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मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

by महाकवि विशाखदत्त

DevanagariSanskritpublished488 pages

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१६२मुद्राराक्षसम्

कञ्चुकी— आर्य ! प्रात स्मरणीय महाराज चन्द्रगुप्त न, जिनके दाना चरणारविन्द प्रणामार्थ झुके हुए तथा शीघ्रतावश कम्पित होते हुए राजाओ की चूडा-पत्ति पर स्थित रत्न-खडो की किरणो से लाल-पील बन रहते है, आपका माथा टेककर निवेदन किया है कि यदि किसी कार्य मे विघ्न न पड त। आर्य को देखना चाहता हूँ ।

चाणक्य— वृषल मुझे देखना चाहता है ? वैहीनरि ! मेरे द्वारा किया हुआ कौमुदीमहोत्सव का निषेध वृषल के कान तक तो नही पहुँच गया है ?

कञ्चुकी— और क्या ?

चाणक्य— [ क्रोध के साथ ] ऐ ! किसने कहा ?

कञ्चुकी— [ भय का नाट्य करके ] आर्य प्रसन्न हो । स्वय ही सुगाग प्रासाद की चोटी पर गय हुए महाराज ने कौमुदीमहोत्सव के समारम्भ से शून्य कुसुमपुर को देखा ।

चाणक्य— ओह ! समझ गया । तुम ही लोगो न मेरी अनुपस्थिति म भड़काकर वृषल को कुपित कर दिया है । और क्या ( हो सकता है ) ?

कञ्चुकी— [ भय के साथ नीचे मुंह किये चुप खडा रहता है । ]

टिप्पणी—अकृतक्रियान्तरायम्— जिसके किसी काय मे विघ्न न पडा हो । अन्त मध्ये अयनम् इति अन्तर्√अय् + घञ् भावे=अन्तराय । क्रियाया अतराय । अकृत कियान्तरायो येन यस्य वा, तम् । यह 'आर्यम्' का विशेषण है । अथवा अकृत क्रियातराय यस्मिन् कर्मणि तद् यथा स्यात् तथा । इस विग्रह मे यह दर्शनक्रिया का विशेषण है । **अन्तरा—**बीच मे, अवसर पाकर । यह एक अव्यय है । **प्रोत्साह्य—**प्रोत्साहित या उत्तेजित करके । प्र-उद्√सह्+णिच्+त्वा—ल्यप् ।

चाणक्य — अहो ! राजपरिजनस्य चाणक्योपरि विद्वेषपक्षपात । अथ क्व वृषलस्तिष्ठति ?

कञ्चुकी— [ भय नाट्यन् ] आर्य ! सुगाङ्गप्रासादगतेन देवेनाहमार्य-पादमूल प्रेषित ।

चाणक्य — [ उत्थाय ] कञ्चुकिन् ! सुगाङ्गप्रासादमार्गमादेशय ।