मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)
Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary
भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव द्वारा
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मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
११
मे विरहणी बैठी जागूँ, जगत सब सोवै री आली ।
विरहणी बैठी रग महल मे, मोतियन की लड पोवै ।
इक विरहणी हम ऐसी देखी, अँसुवन की माला पोवै ।
तारा गिन गिन रैण बिहानी, सुख की घडी कब आवै ।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, मिल के बिछुड न जावै ।
॥१२६॥
१२
दरस बिन दूखण लागै नैण ।
अब के तुम बिछुरे प्रभुजी, कबहूँ न पायो चैन ।
सबद सुणत मेरी छतियाँ काँपै, मीठे मीठे बंन ।
बिरह बिथा कासूँ कहूँ सजनी, बह गई करवत ऐन ।
कल न परत पल हरि मग जोवत, भई छमासी रैण ।
मीराँ के प्रभु कब रे मिलोगे, दुख मेटण सुख दैण । ॥१२७॥
पद की तीसरी और पाचवी पक्तियों का निम्नाकित पाठान्तर
पाया जाता है।
तीसरी पक्ति- "सबद सुणत मेरी छतिया कम्पे, मीठे लागै तुम बेन"
या
"सबद सुणत मेरी छतिया कम्पे, मीठे लागै बैन"।
और
पाँचवी पक्ति- "एकटकी पथ निहारूँ, भई छमासी रैन।"
१३
जोहने गोपाल फिरूँ, ऐसी आवत मन मे
अवलोकत बारिज बदन, बिबस भई तन मं ।
मुरली कर लकुट लेऊँ, पीत बसन धारूँ ।
पछी गोप भेष मुकुट, गो झन सग चारूँ ।