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मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi

by विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र)

Source: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished173 pages

Page 166 of 173

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Page 166

शेषपूरण। १६०

बलात्कार से ग्रसने चाहता है, सूर्य से बुध
का योग रक्षा करता है। आङ् अव्यय मर्यादा वा अभिविधि
अर्थ मे ले कर उस से इन शब्द से समास "आङ् मर्यादाभि-
विध्यो" इस सूत्र से करते है तब "एन" बनता है अनाङ् निषेध
रहने से "निपात एकाजनाङ्" सूत्र से प्रगृह्य संज्ञा हो के ५
प्रकृतिभाव नही हो सकता।

यदि कोई कहे कि 'एन' इदम् वा एतद् शब्द से बना है
तो विचारो कि "द्वितीयाटौस्वेनः" इस सूत्र से जो इदम्
वा एतद् शब्द के स्थान मे एन आदेश होता है सो "अन्वादेश"
ही मे होता है। अन्वादेश उसे कहते हैं कि किसी कार्य के १०
लिये उसी का फिर प्रयोग करना पड़े। उदाहरण—अनेन
व्याकरणमधीत एनं छन्दो ऽध्यापय। अनयो पवित्र कुल
एनयो प्रभूत स्वम्। इत्यादि। यहा समस्त श्लोक भर मे कही
इदम् वा एतद् शब्द का प्रयोग नही है तो अन्वादेश भी नही
हुआ। और अन्वादेश नही रहने से "एन" इदम् वा एतद् १५
शब्द का व्याकरणरीति से बन नही सकता इस लिये पूर्वोक्त
अर्थ करना पड़ा।

बुधाना योग बुधयोग इस अर्थ से—अधिक बुद्धिमान
बुध, गुरु, शुक्र तीनों का योग सूर्य को रहने से ग्रहण नही हो
सकता वा ग्रहण का अशुभफल नही हो सकता, ऐसा सूत्रधार २०
नटी से कहता है यही अभिप्राय ठीक है।

पञ्चग्रहसंयोगान्न किल ग्रहणस्य सम्भवो भवति।
(वाराहीसंहिता राहुचार श्लोक १७)

अर्थ—पाच ग्रहों का सयोग होने से ग्रहण का सम्भव
नही होता। यहा भी राहु, सूर्य, बुध, गुरु और शुक्र पाच ग्रहों २५
का सयोग हुआ ही, इस लिये ग्रहण का सम्भव नही हय
सूत्रधार का तात्पर्य होगा।

अथवा, वाराही संहिता राहुचार श्लोक ६२ देखो।