मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)
Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary
भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवियोगाभिव्यक्ति ७५
४
नैन परि गई ऐसी बानि ।
नेक निहारत पिया जू के मुख तन धुरि गई कुलकानि ।
राणाजी विषरो प्यालो भेज्यो, मैं सिर लीनी मानि ।
मीराँ के गिरिधर मिले हो, पुरबली१ पहिचानि ।।११९।।
५
नैणा री हो पड गई बाण ।
बार बार निरखूँ मुख सोभा, छूट गई कुलकाण२ ।
कोई भला कहो, कोई बुरा कहो, मैं सिर लीनी ताण३ ।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, पुरबली पिछाण४ ।।१२०।।
एक ही भाव के द्योतक उपर्युक्त चारो पद विशेष विचारणीय है । सभी
पदो की प्रथम पक्ति मे भाव सर्वथा एक है और भाषा भी लगभग
एक ही है । शेष पद मे विभिन्न भावनाओ और घटनाओ का वर्णन
है तथापि “लोक लाज” और “कुल कानि” के उल्लघन की अभिव्यक्ति
सभी पदो मे प्राप्त है । पहले दो पद (स० ३ और ४) की भाषा शुद्ध
राजस्थानी है । इनकी अभिव्यक्ति भावना-द्योतक है । तीसरे पद
(स० ५) की अन्तिम पक्तियो पर राजस्थानी का प्रभाव है । इन
पक्तियो मे राणा द्वारा विष भेजे जाने की भी अभिव्यक्ति है । इसको
देखते बहुत सम्भव प्रतीत होता है कि विष दिए जाने की कथा का
राजस्थान मे ही अधिक प्रचार रहा हो । पद स० ५ की भाषा पर
राजस्थानी प्रभाव कुछ विशेष स्पष्ट है । यह पद पद स० ४ का रूपान्तर-
सा प्रतीत होता है । वस्तुत ये चारो ही पद एक दूसरे के गेय रूपान्तर-
से प्रतीत होते है ।
६
जब कै तुम बिछुडे प्रभु जी कबहुँ न पायो चैन ।
ब्रिह बिथा कासूँ कहूँ सजनी, कवन आवै औन ।
१ पूर्व जन्म की, २ कुल की मर्यादा, ३ चढा लिया, ४ परिचय ।