मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
by महाकवि विशाखदत्त
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Read in context१६० | मुद्राराक्षसम्
पर्यायेण कालक्रमेण पातितम् अवतारितं हिमं शीतम् उष्णम् आतपञ्च येन तादृश, धाम—तेज , धाम्ना—स्वतेजसा, अतिशाययति—अतिक्रामयति ॥१७॥
हिन्दी अनुवाद—[ देख कर भय के साथ ] वे ये आप चाणक्य विराजमान हैं ।
जो विश्व को पराजित करके ( अर्थात् नन्द और उसके अमात्य आदि को नीति से मोहित करके ) एक ही समय नन्दराज और मौर्यराज को ( क्रमशः ) अस्त और उदय देते हुए सूर्य के सर्वत्र न जाने वाले तथा कालक्रम से सर्दी और गर्मी को गिराने वाले तेज को अपने तेज से अतिक्रान्त कर रहा है ॥ १७ ॥
टिप्पणी—लोकम्—संसार या लोगों को । सूर्य-पक्ष में लोक का तात्पर्य है लोकालोक नामक पर्वत से । पर्यायपातितहिमोष्णम्—कालक्रम से सर्दी और गर्मी को उतारने वाले । परि—आ√इ+अच् वा √अय्+घञ् भावे = पर्याय । हिमञ्च उष्णञ्च इति हिमोष्णम् वा हिमोष्णे 'विप्रतिषिद्धं चानधिकरणवाचि' इत्यनेन एकवद्भावस्य विकल्पात् । अतिशाययति—अतिक्रमण कर रहा है, नीचा दिखा रहा है । अति√शी+णिच्+लट्—तिप् । यहाँ भाव यह है कि सूर्य सहस्रधाम होते हुए भी क्रमशः सर्दी और गर्मी देते हैं, किन्तु ये चाणक्य तो एक ही काल में नन्द के लिए शीत और मौर्य के लिए उष्ण हो गए । इसलिए ये सूर्य से भी अधिक प्रतापशाली हैं । इस श्लोक में अतिशयोक्ति अलंकार व्यतिरेक अलंकार से संकीर्ण है । इसमें पाञ्चाली रीति है, ओज गुण है और वसन्ततिलका छन्द है । इस छन्द का लक्षण १, ८ में देखिए ॥ १७ ॥
[ जानुभ्यां भूमौ निपत्य ] जयतु जयत्वार्य ।
चाणक्य—[ नाट्येनावलोक्य ] वैहीनरे ! किमागमनप्रयोजनम् ।
कञ्चुकी—आर्य ! प्रणतसम्भ्रमसमुच्चलितभूमिपालमौलिमाला-माणिक्यशकलशिखापिशङ्गीकृतपादपद्मयुगल सुगृहीतनामधेयो देवश्च-न्द्रगुप्त आर्यं शिरसा प्रणिपत्य विज्ञापयति—'अकृतक्रियान्तरायमार्यं द्रष्टुमिच्छामि इति ।