस
के वृत्तसदृश होता है, छानवे काल के पुत्र है इन का कबन्ध ५
नाम है रूप भी कबन्ध ऐसा होता है, बड़े घोर दारुण फल
के देनेवाले हैं। नव केतु केवल विदिशा मे उदय होते है इनका
बड़ा और श्वेत तारा होता है, इस प्रकार से हजार केतु का
फल गर्ग, पराशर और असित देवलादिकों ने कहा है । अब
इन से विशेष केतुओ का फल नीचे लिखते है ।— १०
जिस केतु का उदय पश्चिम भाग मे हो और उत्तर भाग
में फेला हो, मूर्त्ति चिकनी हो तो उसे बसा केतु कहते है यह
तुरन्त ही मरगी करता है परन्तु इस के उदय से सुभिक्ष
बहुत होता है ।
उसी लक्षण के अस्थिकेतु और शस्त्रकेतु भी होते है, १५
परन्तु पहिला रूक्ष और दूसरा पूर्व मे उदय होता है पहिला
भयप्रद और दूसरा महामारीकारक है ।
जो केतु अमावस्या मे उदय होता है और उस की चोटी
मे धूम रहता है उसे कपालकेतु कहते हैं यह मरगी, अवर्षण
और रोग कारक है और यह आकाश के आधे ही मे रहता है । २०
इसी प्रकार का रौद्र नामक केतु है । इस की चोटी
नोकीली और ताम्रवर्ण की होती हे, यह आकाश के विभाग मे
ही चलता है । चल केतु उसे कहते हैं जिसकी चोटी का अग्र
दक्षिण ओर और उंचाई एक अगुल हो और ज्यों ज्यों उत्तर
की ओर चले त्यों त्यों बढ़ता जाय, सप्तऋषि अभिजित और २५
ध्रुव को स्पर्श कर फिर लोट कर दक्षिण भाग में अस्त हो और
आंधे ही आकाश मे रहै । यह केतु प्रयाग से लेकर अवन्तीपुष्क-
रावरण और उत्तर मे देविकानद तक मध्यदेश और अन्य अन्य
१८५ मुद्राराक्षस-
देशों पे भी रोग, दुर्भिक्ष से प्रजा को दुख देता है, इसका फल कोई दश मास तक और कोई अठारह मास तक रहता है।
श्वेत और कनाम का केतु ये दोनों साथ ही साथ दिन तक देख पड़ते है, इनका अग्र याम्यभाग मे रहताहै और ५ अर्द्धरात्रि के पूर्व ही इन का दर्शन होता है। ये दोनों सुभिक्ष और कल्याण के देनेवाले हैं।
इन मे यदि केवल केतु का दर्शन हो तो दश वर्ष तक संसार मे महाताप और शस्त्रकोप रहता है, श्वेत केतु जो जटाकार होता, हे यदि रुज हो, आकाश के त्रिभाग मे रहे, और १० लोट कर बाये ओर से आवे तो केवल तृतीयांश प्रजा बचे और सब का नाश हो।
कृत्तिका नक्षत्र मे स्थित हो कर जिस केतु का उदय हो उसे रश्मिकेतु कहते है। इस की चोटी म धूंआ रहता है इसका फल श्वेत कतु के समान है।
१५ ध्रुवकेतु का प्रमाण, वर्ण, आकृति इत्यादि नियत नही होते और दिव्य, आन्तरिक्ष, भौम ये तीनों भेद उस मे पाये जाते है यह अच्छा फल देनेवाला है।
राजाओ की सेना और महलों के ऊपर, वृक्ष पहाड़ और गृहों के ऊपर यह ध्रुवकेतुउनका नाश करने के लिए अकस्मात् २० दर्शन देता है।
कुमुद केतु की श्वेत कुमुद ऐसी कांति होती हे, पश्चिम मे उदय और पूर्व ओर चोटी रहती है, एक ही रात्रि देख पड़ता हे, यह दश वर्ष तक सुभिक्ष करता हे।
मणिकेतु की चोटी दूध ऐसी और सीधी होती है, तारा २५ बहुत सूक्ष्म रहता है, पश्चिम भाग मे केवल एक ही दिन प्रहर तक देख पड़ता है यह साढ़े चार मास तक सुभिक्ष और क्षुद्र जन्तुओं की उत्पत्ति करता है। जलकेतु पश्चिम ओर देख पड़ता
केतुवर्णन । १७५
और चोटी भी पश्चिम भाग मे रहती है, रूप स्वच्छ होता है।
यह नव मास तक सुभिक्ष और प्राणियों को शांत रखता है।
भवकेतु एक रात्रि के पूर्व भाग मे देख पड़ता है। उसकी
चोटी सिंह के पुच्छ ऐसी दक्षिण से घूमी हुई होती है। यह जै
मुहूर्त्त रात्रि मे देख पड़ता है, उतने मास तक सुभिक्ष करना ५
है परन्तु यदि रूक्ष हो तो प्राणियों का नाश करता है।
पद्मकेतु कमल के मृणाल ऐसा उज्ज्वल होता है और
पश्चिम दिशा मे एक ही रात्रि देख पड़ता है। यह सात वर्ष
तक सुभिक्ष करता है।
आवर्त्तकेतु पश्चिम भाग मे आधी रात को देख पड़ता है, १०
इस की चोटी लाल और बाईं ओर को रहती है। यह जै
मुहूर्त्त रात्रि में देख पड़ता है उतने ही मास सुभिक्ष करता है।
संवर्त्तकेतु पश्चिम भाग मे सन्ध्या काल मे उदय होता है
और आकाश के तृतीयांश तक फैला रहता है, इस की चोटी
धूमसहित ताम्रवर्ण की होती है और उस का अग्र शूल ऐसा १५
जान पड़ता है। यह जै मुहूर्त्त देख पड़ता है उतने वर्ष शस्त्रों
के आघात से अनेक राजाओं का नाश करता है और जिस
नक्षत्र पर उदय होता हे उसे भी दुःख देता है।
बुरे केतुओं के अश्विन्यादि नक्षत्रों मे उदय होने के क्रम।
अरमकपति, किरातगज, कलिङ्गपति, शूरसेनपति, उशी- २०
नरपति, जलजजीवपति, अश्मकपति, मगधपति, अशिकपति,
अङ्गपति, पाण्ड्यपति, उज्जयिनीपति, दण्डकपति, कुरुक्षेत्रपति,
काश्मीरपति, कम्बोजपति, इक्ष्वाकुपति, रत्नकपति, पुण्ड्रपति,
केकयपति, सार्वभोम, अध्रपति, भद्रकपति, काशीपति, चैद्या-
दिपति, पञ्चनदपति, सिंहलपति, अगपति, नेमिषपति, किरात- २५
पति, इन राजाओं का मरण होता है, परन्तु यदि केतु की
चोटी उल्कादिकों से चोट खाय तो इन राजाओं का कल्याण
१७६ मुद्राराक्षस—
औध्र, चोल, अवगाण, सित, हूण, चीन इन देशों के राजाओं का नाश हो ।
केतु को यूरप के लोग भी कुछ विशिष्ट फलकारक मानते है, परन्तु कुछ इसका पक्का विश्वास नही करते । यह एक प्रकार का तारा है, जिस की गति का यथार्थ निर्णय नही होता और इस की बहुत जाति है, कितने एक बार देख पड़ते फिर लौट कर नही आते । इस से यह जान पड़ता है कि इनकी कक्षा को यूरप के लोग (Parabola) कहते हैं और हम ने इस का नाम परवलय रक्खा है । बहुत से केतु फिर लौट कर आते है, इसलिए उन की कक्षा सामित है अर्थात बन्धी है, इस कक्षा १० को दीर्घवृत्त कहते है जिस की नाभि और केन्द्र में बहुत अन्तर होता है ।
कितने केतु दो चार बार तो नियत काल पर लौट कर आते हैं फिर नही आते । इस से यह अनुमान होता है कि या तो वे केतु नष्ट हो गये अथवा उन की कक्षा बदल गयी । इन १५ बातों से यही सिद्ध होता है कि इन के कक्षादिकों का प्रमाण यथार्थ अभी तक किसी के ध्यान मे नही आया । इसी लिये वराहमिहिर ने लिखा है कि 'दर्शनमस्तो वा गणितविधिनाऽस्य शक्यते नैव ज्ञातुम्” अर्थात् केतुओ के उदय और अस्त गणित से नही जाने जाते ।
२० इस केतु को कई एक विद्वानों ने हिन्दी मे 'पुच्छलतारा' वा दुमदार सितारा कहा हे, परन्तु प्राचीन लोगो के मत से वह केतु की शिखा अर्थात् चोटी है, जिसे नये लोग पुच्छ कहते हैं, इस लिये हमारी समझ मे तारा पद के विशेषण म पुच्छ के बदले शिखा अर्थात् चोटी का विशेषण देना चाहिये ।
२५
बांकीपुर— 'खड्गविलास' प्रेस में बा० रामप्रसाद सिंह द्वारा मुद्रित ।