मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
by महाकवि विशाखदत्त
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मुद्राराक्षसम्
तादृश पटलान्तं यस्य तत् । यह 'शरणम्' का विशेषण है । शरणम्—घर, कुटी । 'शरण गृहरक्षितो ' इत्यमर । इस श्लोक मे स्वभावोक्ति नामक अलकार है, वैदर्भी रीति है, प्रसाद गुण है और मालिनी छन्द है । मालिनी का लक्षण यह है—'ननमयययुतेय मालिनी भोगिलोकै ' ॥ १५ ॥
तत् स्थाने खल्वस्य वृषलो देवश्चन्द्रगुप्त इति । कुत —
स्तुवन्त्यश्रान्तास्या क्षितिपतिमभूतैरपि गुणै
प्रवाच कार्पण्याद् यदवितथवाचोऽपि कृतिन ।
प्रभावस्तृष्णाया म खलु सकल स्यादितरथा
निरीहाणामीशस्तृणमिव तिरस्कारविषय ॥ १६ ॥
**अन्वय—**अवितथवाच कृतिन अपि यत् कार्पण्यात् प्रवाच ( सन्त ) अश्रान्तास्या ( भूत्वा ) अभूतैरपि गुणै क्षितिपतिं स्तुवन्ति स खलु तृष्णाया सकल प्रभाव । इतरथा निरीहाणाम् ईश तृणमिव तिरस्कारविषय स्यात् ॥ १६ ॥
**व्याख्या—**अवितथवाच —अवितथा सत्या वाक् वाणी येषा तादृशा , कृतिन अपि—विद्वांस अपि, यत्, कार्पण्यात्—दैन्यात् हेतो , प्रवाच —वाचाला ( सन्त ), अश्रान्तास्या —अश्रान्त श्रमरहितम् आस्य मुख येषा तादृशा ( भूत्वा ), अभूतै अपि—अविद्यमाने अपि, गुणै —दयादाक्षिण्यादिभि , क्षितिपति—राजान, स्तुवन्ति—उपश्लोकयन्ति, स , खलु—निश्चितम्, तृष्णाया —लोभस्य, सकल —सम्पूर्ण, प्रभाव —माहात्म्यम् । इतरथा—अन्यथा, निरीहाणाम्—कामनारहितानाम् ( जनाना सम्बन्धे ), ईश —प्रभु राजा इत्यर्थ , तृणमिव—शष्पमिव, तिरस्कारविषय —अनादरपात्र, स्यात्—भवेत् ॥ १६ ॥
**हिन्दी अनुवाद—**इसलिए इस ( चाणक्य ) का महाराज चन्द्रगुप्त को वृषल (शूद्र) कहना उचित है । क्योकि—
सत्य वाणी बोलने वाले विद्वान् भी जो दीनता के कारण वाचाल तथा अश्रान्तमुख होकर अविद्यमान गुणो से भी राजा की स्तुति करते हैं, वह निश्चित रूप से तृष्णा का पूरा प्रभाव है, अन्यथा निरीह व्यक्तियो के लिए प्रभु (राजा) तृण के समान तिरस्कार का विषय (अर्थात् तुच्छ) होता है ॥ १६ ॥