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मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

by महाकवि विशाखदत्त

DevanagariSanskritpublished488 pages

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Page 290

तृतीयोऽङ्कः २०३

उपमा अलंकारों की संसृष्टि है। इसमें ओज गुण है, वैदर्भी रीति है और स्रग्धरा छन्द है ॥२२॥

अपि च—

भूषणाद्युपभोगेन प्रभुर्भवति न प्रभुः।
परैरपरिभूताज्ञस्त्वमिव प्रभुरुच्यते ॥२३॥

**अन्वयः—**प्रभुः भूषणाद्युपभोगेन न प्रभुः भवति। त्वमिव परैः अपरिभूताज्ञः प्रभुः उच्यते ॥२३॥

**व्याख्या—**प्रभुः—नृपः, भूषणाद्युपभोगेन—भूषणादीनाम् अलंकरणादीनाम् उपभोगेन अनुभवेन हेतुना, न प्रभुर्भवति—न राजा सम्पद्यते। त्वमिव—भवानिव, परैः—अन्यैः, अपरिभूताज्ञः—अपरिभूता अप्रतिहता आज्ञा आदेशो यस्य तादृशः, प्रभुः—राजा, उच्यते—कथ्यते ॥२३॥

**हिन्दी अनुवाद—**और भी—राजा आभूषण आदि के उपभोग करने (मात्र) से राजा नहीं होता है। (किन्तु) आप ही की तरह दूसरो से तिरस्कृत न होने वाली आज्ञा से सम्पन्न (होने पर) राजा कहलाता है ॥२३॥

**टिप्पणी—**भूषणाद्यु०—इसका तात्पर्य यह है कि आज्ञा का उल्लंघन न होना ही राजत्व का कारण है। इस प्रकार आज्ञा का उल्लंघन करते हुए चाणक्य की यदि तुम उपेक्षा करते हो तो वही तत्त्वतः राजा है न कि तुम। इसलिए उसे क्षमा न करो। इस श्लोक में उपमा अलंकार है और अनुष्टुप् छन्द है ॥२३॥

चाणक्यः—[आकर्ण्यात्मगतम्] प्रथम तावद्विशिष्टदेवतास्तुतिरूपेण प्रवृत्तशरद्गुणप्रख्यापनमाशीर्वचनम्। इदमपरं किमिति नावधारयामि। [विचिन्त्य] आः, ज्ञातम्। राक्षसस्यायं प्रयोगः। आः दुरात्मन् राक्षसहतक! दृश्यसे, जागर्ति खलु कौटिल्यः।

**राजा—**आर्य वैहीनरे! दापयाभ्यां वैतालिकाभ्यां सुवर्णशतसहस्रम्।

**कंचुकी—**यदाज्ञापयति देवः। [इत्युत्थाय परिक्रामति।]

चाणक्यः—[सक्रोधम्] वैहीनरे! तिष्ठ तिष्ठ, न गन्तव्यम्। वृषल! किमयमस्थाने एव महानर्थोत्सर्गः क्रियते?