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मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi

by विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र)

Source: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished173 pages

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केतुवर्णन । १७५

और चोटी भी पश्चिम भाग मे रहती है, रूप स्वच्छ होता है।
यह नव मास तक सुभिक्ष और प्राणियों को शांत रखता है।

भवकेतु एक रात्रि के पूर्व भाग मे देख पड़ता है। उसकी
चोटी सिंह के पुच्छ ऐसी दक्षिण से घूमी हुई होती है। यह जै
मुहूर्त्त रात्रि मे देख पड़ता है, उतने मास तक सुभिक्ष करना ५
है परन्तु यदि रूक्ष हो तो प्राणियों का नाश करता है।

पद्मकेतु कमल के मृणाल ऐसा उज्ज्वल होता है और
पश्चिम दिशा मे एक ही रात्रि देख पड़ता है। यह सात वर्ष
तक सुभिक्ष करता है।

आवर्त्तकेतु पश्चिम भाग मे आधी रात को देख पड़ता है, १०
इस की चोटी लाल और बाईं ओर को रहती है। यह जै
मुहूर्त्त रात्रि में देख पड़ता है उतने ही मास सुभिक्ष करता है।

संवर्त्तकेतु पश्चिम भाग मे सन्ध्या काल मे उदय होता है
और आकाश के तृतीयांश तक फैला रहता है, इस की चोटी
धूमसहित ताम्रवर्ण की होती है और उस का अग्र शूल ऐसा १५
जान पड़ता है। यह जै मुहूर्त्त देख पड़ता है उतने वर्ष शस्त्रों
के आघात से अनेक राजाओं का नाश करता है और जिस
नक्षत्र पर उदय होता हे उसे भी दुःख देता है।

बुरे केतुओं के अश्विन्यादि नक्षत्रों मे उदय होने के क्रम।
अरमकपति, किरातगज, कलिङ्गपति, शूरसेनपति, उशी- २०
नरपति, जलजजीवपति, अश्मकपति, मगधपति, अशिकपति,
अङ्गपति, पाण्ड्यपति, उज्जयिनीपति, दण्डकपति, कुरुक्षेत्रपति,
काश्मीरपति, कम्बोजपति, इक्ष्वाकुपति, रत्नकपति, पुण्ड्रपति,
केकयपति, सार्वभोम, अध्रपति, भद्रकपति, काशीपति, चैद्या-
दिपति, पञ्चनदपति, सिंहलपति, अगपति, नेमिषपति, किरात- २५
पति, इन राजाओं का मरण होता है, परन्तु यदि केतु की
चोटी उल्कादिकों से चोट खाय तो इन राजाओं का कल्याण