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सर्वकोश
मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)

मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)

Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary

भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव द्वारा

DevanagariRajasthanipublished365 पृष्ठ

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पृष्ठ 131

वियोगाभिव्यक्ति ७३
सूनी बिरहन पिव बिन डोलै, तज दई पिव प्यारी।
भई हूँ या दुख कारी।
देस विदेस सदेस न पहुँचे, होइ अदेशा भारी।
गिणता घिस गई, रेख ॱआँगलियाँ की सारी।
अजहूँ न आये मुरारी।
बाजत झांझ मृद्ग मुरलिया, बाज रही हकतारी।
आयो बसत कत घर नाही, तन मे जर भया भारी।
स्याम मन कहा बिचारी।
अब तो मेहर१ करो मुझ ऊपर, चित है सुनो हमारी।
मीराँ के प्रभु मिलि गयो माधो, जनम जनम की कुआरी।
लगी दरसण की तारी। ॥१९५॥†
इस पद मे विरोधाभास है। होली के बाद ही बसत का साथ ही
साथ वर्णन है। पद की बारहवी पक्ति मे मिलन की अभिव्यक्ति
है जो कि शेष पदाभिव्यक्ति से सर्वथा भिन्न पडती है।
होली वर्णन के उपर्युक्त चारो पद मीराँ के शेष सभी पदो से
सर्वथा भिन्न पडते है। इन की शैली भी सर्वथा भिन्न है। इनकी भाषा
प्रमुखत ब्रजभाषा होते हुए भी राजस्थानी से प्रभावित है। इनमे
प्रयुक्त जो कुछ राजस्थानी शब्द आये है, वह ठेठ राजस्थानी के हैं।
शुद्ध ब्रजभाषा और ठेठ राजस्थानी का यह सम्मिश्रण विचारणीय है।
पद स० ३३ और ३४ मे टेक मे 'माधो' का प्रयोग एक और विचार-
णीय प्रश्न है। मीराँ के पदो की परम्परा मे यह सर्वथा नूतन है।
बहुत सम्भव है कि ये पद किसी अन्य कवि के हो। 'मीर माधौ' नामक
कवि के पदो से मीराँ के पदो का सम्मिश्रण हुआ भी है। देखे पद स० ८।
१ कृपा।