मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)
Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary
भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७२ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
मुझे दूर क्यूँ मेली¹।
अब तुम प्रीत और सूं जोडी, हम से क्यूँ करी पहेली।
बहु दिन बीते अजहूँ न आए, लग रही तालामेली²।
किण बिलाय³ हेली।
स्याम बिन जिवडो मुरझावै, जैसे जल बिन बेली।
मीराँ कूँ प्रभु दरसण दीजो, जनम जनम की चेली।
दरस बिन खडी दुहेली⁴। ॥१९३॥
पदाभिव्यक्ति से नाथ पथ का प्रभाव स्पष्ट होता है। "सेली'
नाथ पथी जोगियो के ही मुख्य चिन्हो मे से एक है। अन्तिम पक्ति से
व्यक्त होती परित्यक्ता (दुहेली) की भावना अन्य राजस्थानी के
पदो मे भी मिलती है। यह विचारणीय है।
३३
इक अरज सुनो मोरी, मै किन सग खेलूँ होरी।
तुम तो जाँय विदेसा छाये, हम से रहै चित चोरी।
तन आभूषण छोड़यो सब ही, तज दियो पाट पटोरी⁵।
मिलन की लग रही डोरी।
आप मिल्या बिन कल न परत है, त्याग दियो तिलक तमोली।
मीराँ के प्रभु मिलज्यो माधव, सुणज्यो अरज मोरी।
दरस बिन बिरहणी दोरी⁶। ॥१९४॥
उपर्युक्त दोनो पद में भाव-साम्य स्पष्ट है, यद्यपि पूर्व पद की
भाषा पर राजस्थानी प्रभाव कुछ विशेष है।
३४
होली पिया बिन, मोहि लागे खारी, सुनो री सखी मोरी प्यारी।
सूनो गाँव देस सब सूनी, सूनी सेज अटारी।
१ करदी, २ बेचैनी, ३ भुलाए, ४ परित्यक्ता, ५ साज श्रृंगार, ६ दुखी।