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मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)

मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)

Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary

भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव द्वारा

DevanagariRajasthanipublished365 पृष्ठ

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पृष्ठ 134

७६ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
एक टगटगी पिया पथ निहारूँ, भई छै मासी रैन।
मीराँ के प्रभु हरि अविनासी, दुख मेलण सुख देश ॥१२१॥
अन्तिम पंक्ति मे 'मेलण' शब्द के स्थान पर 'मेटण' शब्द की अर्थ
संगति ठीक बैठती है।
७
मै जाण्यो नही प्रभु को मिलन कैसे होय री।
आए मोरे सजना, फिरि गए अंगना, मै अभागण रही सोय री।
फारूँगी चीर करूँ गलकथा, रहूँगी वैरागण होय री ।
चुडिया फोरूँ माग बिखेरू, कजरा मै डारूँ धोय री ।
निसि बासर मोहि बिरह सतावै, कल न परत पल मोय री।
मीराँ के प्रभु हरि अविनासी, मिलि बिछुडी मत कोई री।
॥१२२॥
इस पद मे ब्रजभाषा और खडी बोली का अजीब सम्मिश्रण हुआ
है। पद की तीसरी और चौथी पक्तियो पर खडी बोली का प्रभाव
विशेष स्पष्ट है। यह भी एक विचारणीय पहलू है कि इन दोनो ही
पक्तियो की अभिव्यक्ति नाथ परम्परा के प्रभाव की द्योतक है। अन्तिम
पक्ति से व्यक्त होती भावना 'मिलि बिछुड़न मत कीज्यो' प्राय इन्ही
शब्दो मे अन्य पदो मे भी मिल जाती है।
'बृहद्राग रत्नाकर' में 'लच्छीराम' नामक किसी सत का
निम्नांकित एक पद मिलता है। इन दोनो पदो में भाव और भाषा
का गहरा साम्य है। बहुत सम्भव है कि निम्नाकित पद ही कुछ घट
बढ और हेर फेर के साथ मीराँ के नाम पर चल पड़ा हो।
नीद तोहि बेचूँगी आली, जो कोई गाहक होय।
आए मोहन फिरि गए अंगना, मै बैरन रही सोय।
कहा करुँ कछु वश न मेरो, आयो धन दियो खोय।
लछीराम प्रभु अबके मिले तो, राखूँगी नैन समोय।
—पृष्ठ ७९, पद २९२।