मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)
Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary
by भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव
About this granth
Mirabai, the sixteenth-century Krishna devotee associated with the royal house of Mewar, is one of the most loved voices of the bhakti movement. Her padas addressed to "Giridhar Gopal", in a mix of Rajasthani, Braj and Gujarati, have travelled widely in oral and devotional tradition.
This volume is the Meera Brihat Pad Sangrah (मीराँ बृहद् पदावली), whose title page names Padmavati "Shabnam" as compiler. It was published by Lok Sevak Prakashan, Banaras, and distributed by Sahitya Bhavan Ltd., Allahabad; the imprint gives Samvat 2004 and 2006. The introduction notes that almost every song bearing Mira's name used to be accepted as hers, and presents this collection as part of a newer effort to gather her authentic padas.
The songs are grouped by theme: the guru and the company of saints, love for Giridhar Gopal and descriptions of his form, the pain of separation, Mira's replies to the Rana and the poison episode, phag and Holi songs, and surrender and detachment, with a biographical section at the start. It runs to about 365 pages.
वियोगाभिव्यक्ति ६९
श्री चतुर्वेदी जी का कहना बहुत यथार्थ प्रतीत होता है, क्योकि
"मारु" और "मारुडा" दोनो एक ही शब्द है । "मारूड़ा" कोई स्वतंत्र
शब्द न होकर "मारु" का ही रूपान्तर मात्र है। अपने बुजुर्गो या अन्य
किसी भी विशेष सम्मानित व्यक्ति के प्रति 'मुजरौ" विनम्रता पूर्वक
नमस्कार के अर्थ मे आज भी प्रयुक्त होता है ।
२५
तुम हयाँ ही रहो राम रसियाँ, थांरी साँवरी सूरत मे मन बसिया ।
क्याने तो राम जी घोडा सिणगारो, क्या ने पाषर कसिया।
चुण चुण कलियाँ सेज सँवारु, ओर गादी तकिया ।
बोहोत दिना की पंथ निहारूँ, तुम आया रग रञ्चिया ।
मीराँ के प्रभु हरि अविनासी, चरण कमल म्न बसिया ।। १०६।।†
पदाभिव्यक्ति असगत है ।
२६
नेहा समद बिच नाव लगी है, बाल न लगत बही जात अकेली ।
लाज को लगर छूटि गयो है, बही जात बिन दाम की चेरी ।
मलहन कर से छाड दई है, आस बडी गोपाल ज्यो तेरी ।
अब के नाम लगावो नातर, लोग हँसेगे बजा के हतेरी ।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, मेरी सुध लीज्यो प्रभु आन सबेरी ।।१०७।।†
पदाभिव्यक्ति असगत है। प्रथम पक्ति मे 'बाल' के स्थान पर
सम्भवतः 'पाल' शब्द हो ।
२७
माई म्हाने मोहन मित्र मिलाय, मोहन मित्र मिलाय ।
रसियो है उर अंतर बसियो, या बिनु कछु न सुहाय ।
पात लियो¹ साँवरियो लोभी, राखूं कठ लगाय ।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, तन की तपत बुझायं । ।।१०८।।
१ सुगठित शरीरवाला।
७० मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
२८
मे खडी निहारू बाट, चितवन चोट कलेजे बह गई, सुन्दर स्याम सूं घाट।
मथुरा मे कुबज्या कर राखी, महाजन की सी हाट।
केसर चदन लेपन कीन्हो, मोहन तिलक ललाट।
हमारा पिलैंग जडाऊ छोड् या, बणिया¹ रेशमी पीली पाट।
क्याँ पर राजी भयो साँवरो, चेरी के नही खाट।
अजहूँ न आयो कँवर नन्द को, क्यॉरी लागी चाट।
छाड गयो मरुधार साँवरो, बिन अकल को जाट²।
आप बिना गोपी सब ब्रज की, व्याकुल भई निराट।
मीराँ के प्रभु गोपी दरसन दीज्यो, करज्यो आनन्द ठाट। ॥१०९॥†
२९
उधो, म्हाँरे मन की मन मे रही।
एक समै मोहन घर आये, मे दधि मथत रही।
या दुनियाँ को झूठो धधो, मै हरि को बिसर गई।
वा कपटी की का कहूँ, उधो बचन प्रतीत नही।
नेन हमारे ऐसे झूरै, उलटी गंग बही।
इत गोकुल उत मथुरा नगरी, बीच मे जमुना बही।
आप मोहन जी पार उतर गया, हम सै कछु ना कही।
ब्रज बनिता को संग छाडि कै, कुबज्याँ सग लई।
मीराँ के प्रभु गिरिधर अविनासी, चरणा लिपट रही। ॥११०॥
अभिव्यक्ति असगत और अर्थहीन है।
३०
तुम आवो हो कृपा निधान बेग ही।
मेरे मदिर आये प्रभु निकसे, कदी³ महलहूँ न आये मै दीदार देख री।
१ बना हुआ, २ राजस्थान की स्थानीय जाति विशेष, जो परिश्रम और सत्यता
के लिये प्रसिद्ध होते हुए भी सर्वथा बुद्धिहीन मानी जाती हैं। ३ कभी।
वियोगाभिव्यक्ति ७१
मेरे मंदिर आये प्रभु निकसि क्यूँ गये, दीन के दयाली कठोर क्यूँ भये ।
दीपक मेरे हाथ लियों बाट जोवती, राम हूँ न आये सारी रैण रोवती ।
पिया के दरस बिन फिरु डोलती, मीराँ तो तुम्हारी दासी राम बोलती ।
॥१९१॥†
पदाभिव्यक्ति सर्वथा असंगत है। कही कही द्वितीय पंक्ति मे
‘कदी’ शब्द के बदले ‘देख ही’ और अन्तिम पंक्ति मे “डोलती’ शब्द
के बदले ‘झूरती’ का प्रयोग भी मिलता है।
३१
होली पिया बिन मोहि न भावै, घर आँगण न सुहावै ।
दीपक जोय¹ कहा करु सजनी, पिय परदेस रहावै ।
सूनी सेज जहर ज्यूँ लागे, सुसक सुसक जिय जावै ।
नीद नही आवै ।
कब की ठाढी मे मग जोऊँ, निस दिन बिरह सतावै ।
कहा कहू कुछ कहत न आवै, हिवडा अति अकुलावै ।
पिया कब दरस दिखावै ।
ऐसा है कोई परम सनेही, तुरन्त सन्देशो ल्यावै ।
वा बिरियाँ² कद³ होसी, मोकूँ हस करि निकट बुलावै ।
मीराँ मिल होली गावै । .॥१९२॥
प्रथम पति मे प्रयुक्त ‘पिया’ शब्द के बदले “हरी’ शब्द का भी
प्रयोग मिलता है।
३२
किण संग खेलूँ होली, पिया तजि गए हे अकेली ।
माणिक मोती हम सब छोडे, गले मे पहनी सेली॒ ।
१ जलाकर, २ समय, ३ कब,
७२ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
मुझे दूर क्यूँ मेली¹।
अब तुम प्रीत और सूं जोडी, हम से क्यूँ करी पहेली।
बहु दिन बीते अजहूँ न आए, लग रही तालामेली²।
किण बिलाय³ हेली।
स्याम बिन जिवडो मुरझावै, जैसे जल बिन बेली।
मीराँ कूँ प्रभु दरसण दीजो, जनम जनम की चेली।
दरस बिन खडी दुहेली⁴। ॥१९३॥
पदाभिव्यक्ति से नाथ पथ का प्रभाव स्पष्ट होता है। "सेली'
नाथ पथी जोगियो के ही मुख्य चिन्हो मे से एक है। अन्तिम पक्ति से
व्यक्त होती परित्यक्ता (दुहेली) की भावना अन्य राजस्थानी के
पदो मे भी मिलती है। यह विचारणीय है।
३३
इक अरज सुनो मोरी, मै किन सग खेलूँ होरी।
तुम तो जाँय विदेसा छाये, हम से रहै चित चोरी।
तन आभूषण छोड़यो सब ही, तज दियो पाट पटोरी⁵।
मिलन की लग रही डोरी।
आप मिल्या बिन कल न परत है, त्याग दियो तिलक तमोली।
मीराँ के प्रभु मिलज्यो माधव, सुणज्यो अरज मोरी।
दरस बिन बिरहणी दोरी⁶। ॥१९४॥
उपर्युक्त दोनो पद में भाव-साम्य स्पष्ट है, यद्यपि पूर्व पद की
भाषा पर राजस्थानी प्रभाव कुछ विशेष है।
३४
होली पिया बिन, मोहि लागे खारी, सुनो री सखी मोरी प्यारी।
सूनो गाँव देस सब सूनी, सूनी सेज अटारी।
१ करदी, २ बेचैनी, ३ भुलाए, ४ परित्यक्ता, ५ साज श्रृंगार, ६ दुखी।
वियोगाभिव्यक्ति ७३
सूनी बिरहन पिव बिन डोलै, तज दई पिव प्यारी।
भई हूँ या दुख कारी।
देस विदेस सदेस न पहुँचे, होइ अदेशा भारी।
गिणता घिस गई, रेख ॱआँगलियाँ की सारी।
अजहूँ न आये मुरारी।
बाजत झांझ मृद्ग मुरलिया, बाज रही हकतारी।
आयो बसत कत घर नाही, तन मे जर भया भारी।
स्याम मन कहा बिचारी।
अब तो मेहर१ करो मुझ ऊपर, चित है सुनो हमारी।
मीराँ के प्रभु मिलि गयो माधो, जनम जनम की कुआरी।
लगी दरसण की तारी। ॥१९५॥†
इस पद मे विरोधाभास है। होली के बाद ही बसत का साथ ही
साथ वर्णन है। पद की बारहवी पक्ति मे मिलन की अभिव्यक्ति
है जो कि शेष पदाभिव्यक्ति से सर्वथा भिन्न पडती है।
होली वर्णन के उपर्युक्त चारो पद मीराँ के शेष सभी पदो से
सर्वथा भिन्न पडते है। इन की शैली भी सर्वथा भिन्न है। इनकी भाषा
प्रमुखत ब्रजभाषा होते हुए भी राजस्थानी से प्रभावित है। इनमे
प्रयुक्त जो कुछ राजस्थानी शब्द आये है, वह ठेठ राजस्थानी के हैं।
शुद्ध ब्रजभाषा और ठेठ राजस्थानी का यह सम्मिश्रण विचारणीय है।
पद स० ३३ और ३४ मे टेक मे 'माधो' का प्रयोग एक और विचार-
णीय प्रश्न है। मीराँ के पदो की परम्परा मे यह सर्वथा नूतन है।
बहुत सम्भव है कि ये पद किसी अन्य कवि के हो। 'मीर माधौ' नामक
कवि के पदो से मीराँ के पदो का सम्मिश्रण हुआ भी है। देखे पद स० ८।
१ कृपा।
७४ मीरॉँ-बृहद्-पद-संग्रह
ब्रजभाषा में प्राप्त पद
१
मै तो चरण लगी गोपाल ।
जब लागी तब कोऊ न जाने, अब जानी ससार ।
किरपा कीजै, दरसण दीजै, सुध लीजै तत्काल ।
मीराँ कहै प्रभु गिरिधर नागर, चरण कमल बलिहार ॥११६॥
पद की द्वितीय पक्ति से व्यक्त होती भावना विशेष
विचारणीय है।
२
आलीरी मोरे नैनन बान पडी ।
चित चढी मेरे माधुरी मूरत, उर बिच आन अडी ।
कब की ठाढी पथ निहारूँ, अपने भवन खडी ।
कैसे प्राण पिया बिन राखूँ, जीवन भूल जडी ।
मीराँ गिरिधर हाथ बिकानी, लोग कहै बिगडी ॥ ११७ ॥
इस पाठ मे पहली पक्ति का निम्नाकित पाठान्तर भी मिलता है।
“नैणा मोरे बाण पडी, भाई, मोहि दरस दिखाई”।
३
भाई, मेरे नैनन बान पडी री ।
जा दिन नैना श्यामहिं देख्यो, बिसरत नाहि घरी री ।
चित बस गई साँवरी सूरत, उर ते नाहिं टरी री ।
मीराँ हरि के हाथ बिकानी, सूरबस है निबरी री ॥ ११८ ॥
वियोगाभिव्यक्ति ७५
४
नैन परि गई ऐसी बानि ।
नेक निहारत पिया जू के मुख तन धुरि गई कुलकानि ।
राणाजी विषरो प्यालो भेज्यो, मैं सिर लीनी मानि ।
मीराँ के गिरिधर मिले हो, पुरबली१ पहिचानि ।।११९।।
५
नैणा री हो पड गई बाण ।
बार बार निरखूँ मुख सोभा, छूट गई कुलकाण२ ।
कोई भला कहो, कोई बुरा कहो, मैं सिर लीनी ताण३ ।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, पुरबली पिछाण४ ।।१२०।।
एक ही भाव के द्योतक उपर्युक्त चारो पद विशेष विचारणीय है । सभी
पदो की प्रथम पक्ति मे भाव सर्वथा एक है और भाषा भी लगभग
एक ही है । शेष पद मे विभिन्न भावनाओ और घटनाओ का वर्णन
है तथापि “लोक लाज” और “कुल कानि” के उल्लघन की अभिव्यक्ति
सभी पदो मे प्राप्त है । पहले दो पद (स० ३ और ४) की भाषा शुद्ध
राजस्थानी है । इनकी अभिव्यक्ति भावना-द्योतक है । तीसरे पद
(स० ५) की अन्तिम पक्तियो पर राजस्थानी का प्रभाव है । इन
पक्तियो मे राणा द्वारा विष भेजे जाने की भी अभिव्यक्ति है । इसको
देखते बहुत सम्भव प्रतीत होता है कि विष दिए जाने की कथा का
राजस्थान मे ही अधिक प्रचार रहा हो । पद स० ५ की भाषा पर
राजस्थानी प्रभाव कुछ विशेष स्पष्ट है । यह पद पद स० ४ का रूपान्तर-
सा प्रतीत होता है । वस्तुत ये चारो ही पद एक दूसरे के गेय रूपान्तर-
से प्रतीत होते है ।
६
जब कै तुम बिछुडे प्रभु जी कबहुँ न पायो चैन ।
ब्रिह बिथा कासूँ कहूँ सजनी, कवन आवै औन ।
१ पूर्व जन्म की, २ कुल की मर्यादा, ३ चढा लिया, ४ परिचय ।
७६ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
एक टगटगी पिया पथ निहारूँ, भई छै मासी रैन।
मीराँ के प्रभु हरि अविनासी, दुख मेलण सुख देश ॥१२१॥
अन्तिम पंक्ति मे 'मेलण' शब्द के स्थान पर 'मेटण' शब्द की अर्थ
संगति ठीक बैठती है।
७
मै जाण्यो नही प्रभु को मिलन कैसे होय री।
आए मोरे सजना, फिरि गए अंगना, मै अभागण रही सोय री।
फारूँगी चीर करूँ गलकथा, रहूँगी वैरागण होय री ।
चुडिया फोरूँ माग बिखेरू, कजरा मै डारूँ धोय री ।
निसि बासर मोहि बिरह सतावै, कल न परत पल मोय री।
मीराँ के प्रभु हरि अविनासी, मिलि बिछुडी मत कोई री।
॥१२२॥
इस पद मे ब्रजभाषा और खडी बोली का अजीब सम्मिश्रण हुआ
है। पद की तीसरी और चौथी पक्तियो पर खडी बोली का प्रभाव
विशेष स्पष्ट है। यह भी एक विचारणीय पहलू है कि इन दोनो ही
पक्तियो की अभिव्यक्ति नाथ परम्परा के प्रभाव की द्योतक है। अन्तिम
पक्ति से व्यक्त होती भावना 'मिलि बिछुड़न मत कीज्यो' प्राय इन्ही
शब्दो मे अन्य पदो मे भी मिल जाती है।
'बृहद्राग रत्नाकर' में 'लच्छीराम' नामक किसी सत का
निम्नांकित एक पद मिलता है। इन दोनो पदो में भाव और भाषा
का गहरा साम्य है। बहुत सम्भव है कि निम्नाकित पद ही कुछ घट
बढ और हेर फेर के साथ मीराँ के नाम पर चल पड़ा हो।
नीद तोहि बेचूँगी आली, जो कोई गाहक होय।
आए मोहन फिरि गए अंगना, मै बैरन रही सोय।
कहा करुँ कछु वश न मेरो, आयो धन दियो खोय।
लछीराम प्रभु अबके मिले तो, राखूँगी नैन समोय।
—पृष्ठ ७९, पद २९२।
प्रयोगाभिव्यक्ति ५७
८
रानी हो।
हारते, सब रैण बिहानी हो।
ـــــ ख तई, मन एक न मानी हो।
बिन देखे कल ना परे, जिय ऐसी ठानी हो।
अंग छीन व्याकुल भई, मुख पिय पिय बानी हो।
अन्तर वेदन विरह की, वह पीर न जानी हो।
ज्यो चातक घन को रटै, मछरी जिमि पानी हो।
मीराँ व्याकुल बिरहणी, सुध बुध बिसरानी हो ॥१२३॥
पदाभिव्यक्ति से पश्चाताप की भावना ही प्रकट होती है।
ऐसी अभिव्यक्ति राजस्थानी के कुछ पदो में भी पायी जाती है।
९
पलक न लागै मेरी स्याम बिन।
हरि बिन मथुरा ऐसी लागे, शशि बिन रैन अधेरी।
पात पात वृन्दाबन ढूँढ्यो, कुज कुज ब्रज केरी।
ऊँचे खडे मथुरा नगरी, तले बहै जमुना गहरी।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, हरि चरणन की चेरी ॥१२४॥
पद की तीसरी पक्ति का शेष पद से पूर्वापर सबन्ध नही बैठता ।
१०
नीद नही आवे जी सारी रात।
करवट लेकर सेज टटोलूँ, पिया नही मेरे साथ।
सगरी रैन मोहे तरफत बीती, सोच सोच जिया जात।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, आज भयो परभात ॥१२५॥
७८
मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
११
मे विरहणी बैठी जागूँ, जगत सब सोवै री आली ।
विरहणी बैठी रग महल मे, मोतियन की लड पोवै ।
इक विरहणी हम ऐसी देखी, अँसुवन की माला पोवै ।
तारा गिन गिन रैण बिहानी, सुख की घडी कब आवै ।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, मिल के बिछुड न जावै ।
॥१२६॥
१२
दरस बिन दूखण लागै नैण ।
अब के तुम बिछुरे प्रभुजी, कबहूँ न पायो चैन ।
सबद सुणत मेरी छतियाँ काँपै, मीठे मीठे बंन ।
बिरह बिथा कासूँ कहूँ सजनी, बह गई करवत ऐन ।
कल न परत पल हरि मग जोवत, भई छमासी रैण ।
मीराँ के प्रभु कब रे मिलोगे, दुख मेटण सुख दैण । ॥१२७॥
पद की तीसरी और पाचवी पक्तियों का निम्नाकित पाठान्तर
पाया जाता है।
तीसरी पक्ति- "सबद सुणत मेरी छतिया कम्पे, मीठे लागै तुम बेन"
या
"सबद सुणत मेरी छतिया कम्पे, मीठे लागै बैन"।
और
पाँचवी पक्ति- "एकटकी पथ निहारूँ, भई छमासी रैन।"
१३
जोहने गोपाल फिरूँ, ऐसी आवत मन मे
अवलोकत बारिज बदन, बिबस भई तन मं ।
मुरली कर लकुट लेऊँ, पीत बसन धारूँ ।
पछी गोप भेष मुकुट, गो झन सग चारूँ ।
वियोगाभिव्यक्ति ˙ ७९
हम भईं गुल काम लता, वृन्दाबन रैना।
पसु पछी मरकर मुनी, श्रवण सुनत बैना।
गुरुजन कठिन कानि, कासो री कहिये।
मीराँ प्रभु गिरिधर मिलि, ऐसे ही रहिये। ॥१२८॥†
पद की छठी और अन्तिम पक्तियो का अर्थ स्पष्ट नहीं होता।
अन्तिम पंक्ति की अभिव्यक्ति से मिलन की ही भावना लक्षित होती
हैं जबकि शेष पद से वियोग भावना ही स्पष्ट हो उठती है।
आराध्य के अनुकूल वैष्णव परम्परा प्रभावित वेश भूषा को
स्वीकार कर लेने की अभिव्यक्ति इस पद की विशेषता है।
१४
हो गए श्याम दूइज के चन्दा।
मधुबन जाईं भये मधुबनिया, हम पर डारो प्रेम का फंदा।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, अब तो नेह परो मदा। ॥१२९॥
इस पद से व्यक्त होती भावना 'अब तो नेह परो मदा' अन्य वियोग
द्योतक और नाथ परम्परा प्रभावित पदो मे भी मिलती हैं। नाथ
परम्परा प्रभावित पदो मे यह भावना बहुत ही स्पष्ट है।
१५
कान्हा तेरी रे जोवत रह गई बाट।
जोवत जोवत इक पग ठारी, कालिन्दी के घाट।
कपटी प्रीत करी मनमोहन, या कपटी की बात।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, दे गयो ब्रज चाट। ॥१३०॥
१६
अखिया कृष्ण मिलन की प्यासी।
आप तो जाय द्वारिका छाये, लोक करत मेरी हाँसी।
८० मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
आम की डार कोयलिया बोलै, बोलत सब्द उदासी ।
मेरे तो मन ऐसी आवे, करवत लेहो कासी ।
मीराँ के प्रभु गिरिधर लाल, चरण कँवल की उदासी ॥१३१॥†
पद की प्रथम पंक्ति सूरदास के पद से हू बहू मिलती है। अन्तिम
पंक्ति मे प्रयुक्त 'उदासी' प्रयोग विचारणीय है।
१७
मन हमारा बाध्यो भाई, कँवल नैन अपने गुन ।
तीषण तीर बेध शरीर, दूरि गयो भाई, लाग्यो तब ।
जाण्यो नाही, अब न सह्यो जाई री भाई ।
तत मत औषध कर तक परि न जाई, है कोऊ ।
उपकार करै, कठिन दर्द री भाई ।
निकटि हो तुम दूरि नाहि, बेगि मिलो आई, मीराँ ।
गिरधर स्वामी दयाल, तनकी तपति बुझाई रे भाई ।
कमल नैन अपने गुन बाध्यो भाई ॥१३२॥†
श्री सूर्यनारायण जी चतुर्वेदी से मिला यह पद "ग्रंथ साहिब,
भाई बन्दे की बीड़" से उद्धृत है।
पद की दूसरी, चौथी और छठी पंक्तियो का अन्तिम हिस्सा क्रमश.
तीसरी पाँचवी और सातवीं के प्रारम्भ मे लगा कर पढ़ने से अर्थ संगति
ठीक से बैठ जाती है, अन्यथा नही ।
१८
बिरहनी बावरी सी भई ।
ऊँची चढ चढ अपने भवन मे टेरत हाय दई ।
ले अँचरा मुख अँसुवन पोछत उघरे गात सही ।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, बिछुरत कछु ना कही ॥१३३॥
'बिछुरत कछु ना कही' जैसी अभिव्यक्ति इस पद की
विशषता है ।
वियोगाभिव्यक्ति ८१
१९
हरि तुम काय कूँ प्रीति लगाई।
प्रीति लगाई परम दुख दीयो, कैसी लाज न आई।
गोकुल छोड़ि मथुरा के जयुँवा मे कोण बडाई।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नांगर, तुम कूँ नन्द दुहाई ॥१३४॥
२०
पिया इतनी बिनती सुनो मोरी, कोई कहियो रे जाय।
और न सूं रस बतियाँ करत हो, हम से रहै चित चोरी।
तुम बिन मेरे और न कोई, मै सरनागत तोरी।
आवन कह गए अजहूँ न आये,दिवस रहै अब थोरी।
मीराँ के प्रभु कब रे मिलोगे, अरज करूँ करजोरी ॥१३५॥
'दिवस रहै अब थोरी' जैसी अभिव्यक्ति इस पद की विशेषता
है। "आवन कह गए अजहूँ न आए" पदाभिव्यक्ति कई अन्य पदो मे
भी मिलती है। ऐसे कुछ पदो मे अवधि सूचक 'पेउर पलटिया काला
केस" जैसी अभिव्यक्ति भी मिलती है, परन्तु उपर्युक्त भावना किसी भी
अन्य पद मे प्राप्त नही।
२१
देखो सांईया, हरि मन काठ कियो।
आवन कहि गयो, अजहू न आयो, करि करि बचन गयो।
खान पान सुध बुध सब बिसरी, कैसि करि मै जियों।
बचन तुम्हारे तुम्ही बिसरे, मन मेरो हर लियो।
मीराँ कहै प्रभु गिरिधर नागर, तुम बिन फाटत हियो ॥१३६॥
२२
पिया कूँ बता दे मेरे, तेरा गुण मानूँगी।
खान पान मोहि फीको सो लागै, नैन रहे दोय छाय।
६
८२ -मीराँ-बृहद्-पद-संग्रहँ
बार बार मैं अरज करत हूँ, रैण दिन जाय।
मीराँ के प्रभु वेग मिलोगे, तरस तरस जिय जाय ।।१३७।।†
२३
पिया जी थे तो कटारी मारी।
जिन को पिव परदेस बसत हैं, सो क्यूँ सोवे न्यासी।
. . . .... नहीं भावत, आकूँ सदा देहारी।
जैसे भवगत जत कौंचरी, सो गत भई है हमारी।
बिन दरसण कल न परत है, तुम हम दिये बिसारी।
मीराँ के प्रभु तुम्हरे मिलन कूँ, चरण कमल पर वारी ।।१३८।।†
पदाभिव्यक्ति में संगति का अभाव है।
२४
सोवत ही पलको मे मै तो, पलक लागी पल में पिऊ आये ।
मै जु उठी प्रभु आदर देण कूँ, जाग परी पिव ढूँढ न पाये ।
और सखी पिव सूत गमाये, मै जु सखी पिव जागी गमाये ।
आज की बात कहा कहूँ सजनी, सुपना मे हरि लेत बुलाये ।
वस्तु एक जब प्रेम की पकरी, अजि भये सखि मन से भाये ।
वो म्हारों सुने अरु गुनि है, बाजे अधिक बजाये ।
मीराँ कहै सत्त कर मानो, भक्ति मुक्ति फल पाये ।।१३९।।†
स्वप्नानुभूति का ऐसा वर्णन इस पद की विशेषता है। पद की
छठी पंक्ति का अर्थ अस्पष्ट है।
२५
स्याम को सदेशो आयो, पतियाँ लिखाय माय।
पतियाँ अनूप आईं, छतियाँ लगाय लीनी ।
अचल की दे दे ओट, ̢ऊधो पै बंधाई है।
वियोगाभिव्यक्ति ८३
बाल की जटा बनाऊँ, अग तो भभूत लाऊँ।
फाडूॅ चीर करुँ गलकंथा, जोगिन बन जावूंगी।
इन्द्र के नगारे बाजै, बदल की फौज आई।
तोपखाना पैसखाना उतरा आया बाग मे।
मथुरा उजार कीन्ही गोकुल बसाय लीन्ही।
कुब्जा सो बाध्यो हेत, मीराँ गाय सुनाई है॥१४०॥†
पदाभिव्यक्ति मे पूर्वापर सबध का सर्वथा अभाव है तथा प्राय
क्रिया पद सभी आधुनिक हिन्दी मे है।•
२६
मेरे प्रीतम रामकूँ लिख भेजूँ री पाती।
स्याम सदेशो कबहुँ न दीन्हो, जानिं बूझि गुझबाती।
डगर बुहारुँ पथ निहारुँ, रोय रोय अखियाँ राती।
तुम देख्यां बिन कल न परत है, हियो फाटत मेरी छाती।
मीराँ के प्रभु कबर मिलोगे, पूरब जनम का साथी॥१४१॥
२७
मतवारो बादर आए रे, हरि को सदेशो कछु नही लाए रे।
दादुर मोर पपइया बोले, कोयल सबद सुनाए रे।
कारी अधियारी बिजरी चमकै, बिरहिन् अति डरपाये रे।
गाजै बाजै पवन मधुरिया, मेहा अति झड लाए रे ।
कारी नाग बिरह अति जारे, मीराँ मन हरि भाए रे ॥१४२॥
२८
बादल देखि झरी हो श्याम, बादल देखि झरी।
काली पीली घटा उमगी, बरस्यो एक घरी।
जित जाऊँ तित पाणी ही पाणी, हुई सब मोम हरी।
जाकाँ पिया परदेस बसत है, मीजूं बाहर खरी।
मीराँ के प्रभु गिरिधर• नागर, कीज्यो प्रीत खरी॥१४३॥
८४ मीराँ-वृहद्-पद-संग्रह
प्रथम पंक्ति मे "झरी" प्रयोग के बदले "डरी' प्रयोग भी
मिलता है।
२९
सावण दे रह्यो जोरा रे, घर आओ जो स्याम मोरा रे।
उमड घुमड चहु दिसि से आया, गरजत है घनघोरा रे।
दादुर मोर पपीहा बोले, कोयल कर रही सोरा रे।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, ज्यो वारु सो हो थोरा रे ॥१४४॥
३०
बरसे बदरिया सावन की, सावन की मन भावन की।
सावन मे उमड्यो मेरो मनवां, भनक सुनी हरि आवन की।
उमड घुमड चहु दिसि ते आयो, दामिनी दमक झर लावन की।
नन्हीं नन्ही बूँदन मेहा बरसे, सीतल पवन सोहावन की।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, आनन्द मगल गावन की ॥१४५॥
पदाभिव्यक्ति मे विरोधाभास है। पहले की पक्तयों से विरोध
और अन्तिम पक्तियो से आनन्द ही लक्षित होता है।
३१
सुनी हो मै हरि आवन की आवाज।
म्हैल चढि चढ़ि जोऊं सजनी, कब आवै महाराज।
दादुर मोर पपीहा बोले, कोयल मधुरै साज।
उमग्यो इन्द्र चहु दिसि बरसे, दामिणी छोड़ी लाज।
धरती रुप नवा नवा धरिया, इन्द्र मिलण के काज।
मीराँ के प्रभु हरि अविनासी, बेग मिलो महाराज ॥१४६॥
वियोगाभिव्यक्ति ८५
३२
कोई कहियो रे प्रभु आवन की।
आवन की मन भावन की, कोई।
आप नही आवै, लिख नहीं भेजै बाण पड़ी ललचावन की।
एक दोइ नैना कह्यो नही मानै, नदिया बहै जस सावन की।
कहा करूं कछु बस नही मेरो, पांख नही उड जावन की।
मीराँ कहै प्रभु कबर मिलोगे, चेरी भई हू तेरे दावन की।।१४७।।†
उपर्युक्त तीनों पदों मे कुछ ऐसा भाव साम्य है कि तीनों ही पद
एक दूसरे के गेय रूपान्तर प्रतीत होते है। "भनक सुनी हरि आवन की"
भावना की ही पुनरुक्ति हुई है। "सुनिहौ मै हरि आवन की आवाज"
(पद स० ३१) और "कोई कहियो प्रभु आवन की" (पद स० ३२)
मे प्रथम दो पदो मे वर्षा और श्रावण का वर्णन है। तीसरे पद की
अभिव्यक्ति के अनुसार मीराँ की आँखो पर ही श्रावण छाया हुआ
है। अन्तिम पद (स० ३२) चन्द्र सखी के निम्नांकित पद के कुछ
विशेष निकट पडता है।
'चन्द्रसखी' के नाम पर भी एक ऐसा ही निम्नांकित पद पाया
जाता है। निश्चित रूपेण यह कहना कि पद मौलिक रूपेण किसका है,
अति दुरूह है। फिर भी, मीराँ के पदो के साथ हुए भाव और भाषा
के अन्तर पर विचार करते हुए यह अधिक सम्भव प्रतीत होता है कि
पद मौलिक रूपेण 'चन्द्रसखी' का ही हो।
कोई कहियो रे मोहन आवन की।
आप तो जाय द्वारिका छाये, हम को जोग पठावन की।
आप न आवै, पतियाँ न भेजै, बात करै ललचावन की।
ए दोऊ नैण कहियो न मानै, घटा उमड़ रही सावन की।
दिल चाहत उड जाय मिलूँ, पर पाख नही उड़ जावन की।
चन्द्रसखी भज बालकृष्ण छबि, पर कमल लपटावेन की।
पद स० ३२ से इस पद का बहुत अधिक साम्य है।
यहाँ पृष्ठ का संपूर्ण और यथावत पाठ प्रस्तुत है:
८६ मीराँ-वृहद्-पद-संग्रह
गुजराती में प्राप्त पद
१
क्यारेँ¹ आवसे घेर कान रे, जोसिडा जोस² जुवो³ ने ,
दहीयो हमारी वाला दुर्बल थई केरे, थई गई थाकेली⁴ पान रे .
वृन्दा ते वनमां वाले रास रच्यो छे, सहस्त्र गोपी मा एक कानरे ।
बाई मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, भावे भरिया भगवान र ।
॥१४८॥†
पदाभिव्यक्ति में पूर्वापर संबध का निर्वाह नही हुआ है ।
२
कागद कोण लई जाय रे, मथुरामां लखीए, प्रीत थोडी थोडी थाय⁵ रे ।
प्रीत तमीने मलवा ने तलखे, ने जोशोमति अन्न न खाय रे ।
वृन्दाबन की कुज गलियन मे, रोता रजनी जाय रे ।
मीराँ बाई के प्रभु गिरिधर ना गुण, चरण कमल चित चोर रे ॥१४९॥†
अन्तिम पंक्ति का शेष पद से समन्वय नही होता ।
३
कही जइ⁶ करूं रे पोकार, कारी मुनी धावे लागे थे,
मे कही जई करूं पोकार रे ।
पिऊ जी हमारो पारधि भयो थे, मै तो भइ हरिणी शिकार रे ।
दूर से थी आइ गोली लग गई,शीरू थे,नीकर गयी पारम पार रे ।
प्रेम नी कटारी पुने⁷ खेच कर मारी था, थई गई हाल बेहाल रे ।
मीराँ के प्रभु गिरिधरना गुण, हो गई पारम पार रे ॥१५०॥†
१ कब, २ पंचाग, ३ देखी, ४ सूखा हुआ, ५ होती है, ६ जाकर,
७ मुझको ।
वियोगाभिव्यक्ति ८७
४
शामले मल्या त बिसारी, ओधव ने वाले शामले मेल्या ते बिसारी ।
प्रीत करी ने पालव१ पकडो वाला, प्रेम नी कटारी मुने मारी ।
गोकुल थी मथुरा मै गयो छो वा'ला, कुब्जा सोलागी छै तस्ली२ ।
मीराँ बाई के प्रभु गिरिधर ना गुण, चरण कमल बलिहारी ।।१५१।।†
५
ब्रजमा कयम रेवाशे३ ओधव ना वा'ला, ब्रज मा कयम रेवाशे ।
आठ दाहडानी४ अवध करी ने गया छो, वा'ला खटमास थय छेहरिने ।
वृन्दाबन की कुजगलिगाँ वाला, बैठा छे मुख मोरली धरी ने ।
मीराँ के प्रभु गिरिधर ना गुण, वा'ला अमोरह्या छे आसडा भरी ने ।
।।१५२।।†
पदाभिव्यक्ति मे विरोधाभास स्पष्ट है ।
६
आव जो म्हॉरे नेडे५, ओधव न वा'ला, आव जो म्हारे नैडे ।
म्हॉरे आगणिये आबो मेर्यो, वा'ला कानुडो आवीने सायॉ बैडे ।
अमो जल जमुना भरवा गया ता, वाला कानुडो पड्यो छे म्हारी कैड़े ।
मीराँ बाई के प्रभु गिरिधर ना गुण, वा'ला हरि मलवा मन हेरे ।।१५३।।†
पद की तीसरी पंक्ति शेष पद से सर्वथा भिन्न पडती है । पद मे
पूर्वापर सम्बन्धका भी सर्वथा अभाव है ।
७
कांनी भावे देखन जाऊं, श्यामलो वेरागी भयो रे ।
कोरी मटकी मां नही जमाऊं, गुबालेन हो कर जावूँरे ।
१ आँचल, २ नेह, ३ रहा जायगा, ४ दिनकी, ५ नजदीक, पास।
८८ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
गोरे गोरे अंग पर भभूत लगावूूँ, जोगण होकर जाऊ रे।
मीराँ बाई के प्रभु गिरिधर नागर, श्याम सुदर पार पावूँ रे ।। १५४।।†
इस तरह की अभिव्यक्ति का यह एक ही पद प्राप्त है ।
८
गोविन्दा ने देश ओघ मुने लेई, जारे गोविन्दा ने देश ।
मने रे मोहन जी ए मेली, १ रे बिसारी, करडूूँ मोरी करम की रेख ।
हार तजुगी, शणगार तजुगी, तजुगी काजल की रेख ।
चीर ने फाडी वा'ला कफनी पेरुगी, लेऊगी जोगन का वेश ।
गोकुल तजुगी मे मथुरा तजुगी, तजुगी मे ब्रज केरी देश ।
मीराँबाई के प्रभु गिरधरना गुण, चरण कमल चित्त सग रहेश ।
।।१५५।।†
पदाभिव्यक्ति पर नाथ पथ का और भाषा पर खडी बोली का
प्रभाव स्पष्ट हैं।
९
आवो ने सलुणा म्हारा मीठडा मोहन, आँख लडी माँ तमने राखूं रे ।
हरि जेरे जोइये ते तमने आणी,आणी आपुँ २ मीठाई मेवा तमने खावा रे ।
ऊची ऊंची मेडी स़ाहेबा अजब झरुखा, झरुखे चढ़ी चढी फारबे रे ।
चुन चुन कलिया वा'ली सेज बिछावुँ,भमर पलग पर सुख नाखुँ वारी रे।
मीराँ बाई के प्रभु गिरिधर ना गुण, तारा चरण कमल मां चित राखूं रे।
।।१५६।।†
१०
मारा प्राण पातलिया वाहेला आवो रे, तमरे विनाहूँ तो जनम जोगण छूूँ।
नाभी कमल की सुरता रे चाली, जई ने तखत पर रास रसीला रे।
१ रखी, २ दूँ।