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मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

by महाकवि विशाखदत्त

DevanagariSanskritpublished488 pages

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तृतीयोऽङ्कः १६७

उभयायत्ताञ्चेति । तत् सचिवायत्तसिद्धेर्भवतः किं फलान्वेषेण ! यतो वयमेवात्र नियुक्ता वेत्स्यामः ।

राजा—[सकोप इव मुखं परावर्तयति ।]

हिन्दी अनुवाद—राजा—आर्य की कृपा से इसका अनुभव ही किया जा रहा है, आज्ञा नहीं । आर्य बैठें । [दोनों यथायोग्य आसन पर बैठ जाते हैं ।]

चाणक्य—वृषल ! क्यों हमें बुलाया गया है ?

राजा—आर्य के दर्शन से अपने को अनुगृहीत कराने के लिए ।

चाणक्य—[मुसकराकर ] वृषल ! यह विनय पर्याप्त हो गया । राजा अधिकारियों को बिना प्रयोजन के नहीं बुलाते । इसलिए प्रयोजन बताओ ।

राजा—आर्य ! कौमुदीमहोत्सव के रोकने का क्या परिणाम आप देखते हैं ?

चाणक्य—[मुसकराकर] वृषल ! तब उलाहना देने के लिए हमें बुलाया गया है ।

राजा—आर्य ! उलाहना देने के लिए नहीं ।

चाणक्य—तब क्यों ?

राजा—निवेदन करने के लिए ।

चाणक्य—वृषल ! यदि ऐसा है तो शिष्य निवेदन करने योग्यों की रुचियों का अनुसरण अवश्य करें ।

राजा—आर्य ! (इसमें) क्या सन्देह ? किन्तु कभी भी बिना प्रयोजन के आर्य की प्रवृत्ति नहीं होती, इसलिए हमें प्रश्न करने का अवसर है ।

चाणक्य—वृषल ! मेरे आशय को ठीक समझा है । प्रयोजन की अपेक्षा किये बिना चाणक्य स्वप्न में भी चेष्टा नहीं करता है ।

राजा—आर्य ! इसलिए प्रयोजन सुनने की इच्छा मुझे मुखरित कर रही है ।

चाणक्य—वृषल ! सुनो । यहाँ अर्थशास्त्र के रचयिताओं ने तीन प्रकार की ही सिद्धि का वर्णन किया है । वह जैसे—राजा के अधीन, मंत्री के