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मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

by महाकवि विशाखदत्त

DevanagariSanskritpublished488 pages
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तृतीयोऽङ्कः १०५

किये हुए ), मेरे अनुचरों से घिरा हुआ है, और सिद्धार्थक आदि गुप्तचर भी निर्दिष्ट कार्यों के सम्पादन में लगे हुए हैं । सम्प्रति फूट डालने में कुशल ( मैं ) चन्द्रगुप्त के साथ बनावटी रूप से झगड़ा करके प्रतिकूल राक्षस को शीघ्र ही अपनी बुद्धि के अनुसार शत्रु ( मलयकेतु ) से अलग कर दूंगा ॥ १२ ॥

टिप्पणी—अतिमात्रम्—अतिशयम् । अतिक्रान्ता मात्रा प्रमाणं यस्मिन् कर्मणि तत् अतिमात्रम् प्रादिबहुव्रीहि स० । क्रियाविशेषणमेतत् । उद्युक्ताः—तत्पर । युज् समाधौ दिवादिःकर्मकः । उद्√युज्+क्त कर्तरि वर्तमाने । प्रतीपम्—प्रतिकूल । प्रतिगताः आपः अस्मिन् इति प्रतीपः प्रादिबहुव्रीहि स०, समासान्तः अप्रत्ययः, 'द्व्यन्तरुपसर्गेभ्योऽप ईत्' इत्यनेन ईत्वम् । इसका अभिधार्थ है—वह स्थान जहाँ से धारा मुड़ती है, किन्तु लक्षणार्थ है—प्रतिकूल । तम्। यह 'राक्षसम्' का विशेषण है। स्वमतेन—यथारुचि । अत्र करणे हेतौ वा तृतीया । इस श्लोक के 'मौर्येन्दु' पद मे कर्मधारय तथा उपमित दोनों समासों की संभावना है, इसलिए उपमा या रूपक अलंकार समझना चाहिए । इसमें गौड़ी रीति है, ओज गुण है और शार्दूलविक्रीडित छन्द है ॥ १३ ॥

कञ्चुकी—[प्रविश्य] कष्टं खलु सेवा नाम ! कुतः ?—

भेतव्यं नृपतेस्ततः सचिवतो राज्ञस्ततो वल्लभा-
दन्येभ्यश्च वसन्ति येऽस्य भवने लब्धप्रसादा विटाः ।
दैन्यादुन्मुखदर्शनापलपनैः पिण्डार्थमायस्यतः
सेवां लाघवकारिणीं कृतधियः स्थाने श्ववृत्तिं विदुः ॥ १४ ॥

अन्वयः—नृपतेः भेतव्यम्, ततः सचिवतः, ततो राज्ञो वल्लभात्, अन्येभ्यश्च ये लब्धप्रसादा विटा अस्य भवने वसन्ति । स्थाने कृतधियः दैन्यात् उन्मुखदर्शनापलपनैः पिण्डार्थम् आयस्यतः लाघवकारिणीं सेवां श्ववृत्तिं विदुः ॥ १४ ॥

व्याख्या—नृपतेः—भूपात्, भेतव्यम् — शङ्कितव्यम्, ततः—तदनन्तरं, सचिवतः—अमात्यात्, ततः—तत्पश्चात्, राज्ञः नृपतेः, वल्लभात्—प्रियजनात्, अन्येभ्यश्च—इतरेभ्यश्च ये, लब्धप्रसादाः—प्राप्तानुग्रहाः, विटाः—धूर्ताः, अस्य—राज्ञः, भवने—गृहे, वसन्ति—तिष्ठन्ति । स्थाने—युक्तम् (एव यत्), कृतधियः—कृता शिक्षिता धीः बुद्धिः येषां ते पण्डिता इत्यर्थः, दैन्यात्—दरिद्रतया हेतुना,

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१८६ मुद्राराक्षसम्

उन्मुखदर्शनापलपने — उत् ऊर्ध्वं मुखं यस्मिन् कर्मणि तत् उन्मुखम् उद्ग्रीव यथा स्यात् तथा दर्शनानि वीक्षितानि अपलपनानि मिथ्याभाषनानि च तैः, पिण्डार्थम्—भोज्यार्थम्, आयस्यत —क्लिश्यमानस्य, (सेवकस्य) लाघवकारिणी—लघुतासम्पादिनी, सेवा—शुश्रूषा, श्ववृत्ति—कुक्कुरलीला, विदु —मन्यन्ते ॥ १४ ॥

हिन्दी अनुवाद—कञ्चुकी—[प्रवेश करके] सेवा दुःखद (वस्तु) है। क्योंकि—

राजा से डरना चाहिए, उसके बाद मंत्री से, तत्पश्चात् राजा के प्रियपात्र से, (फिर उन) इतर व्यक्तियो से, जो कृपापात्र धूर्त इस (राजा) के घर में रहते हैं। ठीक (ही है कि) विद्वानों ने दीनता के कारण ऊपर मुख करके देखने और मिथ्या भाषणों से जीविका के लिए कष्ट उठाते हुए (सेवक) की तुच्छ बनाने वाली सेवा को कुत्ते की वृत्ति माना है ॥ १४ ॥

टिप्पणी—कष्टम्—अत्र सामान्ये नपुंसकम्। उन्मुखदर्शनापलपनै — अप √ लप् + ल्युट् भावे = अपलपनम् = मिथ्या भाषण, झूठमूठ की प्रशंसा। कुत्ते के पक्ष में—पीटे जाने के भय से शरीर को सिकोडना। श्ववृत्तिम्—शुनो वृत्तिमिव वृत्तिम्। जैसे कुत्ता उदरपूर्ति के लिए स्वामी को देखकर ऊपर को मुंह उठाता है, भूकता है और पिटाई के डर से देह को सिकोडता है, उसी तरह सेवक भी राजा और उनके कृपापात्रवर्ग के साथ बरतता हुआ कालयापन करता है। इसीलिए अन्यत्र भी कहा गया है—'सेवा श्ववृत्तिराख्याता'। इस श्लोक में कंचुकी का निर्वेद दिखाया गया है और उसे निर्वेद इसलिए हुआ है कि वह चाणक्य और चन्द्रगुप्त के कपटवैमनस्य को यथार्थ समझ रहा है। इस पद्य में काव्यलिंग अलंकार है, वैदर्भी रीति है, प्रसाद गुण है और शार्दूलविक्रीडित छंद है। उस छंद का लक्षण १, १२ में देखिए ॥ १४ ॥

[परिक्रम्यावलोक्य च] इदमार्यचाणक्यस्य गृहं, यावत् प्रविशामि। [नाट्येन प्रविश्यावलोक्य च] अहो ! राजाधिराजमन्त्रिणो गृहभूतिः! कुतः ?—

उपलशकलमेतद् भेदकं गोमयानां
वटुभिरुपहृतानां बर्हिषां स्तोम एष

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तृतीयोऽङ्कः १८७

शरणमपि समिद्भिः शुष्यमाणाभिराभि-
र्विनमितपटलान्तं दृश्यते जीर्णकुड्यम् ॥ १५ ॥

अन्वय—गोमयानां भेदकम् एतत् उपलशकलम, वटुभिः उपहृतानां बर्हिषाम् एषः स्तोमः, शुष्यमाणाभिः समिद्भिः विनमितपटलान्तं जीर्णकुड्यं शरणमपि दृश्यते ॥ १५ ॥

व्याख्या—गोमयानां करीषाणां शुष्काणामिति शेषः, भेदकम्—पेषकम्, एतत्—दृश्यमानम्, उपलशकलम्—प्रस्तरखण्डं (दृश्यते), वटुभिः—छात्रभूतैः विप्रकुमारैः, उपहृतानां—समानीतानां, बर्हिषां—कुशानाम्, एषः—अयम्, स्तोमः—समूहः (दृश्यते), शुष्यमाणाभिः—आतपे शोषं गच्छन्तीभिः, आभिः—दृश्यमानाभिः, समिद्भिः—काष्ठैः, विनमितपटलान्तं—विनमितः नम्रीभूतः पटलान्तः छदिप्रान्तः यस्य तादृशम्, जीर्णकुड्यं—जीर्णं विशीर्णं कुड्यं भित्तिः यस्य तादृशं, शरणमपि—गृहञ्च, दृश्यते—अवलोक्यते ॥ १५ ॥

हिन्दी अनुवाद—[घूमकर और देखकर] यह आर्य चाणक्य का घर है, भीतर चलूँ। [अभिनय के साथ भीतर जाकर और देखकर] अरे ! (यह है) चक्रवर्ती राजा के मंत्री की गृह-विभूति !! क्योंकि—

(सूखे) गोबरों को तोड़ने वाला यह पत्थर का टुकड़ा (दिखाई दे रहा) है, ब्रह्मचारियों द्वारा लाये हुए कुशों का यह ढेर (दिखाई दे रहा) है। और सूखती हुई समिधाओं (के भार) से झुकी हुई ओलती वाला तथा पुरानी दीवारों वाला घर भी दिखाई दे रहा है।

टिप्पणी—राजाधिराजमन्त्रिणः—अधिको राजा अधिराजः प्रादितत्०, समासान्तः टचप्रत्ययः, राज्ञाम् अधिराजः षष्ठीतत्०, तस्य मन्त्री षष्ठीतत्०, तस्य। राजाओं के भी विशेष राजा अर्थात् चक्रवर्ती के मंत्री की। गृहभूतिः—घर का ऐश्वर्य। गोमयानाम्—गोबरों या उपलों का। गोः पुरीषम् इति गो + मयट् = गोमयानि, तेषाम् कृद्योगे कर्मणि षष्ठी। स्तोमः—ढेर। कही ‘कूटमेतत्’ पाठ है। कूट का भी अर्थ ढेर होता है। ‘कूतोऽस्त्री निश्चले राशौ’ इति मेदिनी। समिद्भिः—लकडियो से। समिध्यते आभिः इति सम् √ इन्ध् + क्विप् करणे = समिधः, ताभिः। अनुक्ते कर्तरि तृतीया। विनमितपटलान्तम्—जिसके छप्पर की ओलती झुक गई हो। वि √ नम् + क्त कर्मणि—विनमितः।

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१८८
मुद्राराक्षसम्

तादृश पटलान्तं यस्य तत् । यह 'शरणम्' का विशेषण है । शरणम्—घर, कुटी । 'शरण गृहरक्षितो ' इत्यमर । इस श्लोक मे स्वभावोक्ति नामक अलकार है, वैदर्भी रीति है, प्रसाद गुण है और मालिनी छन्द है । मालिनी का लक्षण यह है—'ननमयययुतेय मालिनी भोगिलोकै ' ॥ १५ ॥

तत् स्थाने खल्वस्य वृषलो देवश्चन्द्रगुप्त इति । कुत —

स्तुवन्त्यश्रान्तास्या क्षितिपतिमभूतैरपि गुणै
प्रवाच कार्पण्याद् यदवितथवाचोऽपि कृतिन ।
प्रभावस्तृष्णाया म खलु सकल स्यादितरथा
निरीहाणामीशस्तृणमिव तिरस्कारविषय ॥ १६ ॥

**अन्वय—**अवितथवाच कृतिन अपि यत् कार्पण्यात् प्रवाच ( सन्त ) अश्रान्तास्या ( भूत्वा ) अभूतैरपि गुणै क्षितिपतिं स्तुवन्ति स खलु तृष्णाया सकल प्रभाव । इतरथा निरीहाणाम् ईश तृणमिव तिरस्कारविषय स्यात् ॥ १६ ॥

**व्याख्या—**अवितथवाच —अवितथा सत्या वाक् वाणी येषा तादृशा , कृतिन अपि—विद्वांस अपि, यत्, कार्पण्यात्—दैन्यात् हेतो , प्रवाच —वाचाला ( सन्त ), अश्रान्तास्या —अश्रान्त श्रमरहितम् आस्य मुख येषा तादृशा ( भूत्वा ), अभूतै अपि—अविद्यमाने अपि, गुणै —दयादाक्षिण्यादिभि , क्षितिपति—राजान, स्तुवन्ति—उपश्लोकयन्ति, स , खलु—निश्चितम्, तृष्णाया —लोभस्य, सकल —सम्पूर्ण, प्रभाव —माहात्म्यम् । इतरथा—अन्यथा, निरीहाणाम्—कामनारहितानाम् ( जनाना सम्बन्धे ), ईश —प्रभु राजा इत्यर्थ , तृणमिव—शष्पमिव, तिरस्कारविषय —अनादरपात्र, स्यात्—भवेत् ॥ १६ ॥

**हिन्दी अनुवाद—**इसलिए इस ( चाणक्य ) का महाराज चन्द्रगुप्त को वृषल (शूद्र) कहना उचित है । क्योकि—

सत्य वाणी बोलने वाले विद्वान् भी जो दीनता के कारण वाचाल तथा अश्रान्तमुख होकर अविद्यमान गुणो से भी राजा की स्तुति करते हैं, वह निश्चित रूप से तृष्णा का पूरा प्रभाव है, अन्यथा निरीह व्यक्तियो के लिए प्रभु (राजा) तृण के समान तिरस्कार का विषय (अर्थात् तुच्छ) होता है ॥ १६ ॥

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तृतीयोऽङ्कः १८६

**टिप्पणी—अवितथवाचः—**जिनकी वाणी असत्य नही होती अर्थात् सत्यवक्ता । तथा = सत्य । विगतं तथा अस्याः इति वितथा बहुव्रीहि स० । न वितथा अवितथा नञ्तत्० तादृशी वाक् येषां बहुव्रीहि स० । **प्रवाचः—**बहुत बोलने वाले । प्रभूता वाक् एषाम् प्रादिवहुव्रीहि स० । **अश्रान्तास्याः—**न थके हुए मुख वाले । यह ‘कृतिनः’ का विशेषण है । किसी पुस्तक मे ‘श्रान्तास्याः’ पाठ है । उसका अर्थ होगा—थके हुए मुख वाले अर्थात् जब तक मुख थक नही जाता तब तक । **प्रभावः—**प्रकृष्टो भावः प्रभावः प्रादितत्०। यहाँ 'प्र√भू+घञ्' ऐसा नही कर सकते; क्योकि 'श्रिणीभुवोऽनुपसर्गे' सूत्र से उपसर्ग में घञ् नही होता । **निरीहाणाम्—**निःस्पृहों का । कहा भी है—'निःस्पृहस्य तृण जगत्' । ईहायाः निष्क्रान्ता इति निरीहाः 'निरादयः क्रान्ताद्यर्थे पञ्चम्या' इत्यनेन तत्पुरुषसमासः । **तिरस्कारविषयः—**तिरस्कार करने की वस्तु । तिरस्√कृ+घञ् भावे = तिरस्कार वा तिरःकारः 'तिरसोऽन्यतरस्याम्' इत्यनेन सत्वस्य विकल्पात् । तिरस्कारस्य विषयः षष्ठीतत्० । इस श्लोक में विरोधाभास नामक अलकार उपमा अलंकार से संसृष्ट है । इसमे वैदर्भी रीति है, प्रसाद गुण है और शिखरिणी छन्द है । इस छन्द का लक्षण १, १३ में देखिए ॥ १६ ॥

[अवलोक्य सभयम्] तदयमार्यचाणक्यस्तिष्ठति ।

यो नन्दमौर्यनृपयोः परिभूय लोक-
मस्तोदयौ प्रतिदिशन्नविभिन्नकालम् ।
पर्यायपातितहिमोष्णमसर्वगामि
धाम्नातिशाययति धाम सहस्रधाम्नः ॥ १७ ॥

**अन्वय—**यः लोकं परिभूय अविभिन्नकालं नन्दमौर्यनृपयोः अस्तोदयौ प्रतिदिशन् सहस्रधाम्नः असर्वगामि पर्यायपातितहिमोष्णं धाम धाम्ना अतिशाययति ॥ १७ ॥

**व्याख्या—**यः—चाणक्यः, लोकं—भुवनं, परिभूय—अवमत्य, अविभिन्नकालं—युगपत्, नन्दमौर्यनृपयोः—नृपस्य नन्दस्य नृपस्य मौर्यस्य च, अस्तोदयौ, ह्रासोपचयौ, प्रतिदिशन्—यच्छन्, सहस्रधाम्नः—सूर्यस्य, असर्वगामि—सर्वं निखिलं भुवनं न गच्छति न व्याप्नोति यत् तादृशं, पर्यायपातितहिमोष्णं—

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१६० | मुद्राराक्षसम्

पर्यायेण कालक्रमेण पातितम् अवतारितं हिमं शीतम् उष्णम् आतपञ्च येन तादृश, धाम—तेज , धाम्ना—स्वतेजसा, अतिशाययति—अतिक्रामयति ॥१७॥

हिन्दी अनुवाद—[ देख कर भय के साथ ] वे ये आप चाणक्य विराजमान हैं ।

जो विश्व को पराजित करके ( अर्थात् नन्द और उसके अमात्य आदि को नीति से मोहित करके ) एक ही समय नन्दराज और मौर्यराज को ( क्रमशः ) अस्त और उदय देते हुए सूर्य के सर्वत्र न जाने वाले तथा कालक्रम से सर्दी और गर्मी को गिराने वाले तेज को अपने तेज से अतिक्रान्त कर रहा है ॥ १७ ॥

टिप्पणी—लोकम्—संसार या लोगों को । सूर्य-पक्ष में लोक का तात्पर्य है लोकालोक नामक पर्वत से । पर्यायपातितहिमोष्णम्—कालक्रम से सर्दी और गर्मी को उतारने वाले । परि—आ√इ+अच् वा √अय्+घञ् भावे = पर्याय । हिमञ्च उष्णञ्च इति हिमोष्णम् वा हिमोष्णे 'विप्रतिषिद्धं चानधिकरणवाचि' इत्यनेन एकवद्भावस्य विकल्पात् । अतिशाययति—अतिक्रमण कर रहा है, नीचा दिखा रहा है । अति√शी+णिच्+लट्—तिप् । यहाँ भाव यह है कि सूर्य सहस्रधाम होते हुए भी क्रमशः सर्दी और गर्मी देते हैं, किन्तु ये चाणक्य तो एक ही काल में नन्द के लिए शीत और मौर्य के लिए उष्ण हो गए । इसलिए ये सूर्य से भी अधिक प्रतापशाली हैं । इस श्लोक में अतिशयोक्ति अलंकार व्यतिरेक अलंकार से संकीर्ण है । इसमें पाञ्चाली रीति है, ओज गुण है और वसन्ततिलका छन्द है । इस छन्द का लक्षण १, ८ में देखिए ॥ १७ ॥

[ जानुभ्यां भूमौ निपत्य ] जयतु जयत्वार्य ।

चाणक्य—[ नाट्येनावलोक्य ] वैहीनरे ! किमागमनप्रयोजनम् ।

कञ्चुकी—आर्य ! प्रणतसम्भ्रमसमुच्चलितभूमिपालमौलिमाला-माणिक्यशकलशिखापिशङ्गीकृतपादपद्मयुगल सुगृहीतनामधेयो देवश्च-न्द्रगुप्त आर्यं शिरसा प्रणिपत्य विज्ञापयति—'अकृतक्रियान्तरायमार्यं द्रष्टुमिच्छामि इति ।

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तृतीयोऽङ्कः । १६१

चाणक्यः— वृषलो मां द्रष्टुमिच्छति ? वैहीनरे ! न खलुवृषल-श्रवणपथगतोऽयं मत्कृतः कौमुदीमहोत्सवप्रतिषेधः ?

कञ्चुकी— आर्य ! अथ किम् ?

चाणक्यः— [ सक्रोधम् ] आः ! केन कथितम् ?

कञ्चुकी— [ भयं नाटयित्वा ] प्रसीदत्वार्यः । स्वयमेव सुगाङ्ग-प्रासादशिखरगतेन देवेनावलोकितमप्रवृत्तकौमुदीमहोत्सवं कुसुमपुरम् ।

चाणक्यः— आः ज्ञातम् । भवद्भिरेव मदन्तरा प्रोत्साह्य रोषितो वृषलः । किमन्यत् ?

कञ्चुकी— [ सभयं तूष्णीमधोमुखस्तिष्ठति । ]

व्याख्या— प्रणतसम्भ्रम०—प्रणताः कृतप्रणामाः ( अतएव ) ससम्भ्रमं ससत्वरं यथा तथा समुच्चलिताः जातकम्पाः ये भूमिपालाः राजानः तेषां मौलयः चूडाः तेषां मालाः पङ्क्तयः तासु यानि माणिक्यशकलानि रत्नखण्डानि तेषां शिखाभिः ज्वालाभिः पिशङ्गीकृत पिङ्ग़लीकृतं पादपद्मयुगलं चरणारविन्दयुग्मं यस्य सः, सुगृहीतनामधेयः—प्रातःस्मरणीयनामा, देवः—महाराजः, चन्द्रगुप्तः—मौर्यः, आर्य—भवन्त, शिरसा—मस्तकेन, प्रणिपत्य—प्रणम्य, विज्ञापयति—निवेदयति, अकृतक्रियान्तरायम्—अकृतः न विहितः क्रियायाः कर्मणः अन्तरायः प्रत्यूहः यस्य तादृशम् अन्तरायशून्यकर्माणम्, आर्य—भवन्तं, द्रष्टुं—प्रेक्षितुम्, इच्छामि—वाञ्छामि । अयम्—एषः, मत्कृतः—अस्मद्विहितः, कौमुदीमहोत्सवप्रतिषेधः—शरत्पूर्णचन्द्रनिमित्तोद्धवनिषेधः, वृषलश्रवणपथगतः—वृषलस्य श्रवणम् कर्णः तस्य पन्थाः मार्गः तम् गतः प्राप्तः, न खलु—न किमित्यर्थः । सुगाङ्गप्रासादशिखरगतेन—सुगाङ्गश्चासौ प्रासादः तस्य शिखरः उन्नतप्रदेशः तं गतः तेन, देवेन, अप्रवृत्तकौमुदीमहोत्सवम्—अप्रवृत्तः अनारब्धः कौमुदीमहोत्सवः शरत्पूर्णचन्द्रमहोत्सवः यस्मिन् तादृशम्, कुसुमपुरम्, अवलोकितम्—दृष्टम् । भवद्भिरेव—युष्माभिरेव, मदन्तरा—मदनुपस्थितिकाले, प्रोत्साह्य—उत्तेजकवचनैरुद्दीप्येत्यर्थः, वृषलः—मौर्यः, रोषितः—क्रोधितः ।

हिन्दी अनुवाद— [ घुटने टेककर ] जय हो, आर्य की जय हो ।

चाणक्य— [ अभिनय देखकर ] वैहीनरि ! आने का क्या

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१६२मुद्राराक्षसम्

कञ्चुकी— आर्य ! प्रात स्मरणीय महाराज चन्द्रगुप्त न, जिनके दाना चरणारविन्द प्रणामार्थ झुके हुए तथा शीघ्रतावश कम्पित होते हुए राजाओ की चूडा-पत्ति पर स्थित रत्न-खडो की किरणो से लाल-पील बन रहते है, आपका माथा टेककर निवेदन किया है कि यदि किसी कार्य मे विघ्न न पड त। आर्य को देखना चाहता हूँ ।

चाणक्य— वृषल मुझे देखना चाहता है ? वैहीनरि ! मेरे द्वारा किया हुआ कौमुदीमहोत्सव का निषेध वृषल के कान तक तो नही पहुँच गया है ?

कञ्चुकी— और क्या ?

चाणक्य— [ क्रोध के साथ ] ऐ ! किसने कहा ?

कञ्चुकी— [ भय का नाट्य करके ] आर्य प्रसन्न हो । स्वय ही सुगाग प्रासाद की चोटी पर गय हुए महाराज ने कौमुदीमहोत्सव के समारम्भ से शून्य कुसुमपुर को देखा ।

चाणक्य— ओह ! समझ गया । तुम ही लोगो न मेरी अनुपस्थिति म भड़काकर वृषल को कुपित कर दिया है । और क्या ( हो सकता है ) ?

कञ्चुकी— [ भय के साथ नीचे मुंह किये चुप खडा रहता है । ]

टिप्पणी—अकृतक्रियान्तरायम्— जिसके किसी काय मे विघ्न न पडा हो । अन्त मध्ये अयनम् इति अन्तर्√अय् + घञ् भावे=अन्तराय । क्रियाया अतराय । अकृत कियान्तरायो येन यस्य वा, तम् । यह 'आर्यम्' का विशेषण है । अथवा अकृत क्रियातराय यस्मिन् कर्मणि तद् यथा स्यात् तथा । इस विग्रह मे यह दर्शनक्रिया का विशेषण है । **अन्तरा—**बीच मे, अवसर पाकर । यह एक अव्यय है । **प्रोत्साह्य—**प्रोत्साहित या उत्तेजित करके । प्र-उद्√सह्+णिच्+त्वा—ल्यप् ।

चाणक्य — अहो ! राजपरिजनस्य चाणक्योपरि विद्वेषपक्षपात । अथ क्व वृषलस्तिष्ठति ?

कञ्चुकी— [ भय नाट्यन् ] आर्य ! सुगाङ्गप्रासादगतेन देवेनाहमार्य-पादमूल प्रेषित ।

चाणक्य — [ उत्थाय ] कञ्चुकिन् ! सुगाङ्गप्रासादमार्गमादेशय ।

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तृतीयोऽङ्कः । १६३

कञ्चुकी—इत इत आर्यः । [ इत्युभौपरिक्रामतः । ]

कञ्चुकी—अयं सुगाङ्गप्रासादः, शनैरारोढुमर्हत्यार्यः ।

चाणक्यः—[ नाट्येनारुह्यावलोक्य च सहर्षमात्मगतम् । ] अये ! सिंहासनमध्यास्ते वृषलः । साधु साधु !—

नन्दैर्वियुक्तमनपेक्षितराजवृत्तै-
रध्यासितञ्च वृषलेन वृषेण राज्ञाम् ।
सिंहासनं सदृशपार्थिवसङ्गतञ्च
प्रीतिं परां प्रगुणयन्ति गुणा ममैते ॥ १८ ॥

अन्वयः—सिंहासनम् अनपेक्षितराजवृत्तैः नन्दैः वियुक्तं, राज्ञां वृषेण वृषलेन अध्यासितं च, सदृशपार्थिवसङ्गतं च, एते गुणा मम परां प्रीतिं प्रगुणयन्ति ॥ १८ ॥

व्याख्या—सिंहासनम्—नृपासनम्, अनपेक्षितराजवृत्तैः—अनपेक्षितम् अनादृतम् राजवृत्तम् राजधर्मः यैः तादृशैः, नन्दैः एतदाख्यनृपैः, वियुक्तं—विरहितं, राज्ञां—नृपाणां, वृषेण—श्रेष्ठेन, वृषलेन—मौर्येण, अध्यासितं च—अधिष्ठितं च, सदृशपार्थिवसङ्गतं च—सदृशेन योग्येन पार्थिवेन राज्ञा सङ्गतं च—युक्तमपि, एते, गुणाः—अभ्युदयाः, मम—चाणक्यस्य, पराम्—उत्कृष्टाम्, प्रीतिम्—आनन्दं, प्रगुणयन्ति—जनयन्ति ॥ १८ ॥

हिन्दी अनुवाद—चाणक्य—ओह ! चाणक्य के साथ राजा के अनुचरों का अतिशय द्वेष है । अच्छा, वृषल कहाँ है ?

कंचुकी—[भय का नाट्य करता हुआ] आर्य ! सुगाङ्ग प्रासाद में गये हुए महाराज ने मुझे आपके चरणों के समीप भेजा था ।

चाणक्य—[उठकर] कंचुकी ? सुगाङ्ग प्रासाद का मार्ग बताओ ।

कंचुकी—इधर से आर्य ! इधर से । [दोनों घूमते हैं ।]

कंचुकी—यह सुगाङ्गप्रासाद है, धीरे से आर्य चढ़ें ।

चाणक्य—[अभिनय के साथ चढ़कर और देखकर प्रसन्नता के साथ मन में] अहा ! वृषल सिंहासन पर विराजमान है । वाह वाह !—

मु० रा०—१३

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१६४ मुद्राराक्षसम्

सिंहासन राज-धर्म की अवहेलना करने वाले नन्दो से रहित, राजाओ मे श्रेष्ठ मौर्य से सुशोभित तथा अपने अनुरूप राजा मे युक्त (हो गया है)—ये (तीनो) गुण (अभ्युदय) मेरे अतिशय आनन्द को उत्पन्न कर रहे हैं ॥ १८ ॥

टिप्पणी—विद्वेषपक्षपात —द्वेष के विषय मे पक्षपात या आसक्ति । पक्षे पात पक्षपात आसक्तिविशेष इत्यर्थ । विद्वेषे पक्षपात विद्वेषपक्षपात । उभयत्र सुप्सुपा स० । सिंहासनम्—अत्र ‘अधिशीङ्स्थासा कर्म’ इत्यनेन कर्म-सञ्ज्ञा—द्वितीया । अनपेक्षितराजवृत्ते —राजा के धर्म या कर्त्तव्य का पालन न करने वाले । राजा का वृत्त या धर्म चार प्रकार का बताया गया है — ‘न्यायेनार्जनमर्थाना रक्षण पालन तथा । सत्पात्रे विनियोगश्च राजवृत्त चतुर्विधम् ।।' 'अनपेक्षितराजराजे' इस पाठान्तर की व्याख्या होगी—'अना-दृतकुबेरे । नन्द महाधनाढ्य था इसलिए वह अपने सामने कुबेर को भी तुच्छ समझता था । किन्तु इससे अच्छा पाठ 'अनपेक्षितराजवृत्ते ' यही है । वृपेण—श्रेष्ठ । 'शुक्ने मूषिके श्रेष्ठे सुवृते वृषभे वृप' इत्यमर । सदृशपा-र्थिवसङ्गतञ्च—योग्य या अनुरूप राजा से युक्त । समान (स) √दृश् + कन् कर्तरि = सदृश । पृथिव्या ईश्वर इति पृथिवी + अञ् = पार्थिव । इस पद्य मे सम नामक अलकार है, वैदर्भी रीति है, प्रसाद गुण है और वसन्ततिलका छन्द है । इस छन्द का लक्षण १, ८ मे देखिए ॥ १८ ॥

[उपसृत्य] विजयता नृपल ।

[ सिंहासनादुत्थाय चाणक्यस्य पादौ गृहीत्वा ] आर्य ! चन्द्रगुप्त प्रणमति ।

चाणक्य —[पाणौ गृहीत्वा] उत्तिष्ठोत्तिष्ठ वत्स !—

आ शैलेन्द्राच्छिलान्त स्खलितसुरनदीशीकरासारशीता-
तीरान्तान्नैकरागस्फुरितमणिरुचो दक्षिणस्यार्णवस्य ।
आगत्यागत्य भीतिप्रणतनृपशतै शश्वदेव क्रियन्ता
चूडारत्नांशुगर्भस्तव चरणयुगस्याङ्गुलीरन्ध्रभागा ॥ १९ ॥

अन्वय —शिलात स्खलितसुरनदीशीकरासारशीतात् शैलेन्द्रात् , आ,

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तृतीयाऽङ्कः १६५

नैकरागस्फुरितमणिरुचः दक्षिणस्य अर्णवस्य तीरान्तात् आगत्य आगत्य भीति-
प्रणतनृपशतैः तव चरणयुगस्य अङ्गुलीरन्ध्रभागाः शश्वदेव चूडारत्नांशुगर्भाः
क्रियन्ताम् ॥ १६ ॥

व्याख्या—शिलान्तःस्खलित०—शिलानां प्रस्तरखण्डानाम् अन्तः मध्ये स्खलिता पतिता या सुरनदी गङ्गा तस्याः शीकराणां जलकणानां यः आसारः वर्षणं तेन शीतात् शीतलात्, शैलेन्द्रात् हिमालयात् आ मर्यादाीकृत्येत्यर्थः, नैकरागस्फुरितमणिरुचः—नैकैः बहुभिः रागैः वर्णैः स्फुरिताः द्योतमानाः मणिरुचः रत्नभासः यस्मिन् तादृशस्य, दक्षिणस्य अर्णवस्य—दक्षिणसागरस्य, तीरान्तात्—कूलात्, आगत्य आगत्य—पुनः पुनः समेत्य, भीतिप्रणतनृपशतैः—भीत्या भयेन प्रणतानि यानि नृपशतानि राजमण्डलानि तैः, तव—भवतः, चरणयुगस्य—पादद्वयस्य, अङ्गुलीरन्ध्रभागाः—अङ्गुलीनां रन्ध्रभागाः छिद्रप्रदेशाः, शश्वदेव—सर्वदैव, चूडारत्नांशुगर्भाः—चूड़ास्थितानि रत्नानि मुकुटमणयः तेषाम् अंशवः किरणाः गर्भे मध्ये येषां तादृशाः, क्रियन्ताम् विधीयन्ताम् ॥ १६ ॥

हिन्दी अनुवाद—[समीप जाकर] वृषल की विजय हो ।

राजा—[सिंहासन से उठकर चाणक्य के चरणों को पकड़कर] आर्य ! चन्द्रगुप्त प्रणाम करता है ।

चाणक्य—[हाथों में लेकर] वत्स ! उठो उठो ।

शिलाओ पर गिरती हुई गंगा के जलकणों की वर्षा से शीतल हिमालय की ओर से और रंग-बिरंगी चमकती मणियों की कान्ति वाले दक्षिण समुद्र के तट की ओर से आ-आकर डर से झुके हुए सैकड़ो राजाओ से तुम्हारे दोनो चरणों की अंगुलियो के छिद्रभाग निरन्तर ही ( उनके ) मुकुटों में जटित रत्नों की किरणों से युक्त किये जायँ ॥ १९ ॥

टिप्पणी—विजयताम्—अत्र ‘विपराभ्यां जेः’ इत्यनेन आत्मनेपदत्वम् । शैलेन्द्रात्—शैलानाम् इन्द्रः लक्षणया राजा शैलेन्द्रः = हिमालयः, तस्मात् । अत्र आङ्‌योगे ‘पञ्चम्यपाङ् परिभिः’ इत्यनेन पञ्चमी । नैकराग—न एकः नैकः नञर्थेन नशब्देन नुप्सुपा इति समासः । नैकश्च नैकश्च नैकश्च इत्येकशेषः । चूडारत्नांशुगर्भाः—( राजाओं के ) मुकुटों में जड़े हुए रत्नों

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'१६६ मुद्राराक्षसम्

की किरणें जिनके बीच में पड़ती हैं । चूडारत्नानाम् अंशवः गर्भे येषां तादृशा व्यधिकरणबहुव्रीहि स०, गङ्ग्वादीनामाकृतिगणत्वात् सप्तम्यन्तस्य गर्भशब्दस्य परनिपातः । क्रियन्ताम्—अत्र 'आशिषि लिङ्लोटौ' इत्यनेन आशीर्र्थे लोट् । श्लोक का तात्पर्य यह है कि (उत्तर) हिमालय और दक्षिण सागर की सीमा के मध्यवर्ती राजा लोग वशीभूत होकर तुम्हें सदव प्रणाम किया करें । इसमे स्रग्धरा छन्द है । इसका लक्षण १, १ में देखिए ॥ १६ ॥

राजा—आर्यप्रसादादनुभूयत एवैतत्, नाऽऽशास्यते । उपविशत्वार्यः ।
[इत्युभौ यथासनमुपविष्टौ ।]

चाणक्य—वृषल ! किमर्थं वयमाहूताः ?

राजा—आर्यस्य दर्शनेनात्मानमनुग्राहयितुम् ।

चाणक्य—[स्मितं कृत्वा] वृषल ! अलमनेन प्रश्रयेण, न निष्प्रयोजनमधिकारवन्तः प्रभुभिराहूयन्ते, तत् प्रयोजनमभिधीयताम् ।

राजा—आर्य ! कौमुदीमहोत्सवप्रतिषेधस्य किं फलमार्यः पश्यति ?

चाणक्य—[स्मितं कृत्वा] वृषल ! उपालब्धुं तर्हि वयमाहूताः ।

राजा—आर्य ! नोपालब्धुम् ।

चाणक्य—किं तर्हि ?

राजा—विज्ञापयितुम् ।

चाणक्य—वृषल ! यद्येवं तर्हि विज्ञापनीयानामवश्यं शिष्येण रुचयोऽनुरोद्धव्याः ।

राजा—आर्य ! कः संदेहः ? किन्तु न कदाचिदप्यार्यस्य निष्प्रयोजना प्रवृत्तिरिति न प्रश्नावकाशः ।

चाणक्य—[...] ! सम्यग्गृहीतवानसि मदाशयम् । न हि प्रयोजन[...] चाणक्यश्चेष्टते ।

राजा—[...] भीतिर्मां प्रयोजनशुश्रूषा मुखरयति ।

चाणक्य—वृषल ! [...]स्तिव चेत्ताम् । इह खल्वर्थशास्त्रकारा [...] तद्यथा—राजायत्ता, सचिवायत्ताम्,

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तृतीयोऽङ्कः १६७

उभयायत्ताञ्चेति । तत् सचिवायत्तसिद्धेर्भवतः किं फलान्वेषेण ! यतो वयमेवात्र नियुक्ता वेत्स्यामः ।

राजा—[सकोप इव मुखं परावर्तयति ।]

हिन्दी अनुवाद—राजा—आर्य की कृपा से इसका अनुभव ही किया जा रहा है, आज्ञा नहीं । आर्य बैठें । [दोनों यथायोग्य आसन पर बैठ जाते हैं ।]

चाणक्य—वृषल ! क्यों हमें बुलाया गया है ?

राजा—आर्य के दर्शन से अपने को अनुगृहीत कराने के लिए ।

चाणक्य—[मुसकराकर ] वृषल ! यह विनय पर्याप्त हो गया । राजा अधिकारियों को बिना प्रयोजन के नहीं बुलाते । इसलिए प्रयोजन बताओ ।

राजा—आर्य ! कौमुदीमहोत्सव के रोकने का क्या परिणाम आप देखते हैं ?

चाणक्य—[मुसकराकर] वृषल ! तब उलाहना देने के लिए हमें बुलाया गया है ।

राजा—आर्य ! उलाहना देने के लिए नहीं ।

चाणक्य—तब क्यों ?

राजा—निवेदन करने के लिए ।

चाणक्य—वृषल ! यदि ऐसा है तो शिष्य निवेदन करने योग्यों की रुचियों का अनुसरण अवश्य करें ।

राजा—आर्य ! (इसमें) क्या सन्देह ? किन्तु कभी भी बिना प्रयोजन के आर्य की प्रवृत्ति नहीं होती, इसलिए हमें प्रश्न करने का अवसर है ।

चाणक्य—वृषल ! मेरे आशय को ठीक समझा है । प्रयोजन की अपेक्षा किये बिना चाणक्य स्वप्न में भी चेष्टा नहीं करता है ।

राजा—आर्य ! इसलिए प्रयोजन सुनने की इच्छा मुझे मुखरित कर रही है ।

चाणक्य—वृषल ! सुनो । यहाँ अर्थशास्त्र के रचयिताओं ने तीन प्रकार की ही सिद्धि का वर्णन किया है । वह जैसे—राजा के अधीन, मंत्री के

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१६८
मुद्राराक्षसम्

अधीन और दोनों के अधीन। इसलिए मन्त्री के अधीन सिद्धि (प्राप्त करने) वाले तुम्हें परिणाम के अन्वेषण से क्या लाभ ? क्योंकि इस विषय मे नियुक्त हुए हम ही जानेंगे।

राजा—[क्रुद्ध की भाँति मुंह फेर लेता है।]

टिप्पणी—अनुग्राहयितुम्—प्रसन्नतास्पदं कर्तुम्। अनु√ग्रह्+णिच्+तुमुन्। दर्शन् आत्मानम् अनुगृह्णासि=अहं दर्शनेन (अनुक्ते कर्तरि तृतीया) आत्मानम् अनुग्राहयामि। प्रश्रयेण—विनयेन। प्र√श्रि+अच् भावे=प्रश्रय, तेन। करणे तृतीया। अधिकारवन्त —विशिष्टकार्यकारिण। अधिकार अस्ति एषाम् इति अधिकार+मतुप्। उपालब्धुम्—तिरस्कर्तुम्। उप-आ√लभ्+तुमुन्। विज्ञापयितुम्—निवेदयितुम्। वि√ज्ञा+णिच्, पुक् तुमुन्। विज्ञापनीयानाम्—निवेदनीयानां गुह्यानामित्यर्थ। रुचय —प्रवृत्तय । अनुरोधव्या —मानयितव्या। प्रश्नावकाश —पृच्छावसर । अनपेक्षमाण —अनवलोकयन् । प्रयोजनशुश्रूषा—हेतुश्रवणेच्छा। श्रोतुम् इच्छा इति √श्रु+सन्+अ भावे स्त्रियाम्=शुश्रूषा। प्रयोजनस्य शुश्रूषा। मुखरयति—वक्तुं प्रवर्तयति। वाचाल बना रही है। मुखम् अस्ति अस्य महद् इति मुख+र मत्वर्थे=मुखर=वाचाल। तं करोति इति मुखर+णिच् (नामधातु)+लट्—तिप्=मुखरयति। राजायत्ताम्—नृपाधीनाम्। आ√यत्+क्त कर्मणि=आयत्ता। राज्ञि आयत्ता सुपुपा स०, ताम्। फलान्वेषणेन—प्रयोजनजिज्ञासया। अत्र करणे तृतीया। नियुक्ता—व्यापृता। वेत्स्याम —वेदिष्याम । √विद् (ज्ञाने)+लृट्—मस्। यहाँ इट् का आगम हो जाता है, इसलिए ‘वेत्स्याम’ रूप अशुद्ध है। शुद्ध रूप ‘वेदिष्याम’ होता है। विद् धातु अन्यार्थक है और अनेक गणों में पठित है—‘सत्तायां विद्यते ज्ञाने वेत्ति विन्ते विचारणे। विन्दते—विन्दति प्राप्तौ श्यन्लुक्श्नम्शेश्ष्विद क्रमात्’ ॥

[ततो नेपथ्ये वैतालिकाँ पठत।]

एक —

आकाशं काशपुष्पच्छविमभिभवता भस्मना शुक्लयन्ती
शीतांशोरंशुजालैर्जलधरमलिनां क्लिन्दती कृत्तिमैभीम् ।

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तृतीयोऽङ्कः १६६

कापालीमुद्वहन्ती स्रजमिव धवलां कौमुदीमित्यपूर्वा
हासश्रीराजहंसा हरतु तनुरिव क्लेशमैशी शरदः ॥ २० ॥

अन्वयः—काशपुष्पच्छविम् अभिभवता भस्मना आकाशं शुक्लयन्ती, शीतांशोः अंशुजालैः जलधरमलिनाम् ऐभीं कृत्तिं क्लिन्दती, कौमुदीमिव धवलां कापालीं स्रजम् उद्वहन्ती, हासश्रीराजहंसा इति अपूर्वा शरदिव ऐशी तनुः वः क्लेशं हरतु ॥ २० ॥

व्याख्या—काशपुष्पच्छविम्—काशपुष्पस्य काशकुसुमस्य छविं कान्तिम्, अभिभवता—न्यक्कुर्वता, भस्मना—भूत्या, आकाशं—गगनं, शुक्लयन्ती—धवलयन्ती, शीतांशोः—चन्द्रस्य, अंशुजालैः—किरणसमूहैः, जलधरमलिनाम्—जलधरः—मेघ इव या मलिना नीला ताम्, ऐभीं कृत्तिं—गजचर्म, क्लिन्दती—सिञ्चन्ती (‘क्लिश्रती’ इति पाठे तद्गतनैल्य तिरस्कुर्वन्तीत्यर्थः), कौमुदीमिव—चन्द्रिकामिव, धवलां—स्वच्छां, कापाली—नरकपालकल्पितां, स्रजं—मालाम्, उद्वहन्ती—धारयन्ती, हासश्रीराजहंसा—प्रशस्ताट्टहाससम्पत्, इति—अतो हेतोः, अपूर्वा—अतिरमणीया, शरदिव—शरदृशुरिव, ऐशी—शाम्भवी, तनुः—मूर्तिः, वः—युष्माकं, क्लेशं—कष्टं, हरतु—अपनयतु। (पक्षे शरदो विशेषणं सर्वं क्वचिद्विभक्तिविपरिणामेन क्वचिच्च यथोक्तरूपेणेति ज्ञेयम्) भस्म, अभिभवन्त्या—तिरस्कुर्वन्त्या, काशपुष्पच्छव्या—काशकुसुमशोभया, आकाशं, शुक्लयन्ती, शीतांशोः, अंशुजालैः, ऐभीं, कृत्तिमिव, जलधरमलिनां—मेघमालिन्यं, क्लिन्दती—अपसारयन्ती (धातूनामनेकार्थत्वात्), कापालीं, स्रजमिव, धवलां, कौमुदीम्, उद्वहन्ती, हासश्रीराजहंसा—हासश्रीरिव राजहंसो यस्यां तादृशी, इति, अपूर्वा, शरत्, वः, क्लेशं, हरतु ॥ २० ॥

हिन्दी अनुवाद—[नेपथ्य में दो वैतालिक (दो श्लोक) पढ़ते हैं।]

पहला—(ताण्डवनृत्य के प्रारंभ होने पर) काशपुष्प की कान्ति को तिरस्कृत करने वाले भस्म से आकाश को धवल बनाती हुई, चन्द्रमा के किरण-समूहों से मेघ के समान नील (वर्ण के) गज-चर्म को सींचती हुई, चाँदनी के समान शुभ्र कपाल-माला को धारण किये हुई और राजहंस के समान (धवल) हास्य-शोभा से युक्त होने के कारण विलक्षण शरद् ऋतु की तरह शिव की मूर्ति आपके क्लेश का हरण करे। (शरद्-पक्ष में) भस्म

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२०० | मुद्राराक्षसम्


को तिरस्कृत करने वाली काशपुष्प की कान्ति से आकाश को धवल बनाती हुई, चन्द्रमा के किरण-समूहों से गजचर्म के समान मेघ के मालिन्य को दूर करती हुई, कपाल-माला के समान शुभ्र चन्द्रिका को धारण करती हुई और हास्य की शोभा के समान राजहंसों से युक्त होने के कारण विलक्षण शरद् ऋतु आपके (राक्षस और मलयकेतु द्वारा उत्पन्न किये हुए) दुःख को दूर करे ॥ २० ॥

टिप्पणी—वैतालिकौ—स्तुतिपाठक, समय की सूचना देने वाले। विविधस्तालः नितालः। तेन चरति वा विविधस्तालः प्रयोजनमस्य इति विताल+ठक्, तस्य इञादेशः = वैतालिकः, तौ। एषः—पहला वैतालिक चाणक्य का गुप्तचर है। शुक्लयन्तीम्—शुभ्रं करोति इति शुक्ल+णिच् (नामधातु)+शतृ स्त्रियाम्। ऐभीं कृत्तिम्—गज सम्बन्धी चर्म को। इभस्य इयम् इति इभ+अण्+ङीप्=ऐभी, ताम्। कहते हैं कि शंकर गज नामक असुर को मारकर उसकी खाल को धारण किये हुए हैं। कापालीम्—कपालानाम् इयम् इति कापाली कपाल+अण्+ङीप्, ताम्। हास्यश्रीराजहंसा—राजहंस के समान हास्य की शोभा अर्थात् अट्टहास से युक्त। हास्यस्य श्रीः षष्ठीतत्०। हास्य-श्रीः राजहंसः इव इति उपमितकर्मधारय स०। सा अस्ति अस्याम् इति हास्यश्री-राजहंस+अच्—टाप्। ऐशी—शंकर सम्बन्धिनी। ईशस्य इयम् इति ईश+अण्+ङीप्। इस श्लोक में उपमा अलङ्कार है और स्रग्धरा छन्द है ॥ २० ॥

अपि च—

प्रत्यग्रोन्मेषजिह्या क्षणमनभिमुखी रत्नदीपप्रभाणा-
मात्मव्यापारगुर्वी जनितजडतया जृम्भिते साङ्गभङ्गे ।
नागाङ्कं मोक्तुमिच्छोः शयनमुरु फणाचक्रवालोपधानं
निद्राच्छेदाभिताम्रा चिरमवतु हरेर्दृष्टिराकेकरा वः ॥ २१ ॥

अन्वय—फणाचक्रवालोपधानम् उरु नागाङ्क शयनं मोक्तुमिच्छोः हरेः प्रत्यग्रोन्मेषजिह्या क्षणम् रत्नदीपप्रभाणाम् अनभिमुखी साङ्गभङ्गे जृम्भिते जनित-जडलवा आत्मव्यापारगुर्वी आकेकरा निद्राच्छेदाभिताम्रा दृष्टिः वः चिरम् अवतु ॥ २१ ॥

व्याख्या—फणाचक्रवालोपधानम्—फणानां स्फटानां चक्रवालं मण्डलम् तदेव

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तृतीयोऽङ्कः २०१

उपधानं शिरोधानं यस्मिन् तादृशम्, उरु—महत्, नागाङ्कम्—सर्पराजक्रोडरूपं, शयनं—शय्यां, मोक्तुमिच्छोः—त्यक्तुं कामयमानस्य, हरेः—विष्णोः, प्रत्यग्रोन्मेषजिह्मा—प्रत्यग्रः नवः यः उन्मेषः उन्मीलनं तेन जिह्मा मन्दा, क्षणं—किञ्चित्कालम्, रत्नदीपप्रभाणाम् रत्नदीपानां दीपरूपाणां नागराजशिरोमणीनाम्, अनभिमुखी—असम्मुखी, साङ्गभङ्गैः—अङ्गभङ्गसहितैः जृम्भितैः—गात्रविनामैः, जनितजललवा—जनितः उद्गमितः जललवः वारिविन्दुः यस्यां तादृशी, (अतएव) आत्मव्यापारगुर्वी—दर्शनात्मकस्वक्रियाऽसमर्था, आकेकरा—अर्धनिमीलिता, निद्राच्छेदाभिताम्रा—निद्रायाः स्वापस्य छेदः भङ्गः तेन अभिताम्रा अतिरक्ता, दृष्टिः—नेत्रं, वः—युष्मान्, चिरं—दीर्घकालम्, अवतु—रक्षतु ॥२१॥

हिन्दी अनुवाद—और भी—फणा-मंडल के बने तकियो वाली तथा विशाल शेषनाग के शरीर रूपी शय्या को छोड़ने के इच्छुक ( भगवान् ) विष्णु की सद्यः खुलने के कारण अलसायी, कुछ देर के लिए रत्नदीपों ( अर्थात् दीप रूपी नाग-राज की शिरोमणियों ) की शिखा पर न टिक पाती हुई, अँगड़ाई के साथ जँभाई लेने से उत्पन्न अश्रु-कणों वाली, ( अतएव ) अपने व्यापार ( अर्थात् देखने ) में असमर्थ अधखुली और निद्रा-भंग के कारण अत्यंत लाल दृष्टि चिरकाल तक आपकी रक्षा करे ॥२१॥

टिप्पणी—फणाचक्रवालोपधानम्—फणा-समूह रूपी तकियो से युक्त । 'स्फटायां तु फणा द्वयोः' इति 'चक्रवाल तु मण्डलम्' इति चामरः । नागाङ्कम्—नागराज के शरीर या गोद रूप । जिह्मा—मन्द, अलस । आकेकरा—अर्धनिमीलित, आधी बंद । आकेकरा दृष्टि की परिभाषा यह है—'दृष्टिराकेकरा किञ्चित् स्फुटापाङ्गे प्रसारिता । मीलितार्धपुटा लोके ताराव्यावर्तनोत्तरा ॥' इस श्लोक में रूपक और स्वभावोक्ति अलंकारो की संसृष्टि है । इसमें प्रसाद गुण है, लाटी रीति है और स्रग्धरा छन्द है ॥२१॥

द्वितीयः—

सत्त्वोत्कर्षस्य धात्रा निधय इव कृताः केऽपि कस्यापि हेतो-
र्जेतारः स्वेन धाम्ना मदसलिलमुचां नागयूथेश्वराणाम् ।
दंष्ट्राभङ्गं मृगाणामधिपतय इव व्यक्तमानावलेपा-
नाऽऽज्ञाभङ्गं सहन्ते नृवर नृपतयस्त्वादृशाः सार्वभौमाः ॥२२॥

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२०२ मुद्राराक्षसम्

अन्वय—नृवर ! धात्रा सत्त्वोत्कर्षस्य निधय इव वृता व्यक्तमानावलेपा केऽपि त्वादृशा सार्वभौमा नृपतयः स्वेन धाम्ना मदमलिलमुचां नागयूथेश्वराणां जेतार मृगाणामधिपतय दंष्ट्राभङ्गमिव कस्यापि हेतो आज्ञाभङ्गं न सहन्ते ॥२२॥

व्याख्या—नृवर !—मनुजश्रेष्ठ !, धात्रा—ब्रह्मणा, सत्त्वोत्कर्षस्य—सत्त्वस्य बलस्य य उत्कर्ष आधिक्यं तस्य, निधय इव—आगारा इव, वृता—उत्पादिता, ( अतएव ) व्यक्तमानावलेपा—व्यक्त स्फुट मान स्वाभिमान अवलेप-गर्वश्च येषां ते, केऽपि—उत्कृष्टसामर्थ्यवन्त, त्वादृशा—भवद्विधा, सार्वभौमा—सर्वभूमिपतय, नृपतय—राजान, स्वेन—स्वकीयेन, धाम्ना—तेजसा, मदमलिलमुचां—मदमलिलं दानवारि मुञ्चन्ति ये तादृशानाम् मदस्राविणामित्यर्थ, नागयूथेश्वराणाम्—नागानां हस्तिनां यूथा समूहा तेषाम् ईश्वरा अधिपतय तेषाम्, जेतार—जयिन, मृगाणां—पशूनाम्, अधिपतय—राजान सिंहा इत्यर्थ, दंष्ट्राभङ्गमिव—दशनत्रुटिमिव, कस्यापि हेतो—कुतोऽपि निमित्तात्, आज्ञाभङ्गम्—आदेशव्याघातम्, न सहन्ते—न मृष्यन्ति ॥२२॥

हिन्दी अनुवाद—दूसरा—हे नरश्रेष्ठ ! ब्रह्मा के द्वारा बल की अधिकता की निधि के समान उत्पन्न किये हुए और ( अतएव ) प्रकट स्वाभिमान एवं गर्व से युक्त कोई आप-जैसे चक्रवर्ती राजा अपने तेज के कारण आज्ञा के उल्लंघन को उसी तरह किसी भी कारण से सहन नहीं करते हैं जैसे मदजल को बहाने वाले हाथियों के झुण्डों के विजेता मृगपति ( सिंह ) दाढ़ के तोड़े जाने को ( सह्य नहीं करते ) ॥२२॥

टिप्पणी—द्वितीय—दूसरा वैतालिक राक्षस का गुप्तचर स्तनकलश है । निधय—निधीयन्ते स्थाप्यन्ते एषु इति नि√धा+कि 'कर्मण्यधिकरणे च' इत्यनेन । व्यक्तमानावलेपा—वि√अञ्ज्+क्त कर्मणि = व्यक्त । √मन्+घञ् भावे = मान । अव√लिप्+घञ् भावे = अवलेप । मानश्च अवलेपश्च इति मानावलेपो द्वन्द्व० स० । व्यक्तौ मानावलेपौ येषां ते बहुव्रीहि स० । सार्वभौमा—भूमण्डल के शासक । सर्वभूमे ईश्वरा वा सर्वभूमौ विदिता इति सर्वभूमि+अण्, 'अनुशतिकादीनां च' इति सूत्रेण उभयपदवृद्धि । कस्यापि हेतो—देखिए १, १ में 'कस्य हेतो' की टिप्पणी । इस श्लोक में उत्प्रेक्षा और

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तृतीयोऽङ्कः २०३

उपमा अलंकारों की संसृष्टि है। इसमें ओज गुण है, वैदर्भी रीति है और स्रग्धरा छन्द है ॥२२॥

अपि च—

भूषणाद्युपभोगेन प्रभुर्भवति न प्रभुः।
परैरपरिभूताज्ञस्त्वमिव प्रभुरुच्यते ॥२३॥

**अन्वयः—**प्रभुः भूषणाद्युपभोगेन न प्रभुः भवति। त्वमिव परैः अपरिभूताज्ञः प्रभुः उच्यते ॥२३॥

**व्याख्या—**प्रभुः—नृपः, भूषणाद्युपभोगेन—भूषणादीनाम् अलंकरणादीनाम् उपभोगेन अनुभवेन हेतुना, न प्रभुर्भवति—न राजा सम्पद्यते। त्वमिव—भवानिव, परैः—अन्यैः, अपरिभूताज्ञः—अपरिभूता अप्रतिहता आज्ञा आदेशो यस्य तादृशः, प्रभुः—राजा, उच्यते—कथ्यते ॥२३॥

**हिन्दी अनुवाद—**और भी—राजा आभूषण आदि के उपभोग करने (मात्र) से राजा नहीं होता है। (किन्तु) आप ही की तरह दूसरो से तिरस्कृत न होने वाली आज्ञा से सम्पन्न (होने पर) राजा कहलाता है ॥२३॥

**टिप्पणी—**भूषणाद्यु०—इसका तात्पर्य यह है कि आज्ञा का उल्लंघन न होना ही राजत्व का कारण है। इस प्रकार आज्ञा का उल्लंघन करते हुए चाणक्य की यदि तुम उपेक्षा करते हो तो वही तत्त्वतः राजा है न कि तुम। इसलिए उसे क्षमा न करो। इस श्लोक में उपमा अलंकार है और अनुष्टुप् छन्द है ॥२३॥

चाणक्यः—[आकर्ण्यात्मगतम्] प्रथम तावद्विशिष्टदेवतास्तुतिरूपेण प्रवृत्तशरद्गुणप्रख्यापनमाशीर्वचनम्। इदमपरं किमिति नावधारयामि। [विचिन्त्य] आः, ज्ञातम्। राक्षसस्यायं प्रयोगः। आः दुरात्मन् राक्षसहतक! दृश्यसे, जागर्ति खलु कौटिल्यः।

**राजा—**आर्य वैहीनरे! दापयाभ्यां वैतालिकाभ्यां सुवर्णशतसहस्रम्।

**कंचुकी—**यदाज्ञापयति देवः। [इत्युत्थाय परिक्रामति।]

चाणक्यः—[सक्रोधम्] वैहीनरे! तिष्ठ तिष्ठ, न गन्तव्यम्। वृषल! किमयमस्थाने एव महानर्थोत्सर्गः क्रियते?

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२०४मुद्राराक्षसम्

राजा— आर्येणैव सर्वतो निरुद्धचेष्टाप्रसरस्य मम बन्धनमिव राज्यं न राज्यमिव ।

चाणक्य— वृषल ! स्वयमनभियुक्तानां राज्ञामेते दोषा भवन्ति । तद्यदि न सहसे, तदा स्वयमेवाभियुज्यताम् ।

राजा— एते वयं स्वकर्मण्यभियुज्यामहे।

चाणक्य— प्रियं न , वयमपि स्वकर्मण्यभियुज्यामहे ।

हिन्दी अनुवाद—चाणक्य— [ सुनकर मन में ] पहला तो देवविशेषो की स्तुति रूप में प्रस्तुत शरद् ऋतु के गुणों को प्रकट करने वाला आशीर्वाद है । यह दूसरा क्या है, यह निश्चय नही कर पा रहा हूँ । [सोचकर] अच्छा, समझ गया । यह राक्षस का प्रयोग है । ओह दुष्ट पाजी गद्दन ! देखे जा रहे हो । चाणक्य जाग रहा है ।

राजा— आर्य वैहीनरि ! इन दोनो वैतालिकों को एक-एक लाख सुवर्ण-मुद्रायें दिला दो ।

कञ्चुकी— महाराज की जैसी आज्ञा । [उठकर घूमता है ।]

चाणक्य— [क्रोध के साथ] वैहीनरि ! ठहरो ठहरो, मत जाओ । वृषल ! क्यो अनुपयुक्त स्थान पर ही महान् धन का त्याग कर रहे हो ?

राजा— इस प्रकार आर्य के द्वारा सब तरह से रोकी गई गतिविधि वाले मेरे लिए तो राज्य बन्धन के समान है, न कि राज के समान ।

चाणक्य— वृषल ! स्वयम् स्वतन्त्रता से राज-कार्य न करने वाले राजाओं के ये दोष होते हैं (कि वे गुरुजनो की आज्ञा का सहन नही करते) । इसलिए यदि तुम्हें सहन नही होता है तो स्वयं राज-काज देखो ।

राजा— ये हम अपने कार्य को स्वतन्त्र रूप से करेंगे ।

चाणक्य— हमारे लिए अच्छा है । हम भी अपने कार्य में लग जाते हैं ।

टिप्पणी—प्रथमम्— पहले वैतालिक का पठन । विशिष्टदेवतास्तुति-रूपेण— विशिष्ट देवता (शिव और विष्णु) की स्तुति रूप से । विशिष्टा देवता कर्मधारय स०, तस्याः स्तुतिः , तस्याः रूपम् षष्ठीतत्०, तेन करणे तृतीया । प्रवृत्तशरद्गुणप्रख्यापनम्— उपस्थित शरद् ऋतु के गुणों का कीर्तन । प्रवृत्ता