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गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि

DevanagariHindipublished675 pages
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  • भगवतीगीता * ४४५

एक एवाद्वितीयश्च सर्वदेहगतः परः।
स्वप्रकाशेन देहादीन् भासयन् सुसमास्थितः॥ ६॥

वह आत्मा बुद्धि आदि उपाधियोंसे रहित, चिदानन्दस्वरूप, आनन्दमय, परम प्रभायुक्त, पूर्ण तथा सत्य-ज्ञान आदि लक्षणोंवाला है। वही एकमात्र अद्वितीय सर्वश्रेष्ठ आत्मा अपने प्रकाशसे सभी प्राणियोंके सूक्ष्म देहादिको प्रकाशित करते हुए सम्यक् रूपसे सबके भीतर विराजमान है॥ ५-६॥

इत्यात्मनः स्वरूपं ते गिरिराज मयोदितम्।
एवं विचिन्तयेन्नित्यमात्मानं सुसमाहितः॥ ७॥

गिरिराज! इस प्रकार मैंने आपसे आत्माके स्वरूपका वर्णन कर दिया। मनुष्यको एकाग्रचित्त होकर इस प्रकारके लक्षणवाले आत्माका नित्य चिन्तन करना चाहिये॥ ७॥

अनात्मनि शरीरादावात्मबुद्धिं विवर्जयेत्।
रागद्वेषादिदोषाणां हेतुभूता हि सा यतः॥ ८॥
रागद्वेषादिदोषेभ्यः सदोषं कर्म सम्भवेत्।
ततः पुनः संसृतिश्च तस्मात्तां परिवर्जयेत्॥ ९॥

देह आदि अनात्म पदार्थोंमें आत्मबुद्धिका परित्याग कर देना चाहिये; क्योंकि वैसी बुद्धि राग-द्वेष आदि दोषोंका मूल कारण है। राग-द्वेष आदि दोषोंसे दोषयुक्त कर्म ही सम्भव हैं। उनसे प्राणी जन्म-मरणकी प्रक्रियासे निरन्तर बँधा रहता है, अतः शरीरादि अनात्म पदार्थोंमें उस आत्मबुद्धिका परित्याग कर देना चाहिये॥ ८-९॥

हिमालय उवाच

अशुभादृष्टजनका रागद्वेषादयः शिवे।
कथं जनैः परित्याज्यास्तन्मे त्वं वक्तुमर्हसि॥ १०॥

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४४६ * गीता-संग्रह *


कुर्वन्ति येऽपकाराणि कथं तान् सहते जनः।
तेषु रागश्च विद्वेषः कथं वा न भवेत्तयोः ॥ ११ ॥

**हिमालय बोले—**शिवे! राग-द्वेष आदिसे पापात्मक अशुभ अदृष्ट पैदा होता है, उसका परित्याग लोग किस प्रकार करें; इसे आप कृपा करके मुझे बताइये। जो लोग दूसरे मनुष्यका अपकार करते हैं, उनके प्रति वह व्यक्ति सहिष्णुताका भाव किस प्रकार रखे और उनके प्रति उस व्यक्तिमें किस प्रकारसे इष्टानिष्टविषयक राग तथा द्वेष न हों॥ १०-११॥

श्रीपार्वत्युवाच
अपकारः कृतः कस्य तदेवाशु विचारयेत्।
विचार्यमाणे तस्मिंश्च द्वेष एव न जायते ॥ १२॥
पञ्चभूतात्मको देहो मुक्तो जीवो यतः स्वयम्।
वह्निना दह्यते वापि शिवाद्यैर्भक्षितोऽपि वा॥ १३॥
तथापि यो विजानाति कोऽपकारोऽस्ति तस्य वै।

श्रीपार्वती बोलीं—'अपकार किसका किया गया'—इसपर शीघ्र विचार करना चाहिये। उसपर विचार करनेसे द्वेष उत्पन्न ही नहीं होगा। पाँच महाभूतोंसे मिलकर यह देह बना हुआ है, जिससे यह जीव स्वयं भिन्न है। यह शरीर या तो अग्निके द्वारा जला दिया जाता है या शिवा (सियार) आदिके द्वारा भक्षित कर लिया जाता है; किंतु आत्मा नहीं। जो इस प्रकारका ज्ञान रखता है, उसका भला कौन-सा अपकार हो सकता है?॥ १२-१३१/२॥

आत्मा शुद्धः स्वयम्पूर्णः सच्चिदानन्दविग्रहः ॥ १४॥
न जायते न म्रियते निर्लेपो न च दुःखभाक्।
विच्छिद्यमाने देहेऽपि नापकारोऽस्य जायते ॥ १५॥

अपने-आपमें पूर्ण तथा सच्चिदानन्द स्वरूपवाला यह विशुद्ध आत्मा न उत्पन्न होता है, न मरता है, न सुख-दुःखादि द्वन्द्वोंमें लिप्त

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  • भगवतीगीता *
    ४४७

होता है और न तो कष्ट ही भोगता है। अतः शरीरके काटे जानेपर भी इस आत्माका कोई अपकार नहीं होता ॥ १४-१५ ॥

यथा गेहान्तरस्थस्य नभसः क्वापि लक्ष्यते।
गृहेषु दह्यमानेषु गिरिराज तथैव हि ॥ १६ ॥
हन्ता चेन्मन्यते हन्तुं हतश्चेन्मन्यते हतः।
तावुभौ भ्रान्तहृदयौ नायं हन्ति न हन्यते ॥ १७ ॥

गिरिराज! जैसे घरके अन्दर अवस्थित आकाशपर घरके जलनेका कोई प्रभाव नहीं होता, उसी प्रकार शरीरके अन्दर अवस्थित आत्मापर शरीरके छेदन आदिका कोई प्रभाव नहीं होता। जो मारनेमें इस आत्माको मारनेवाला समझता है और जो शरीरके मारे जानेपर आत्माको मारा गया समझता है—ऐसा सोचनेवाले वे दोनों ही लोग भ्रमितचित्तवाले हैं; क्योंकि यह आत्मा न तो मारता है और न मारा ही जाता है॥ १६-१७॥

स्वस्वरूपं विदित्वैवं द्वेषं त्यक्त्वा सुखी भवेत्।
द्वेषमूलो मनस्तापो द्वेषः संसारखण्डनम् ॥ १८ ॥
मोक्षविघ्नकरो द्वेषस्तं यत्नात्परिवर्जयेत्।

अपने स्वरूपको इस प्रकार जानकर और द्वेष छोड़कर मनुष्य सुखी हो जाय। द्वेष मनके सन्तापका मूल है, द्वेष सांसारिक सम्बन्धोंको भंग करनेवाला है और द्वेष मोक्षप्राप्तिमें विघ्न उत्पन्न करनेवाला है; अतः प्रयत्नपूर्वक उसका परित्याग कर देना चाहिये ॥ १८१/२ ॥

हिमालय उवाच

देहस्यापि न चेद्देवि न जीवस्य परात्मनः ॥ १९ ॥
नापकारोऽत्र विद्येत नैतौ दुःखस्य भागिनौ।
तत्कस्य जायते दुःखं यत्साक्षादनुभूयते ॥ २० ॥

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४४८ * गीता-संग्रह *


अन्यो वा कोऽस्मि देहेऽस्मिन् दुःखभोक्ता महेश्वरि।
एतन्मे ब्रूहि तत्त्वेन मयि ते यद्यनुग्रहः॥ २१॥

हिमालय बोले—देवि! यदि देह तथा परमात्मस्वरूप जीवका इस लोकमें अपकार नहीं होता और ये दोनों दुःखके भागी नहीं होते तो फिर जिस दुःखका साक्षात् अनुभव होता है, वह किसे होता है? महेश्वरि! इस शरीरमें दुःख भोगनेवाला दूसरा कौन है? यदि मुझपर आपकी कृपा है तो आप मुझे इस विषयको यथार्थ रूपसे बताइये॥ १९—२१॥

श्रीपार्वत्युवाच
नैव दुःखं हि देहस्य नात्मनोऽपि परात्मनः।
तथापि जीवो निर्लेपो मोहितो मम मायया॥ २२॥
सुख्यहं दुःख्यहं चैव स्वयमेवाभिमन्यते।
अनाद्यविद्या सा माया जगन्मोहनकारिणी॥ २३॥
जातमात्रं हि सम्बद्धस्तया सञ्जायते पितः।
संसारी जायते तेन रागद्वेषादिसंकुलः॥ २४॥

श्रीपार्वतीजी बोलीं—न तो इस देहको और न तो इस परमात्मस्वरूप आत्माको ही दुःख होता है; फिर भी यह निर्लेप (विशुद्ध) आत्मा मेरी मायासे मोहित होकर स्वयं मैं सुखी हूँ, मैं दुःखी हूँ—ऐसा मान लेता है। वह माया अनादि, अविद्यास्वरूपिणी तथा जगत्‌को मोहित करनेवाली है। पिताजी! वह आत्मतत्त्व उत्पन्न होते ही उस मायासे आबद्ध हो जाता है और उसीसे वह राग-द्वेष आदि विकारोंसे व्याप्त होकर संसारी हो जाता है॥ २२—२४॥

आत्मा स्वलिङ्गं तु मनः परिगृह्य महामते।
निलीना वासना यत्र संसारे वर्ततेऽवशः॥ २५॥

महामते! यह आत्मा अपने लिंगरूप मन, जिसमें वासना निहित

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  • भगवतीगीता * ४४९

रहती है-को धारण करके लाचार-सा बना हुआ इस संसारमें व्यवहार करता है ॥ २५ ॥

विशुद्धः स्फटिको यद्वद्रक्तपुष्पसमीपतः ।
तत्तद्वर्णयुतो भाति वस्तुतो नास्ति रञ्जनम् ॥ २६ ॥
बुद्धीन्द्रियादिसामीप्यादात्मनोऽपि तथा गतिः ।
मनो बुद्धिरहंकारो जीवस्य सहकारिणः ॥ २७ ॥
स्वकर्मवशतात्तात फलभोक्तार एव ते।
सर्वं वैषयिकं तात सुखं वा दुःखमेव वा ॥ २८ ॥
त एव भुञ्जते नात्मा निर्लेपः प्रभुरव्ययः ।

रक्तवर्णके पुष्पके समीप स्थित शुद्ध स्फटिक उसके सांनिध्यके कारण उसीके रंगसे युक्त लाल प्रतीत होता है; जबकि वास्तवमें उसमें रंग विद्यमान नहीं रहता है। बुद्धि, इन्द्रिय आदिके सांनिध्यके कारण आत्माकी भी वही गति होती है। मन, बुद्धि तथा अहंकार जीवके सहयोगी हैं। तात ! अपने-अपने कर्मोंके अधीन होकर वे ही कर्म-फलका भोग करते हैं। वे सभी समस्त विषयात्मक सुखों तथा दुःखोंका भोग करते हैं; आत्मा भोग नहीं करता; क्योंकि यह आत्मा प्रभुतासम्पन्न, विकाररहित तथा निर्लिप्त है ॥ २६-२८ १/२ ॥

सृष्टिकाले पुनः पूर्ववासनावासितैः सह ॥ २९ ॥
जायते जीव एवं हि वसत्याभूतसम्प्लवम् ।
ततो ज्ञानविचारेण त्यक्त्वा मोहं विचक्षणः ॥ ३० ॥
सुखी भवेन्महाराज इष्टानिष्टोपपत्तिषु ।

सृष्टिके समय यह जीव पूर्वजन्मकी वासनाओंसे युक्त अन्तःकरणके साथ उत्पन्न होता है और इस प्रकार यह जीव प्रलयपर्यन्त सृष्टिमें निवास करता है। इसलिये महाराज ! विद्वान् पुरुषको चाहिये कि ज्ञान-

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४५० * गीता-संग्रह *


विचारके द्वारा इच्छित तथा अनिच्छित पदार्थोंकी प्राप्तिमें मोहका परित्यागकर सुखी हो जाय॥ २९-३०१/२॥
देहमूलो मनस्तापो देहः संसारकारणम्॥ ३१॥
देहः कर्मसमुत्पन्नः कर्म च द्विविधं मतम्।
पापं पुण्यं च राजेन्द्र तयोरंशानुसारतः॥ ३२॥
देहिनः सुखदुःखं स्यादलङ्घ्यं दिनरात्रिवत्।
देह मनके सन्तापका मूल है और यह देह संसारका कारण भी है। यह देह कर्मसे उत्पन्न होता है और वह कर्म पाप तथा पुण्यभेदसे दो प्रकारका होता है। राजेन्द्र! उन्हीं पाप-पुण्यके अंशके अनुसार जीवको सुख तथा दुःख प्राप्त होते हैं। दिन एवं रातकी भाँति इन सुख और दुःखका उल्लंघन नहीं किया जा सकता॥ ३१-३२१/२॥
स्वर्गादिकामः कृत्वापि पुण्यं कर्मविधानतः।
प्राप्य स्वर्गं पतत्याशु भूयः कर्म प्रचोदितम्॥ ३३॥
तस्मात्सत्संगमं कृत्वा विद्याभ्यासपरायणः।
विमुक्तसङ्गः परमं सुखमिच्छेद्विचक्षणः॥ ३४॥
स्वर्ग आदिकी प्राप्तिकी कामना करनेवाला विधानपूर्वक पुण्य कर्म करके स्वर्ग प्राप्त करनेके बाद भी शीघ्र ही कर्मसे प्रेरित होकर पुनः मृत्युलोकमें गिरता है। अतएव विद्वान्‌को आसक्तिका त्याग करते हुए विद्याभ्यासमें तत्पर रहकर तथा सत्संग करके परम सुखकी अभिलाषा रखनी चाहिये॥ ३३-३४॥

॥ इति श्रीदेवीपुराणे भगवतीगीतायां श्रीपार्वती-हिमालयसंवादे द्वितीयोऽध्यायः॥ २॥

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  • भगवतीगीता * | ४५१
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तीसरा अध्याय

गर्भस्थ जीवका स्वरूप तथा गर्भमें की गयी जीवकी प्रतिज्ञा, विषयभोगोंकी दुःखमूलकता तथा देवीभक्तिकी महिमा

हिमालय उवाच

दुःखस्य कारणं देहः पञ्चभूतात्मकः शिवे।
यतस्तद्विरहाद्देही न दुःखैः परिभूयते॥ १॥
सोऽयं सञ्जायते मातः कथं देहो महेश्वरि।
यं प्राप्य सुकृतान् कामान् कृत्वा स्वर्गमवाप्स्यति॥ २॥
क्षीणपुण्यः कथं जीवो जायते च पुनर्भुवि।
तद् ब्रूहि विस्तरेणाशु यदि ते मय्यनुग्रहः॥ ३॥

**हिमालय बोले—**शिवे! यह पंचभूतात्मक देह ही दुःखका कारण है; क्योंकि उससे विलग जीव दुःखोंसे प्रभावित नहीं होता है। माता! महेश्वरी! जिस देहको प्राप्तकर यह जीव पुण्यकार्य करके स्वर्ग प्राप्त करता है, वह यह देह किस प्रकार उत्पन्न होता है? और यह जीव पुण्यके क्षीण होनेपर पुनः पृथ्वीपर किस प्रकार उत्पन्न होता है। यदि आप मुझपर कृपा रखती हैं तो उन बातोंको शीघ्र ही विस्तारपूर्वक मुझसे बताइये॥ १–३॥

श्रीपार्वत्युवाच

क्षितिर्जलं तथा तेजो वायुराकाश एव च।
एतैः पञ्चभिराबद्धो देहोऽयं पाञ्चभौतिकः॥ ४॥

**श्रीपार्वतीजी बोलीं—**पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश—इन्हीं पंचमहाभूतोंसे यह देह निर्मित है, इसीलिये यह पांचभौतिक कहा गया है॥ ४॥

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४५२ * गीता-संग्रह *

प्रधानं पृथिवी तत्र शेषाणां सहकारिता।
उक्तश्चतुर्विधः सोऽयं गिरिराज निबोध मे॥ ५॥
अण्डजाः स्वेदजाश्चैवोद्भिजाश्चैव जरायुजाः।
अण्डजाः पक्षिसर्पाद्याः स्वेदजा मशकादयः॥ ६॥
वृक्षगुल्मप्रभृतयश्चोद्भिज्ञा हि विचेतनाः।
जरायुजा महाराज मानुषाः पशवस्तथा॥ ७॥

उन पाँचोंमें पृथ्वीतत्त्व तो प्रधान है और शेष चारकी उसके साथ सहभागितामात्र है। गिरिराज! वह यह पांचभौतिक देह भी चार प्रकारका कहा गया है; जिसे मुझसे समझ लीजिये। अण्डज, स्वेदज, उद्भिज्ज और जरायुज—ये उसके भेद हैं। महाराज! उनमें पक्षी, सर्प आदि अण्डज हैं; मशक (मच्छर) आदि स्वेदज हैं; वृक्ष, झाड़ी आदि सुषुप्त चैतन्यवाले उद्भिज्ज हैं और मनुष्य, पशु आदि जरायुज हैं॥ ५-७॥

शुक्रशोणितसम्भूतॊ देहो ज्ञेयो जरायुजः।
भूयः स त्रिविधो ज्ञेयः पुंस्त्रीक्लीबविभेदतः॥ ८॥
शुक्राधिक्येन पुरुषो भवेत्पृथ्वीधराधिप।
रक्ताधिक्ये भवेन्नारी तयोः साम्ये नपुंसकम्॥ ९॥

शुक्र, रज आदिसे निर्मित देहको जरायुज समझना चाहिये। पुनः उस जरायुजको भी पुरुष, स्त्री तथा नपुंसक भेदसे तीन प्रकारका जानना चाहिये। पर्वतराज! शुक्रकी अधिकतासे पुरुष, रजकी अधिकतासे स्त्री तथा उन दोनोंकी समानतासे नपुंसक होते हैं॥ ८-९॥

स्वकर्मवशतो जीवो नीहारकलया युतः।
पतित्वा धरणीपृष्ठे व्रीहिममध्यगतो भवेत्॥ १०॥
स्थित्वा तत्र चिरं भुक्त्वा भुज्यते पुरुषैस्ततः।
ततः प्रविष्टं तद्गुह्यं पुंसो देहे प्रजायते॥ ११॥

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* भगवतीगीता *४५३

रेतस्तेन स जीवोऽपि भवेद्रेतोगतस्तदा।

अपने कर्मोंके वशीभूत जीव ओसकणोंसे संयुक्त होकर पृथ्वीतलपर गिरनेपर धान्य (वनस्पति)-के बीच पहुँचता है। वहाँ रहकर चिरकालतक कर्मभोग करता है। पुनः जीवोंके द्वारा उसका भोग किया जाता है। तदनन्तर पुरुषके देहमें गुह्येन्द्रियोंमें प्रविष्ट होकर वह वीर्यरूप हो जाता है। उसी कारणसे वह जीव भी वीर्यमें संनिविष्ट हो जाता है* ॥ १०-११ १/२ ॥

ततस्त्रियाऽभियोगेन ऋतुकाले महामते ॥ १२ ॥
रेतसा सहितः सोऽपि मातृगर्भं प्रयाति हि।

महामते! तत्पश्चात् ऋतुकालमें स्त्रीके साथ पुरुषका संयोग होनेपर वीर्यके साथ-साथ वह जीव भी माताके गर्भमें पहुँच जाता है ॥ १२ १/२ ॥

ऋतुस्नाता भवेन्नारी चतुर्थेऽहनि तद्दिनात् ॥ १३ ॥
आषोडशदिनाद्राजन् ऋतुकाल उदाहृतः।

राजन्! रजोधर्मके चौथे दिन स्त्री ऋतुस्नान करके शुद्ध होती है; उस दिनसे लेकर सोलहवें दिनतक ऋतुकाल कहा गया है ॥ १३ १/२ ॥

अयुग्मदिवसे नारी जायते पर्वतर्षभ ॥ १४ ॥
जायते च पुमांस्तत्र युग्मके दिवसे पितः।
ऋतुस्नाता तु कामार्ता मुखं यस्य समीक्षते ॥ १५ ॥


* यहाँपर सृष्टि-परम्पराकी निरन्तरताकी ओर संकेत है। संक्षेपमें कर्मफल-भोगके अनन्तर शेष कर्मोंसे आविष्ट जीव आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी तथा ओषधि, पुष्प, फल, अन्न आदिके रूपमें देहान्तरकी प्राप्ति करता हुआ स्त्री-पुरुषके द्वारा अन्नादिका भोग करनेपर वीर्य तथा रजस्‌के रूपमें उसका पुनः विपरिणाम होता है और पुनः वीर्य तथा रजस्‌के संयोगसे सृष्टि-प्रक्रिया चलती रहती है। इस प्रकार अवान्तरभूत अविदित सृष्टि-प्रक्रियाके प्रति जागरूक करनेके लिये भगवतीका उपदेश है।

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४५४ * गीता-संग्रह *


तदाकृतिः सन्ततिः स्यात्तत्पश्येद्भर्तुराननम्।
पर्वतश्रेष्ठ! विषम दिनमें समागम करनेसे स्त्री और सम दिनमें समागम करनेसे पुरुषकी उत्पत्ति होती है। पिताजी! ऋतुस्नान की हुई कामार्त स्त्री जिसके मुखका दर्शन करती है, उसीकी मुखाकृतिकी सन्तान जन्म लेती है। अतः स्त्रीको उस समय अपने पतिका मुख देखना चाहिये॥ १४-१५१/२॥

तद्रेतो योनिरक्तेन युक्तं भूत्वा महामते॥ १६॥
दिनेनैकेन कललं जरायुपरिवेष्टितम्।
भूत्वा पञ्चदिनैरेव बुद्बुदाकारतामियात्॥ १७॥
या तु चर्माकृतिः सूक्ष्मा जरायुः सा निगद्यते।
शुक्रशोणितयोर्योगस्तस्मिन् सञ्जायते यतः॥ १८॥
तत्र गर्भो भवेद्यस्मात्तेन प्रोक्तो जरायुजः।
महामते! वह वीर्य स्त्रीके योनिस्थित रजसे मिलकर एक दिनमें कलल (अवस्थाविशेष) बन जाता है। वही कलल अत्यन्त सूक्ष्म झिल्लीसे पूर्णतया आवृत होकर पाँच दिनोंमें बुलबुलेके आकारका हो जाता है। अत्यन्त सूक्ष्म आकारकी जो चमड़ेकी झिल्ली होती है, उसे जरायु कहा जाता है। चूँकि उसमें वीर्य तथा रजका योग होता है और उसीसे गर्भ उत्पन्न होता है, इसलिये उसे 'जरायुज' कहा गया है॥ १६—१८१/२॥

ततस्तत्सप्तरात्रेण मांसपेशीत्वमाप्नुयात्॥ १९॥
पक्षमात्रेण सा पेशी तच्छोणितपरिप्लुता।
ततश्चाङ्कुर उत्पन्नः पञ्चविंशतिरात्रिषु॥ २०॥
स्कन्धो ग्रीवा शिरःपृष्ठोदराणि च महामते।
पञ्चधाङ्गानि जायन्ते एवं मासेन च क्रमात्॥ २१॥
तत्पश्चात् सात रातोंमें वह मांसपेशियोंसे युक्त हो जाता है और

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  • भगवतीगीता * ४५५

फिर एक पक्षमें वह जो पेशी होती है, उसमें रक्तप्रवाह होने लगता
है। तत्पश्चात् पचीस रातोंमें देहके अवयव अंकुरित होने लगते हैं।
महामते ! एक महीनेमें क्रमसे स्कन्ध (कन्धा), गर्दन, सिर, पीठ और
पेट—ये पाँच प्रकारके अंग निर्मित हो जाते हैं॥ १९-२१॥

द्वितीये मासि जायन्ते पाणिपादादयस्तथा।
अङ्गानां सन्धयः सर्वे तृतीये सम्भवन्ति हि॥ २२॥
अङ्गुल्यश्चापि जायन्ते चतुर्थे मासि सर्वतः।
अभिव्यक्तिश्च जीवस्य तस्मिन्नेव हि जायते॥ २३॥
ततश्चलति गर्भोऽपि जनन्या जठरे स्थितः।

दूसरे महीनेमें हाथ और पैर हो जाते हैं तथा तीसरे महीनेमें
अंगोंकी सभी सन्धियाँ उत्पन्न हो जाती हैं। पुनः चौथे महीनेमें सभी
अंगुलियाँ बन जाती हैं और उसी महीनेमें उसके भीतर जीवकी
अभिव्यक्ति हो जाती है। तब माताके उदरमें स्थित गर्भ चलने भी
लग जाता है॥ २२-२३१/२॥

श्रोत्रे नेत्रे तथा नासा जायन्ते मासि पञ्चमे॥ २४॥
तथैव च मुखं श्रोणिर्गुह्यं तस्मिन् प्रजायते।
पायुर्मेढ्रमुपस्थं च कर्णछिद्रद्वयं तथा॥ २५॥
तथैव मासि षष्ठे तु नाभिश्चापि भवेन्नृणाम्।
सप्तमे केशरोमाद्या जायन्ते च तथाष्टमे॥ २६॥
विभक्तावयवत्वं च जायते गर्भमध्यतः।
विहाय श्मश्रुदन्तादीन् जन्मान्तरसमुद्भवात्॥ २७॥
समस्तावयवा एवं जायन्ते क्रमशः पितः।

पाँचवें महीनेमें कान, नेत्र और नाकका निर्माण होता है एवं
उसी महीनेमें मुख, कमर, गुदा-शिश्न—लिंग आदि गुह्य अंग और
कानोंमें दोनों छिद्र भी बन जाते हैं। उसी तरह छठे महीनेमें मनुष्योंकी

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४५६ * गीता-संग्रह *


नाभि बन जाती है और सातवें महीनेमें केश, रोम आदि उग आते
हैं। आठवें महीनेमें गर्भमें सभी अवयव स्पष्टरूपसे अलग-अलग बन
जाते हैं। इस प्रकार पिताजी! जन्मके पश्चात् उगनेवाले दाढ़ी,
मूँछ और दाँत आदिको छोड़कर सभी अंग क्रमसे निर्मित हो जाते
हैं॥ २४-२७१/२ ॥
नवमे मासि जीवस्तु चैतन्यं सर्वशो लभेत्॥ २८॥
मातृभुक्तानुसारेण वर्धते जठरे स्थितः।
प्राप्य वै यातनां घोरां खिद्यते च स्वकर्मतः॥ २९॥
स्मृत्वा प्राक्तनदेहोत्थकर्माणि बहुदुःखितः।
मनसा वचनं ब्रूते विचार्य स्वयमेव हि॥ ३०॥
एवं दुःखमनुप्राप्य भूयो जन्म लभेत्क्षितौ।
अन्यायेनार्जितं वित्तं कुटुम्बभरणं कृतम्॥ ३१॥
नाराधिता भगवती दुर्गा दुर्गतिहारिणी।
यद्यस्मान्निष्कृतिर्मे स्याद् गर्भदुःखात्तदा पुनः॥ ३२॥
विषयान्नानुसेविष्ये विना दुर्गां महेश्वरीम्।
नित्यं तामेव भक्त्याहं पूजये यतमानसः॥ ३३॥
वृथा पुत्रकलत्रादिवासनावशतोऽसकृत्।
निविष्टसंसारमनाः कृतवानात्मनोऽहितम्॥ ३४॥
तस्येदानीं फलं भुञ्जे गर्भदुःखं दुरासदम्।
तन्न भूयः करिष्यामि वृथा संसारसेवनम्॥ ३५॥
नौवें महीनेमें जीवमें पूर्णरूपसे चेतनाशक्ति आ जाती है। वह
उदरमें स्थित रहकर माताके द्वारा ग्रहण किये गये भोजनके अनुसार
वृद्धिको प्राप्त होता रहता है। वहाँपर अपने जन्मान्तरके कर्मोंके अनुसार
घोर यातना प्राप्त करके वह जीव खिन्न हो उठता है और पूर्वजन्ममें
अपने शरीरसे किये गये कर्मोंको यादकर अत्यन्त दुःखी हो जाता

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  • भगवतीगीता * ४५७

है। माताके गर्भमें इस प्रकारका कष्ट प्राप्त करके भी जीव बार-बार पृथ्वीपर जन्म लेता रहता है। गर्भावस्थामें वह जीव मनमें यह सब सोचकर स्वयंसे यह बात कहता है—'मैंने अन्यायपूर्वक धन कमाया और उससे अपने कुटुम्बका भरण-पोषण किया, किंतु दुर्गतिका नाश करनेवाली भगवती दुर्गाकी आराधना नहीं की। अब यदि गर्भके दुःखसे मुझे छुटकारा मिल जाय तो मैं पुनः महेश्वरी दुर्गाको छोड़कर विषयोंका सेवन नहीं करूँगा और सर्वदा समाहितचित्त होकर भक्तिपूर्वक उन्हींकी पूजा करूँगा। पुत्र, स्त्री आदिके मोहके वशीभूत होकर तथा सांसारिकतामें अपने मनको आसक्त करके मैंने व्यर्थमें ही अनेक बार अपना अहित कर डाला। इस समय उसीके परिणामस्वरूप मैं यह असहनीय गर्भ-दुःख भोग रहा हूँ। अब मैं पुनः सांसारिक विषयोंका सेवन नहीं करूँगा'॥ २८—३५॥

इत्येवं बहुधा दुःखमनुभूय स्वकर्मतः।
अस्थ्यन्त्रविनिष्पिष्टो निर्याति योनिवर्त्मना॥ ३६॥
सूतिवातवशास्नोरनरकादिव पातकी।
मेदोऽसृक्प्लुतसर्वाङ्गो जरायुपरिवेष्टितः॥ ३७॥

इस प्रकार अपने कर्मानुसार अनेक प्रकारसे दुःखोंका अनुभव करके वह जीव अपने अंगोंमें मेदा तथा रक्त लपेटे हुए और झिल्लीसे आवृत होकर प्रसववायुके वशीभूत योनिके अस्थि-यन्त्रसे पिसा जाता हुआ-सा उसी प्रकार योनिमार्गसे बाहर निकलता है, जैसे पातकी जीव नरकसे निकलता है॥ ३६-३७॥

ततो मन्मायया मुग्धस्तानि दुःखानि विस्मृतः।
अकिञ्चित्करतां प्राप्य मांसपिण्ड इव स्थितः॥ ३८॥
सुषुम्णा पिहिता नाडी श्लेष्मणा यावदेव हि।
तावद्वक्तुं न शक्नोति सुव्यक्तवचनं त्वसौ॥ ३९॥

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४५८ * गीता-संग्रह *


न गन्तुमपि शक्नोति बन्धुभिः परिरक्ष्यते।
श्वमार्जाररादिदंष्ट्रिभ्यो दृप्तः कालवशात्ततः॥४०॥
यथेष्टं भाषते वाक्यं गच्छत्यपि सुदूरतः।
ततश्च यौवनोद्रिक्तः कामक्रोधादिसंयुतः॥४१॥
कुरुते विविधं कर्म पापपुण्यात्मकं पितः।

तदनन्तर वह जीव मेरी मायासे मोहित होकर उन दुःखोंको भूल जाता है और कुछ भी न कर सकनेकी स्थितिको प्राप्त होकर मांस-पिण्डकी भाँति स्थित रहता है। जबतक कफ आदिसे उसकी सुषुम्णा नाडी अवरुद्ध रहती है, तबतक वह स्पष्ट वाणी बोलनेमें तथा चल-फिर सकनेमें समर्थ नहीं होता है और दैवयोगसे जब वह कुत्ते, बिल्ली आदि दाढ़युक्त जन्तुओंसे पीड़ित होता है, तब स्वजनोंद्वारा उसकी सम्यक् रक्षा की जाती है। बादमें वह स्वेच्छया कुछ बोलने लगता है और दूर-दूरतक चलने भी लगता है। पिताजी! इसके बाद कुछ काल बीतनेपर यौवनके उन्मादमें आकर वह काम, क्रोध आदिसे युक्त होकर पाप तथा पुण्यकर्म करने लगता है॥ ३८—४१ १/२॥

कुरुते कर्मतन्त्राणि देहभोगार्थमेव हि॥४२॥
स देहः पुरुषाद्भिन्नः पुरुषः किं समश्नुते।
प्रतिक्षणं क्षरत्यायुश्चलत्पर्णस्थतोयवत्॥४३॥

जिस देहके भोगके लिये जीव सारे कर्म करता है, वह देह पुरुष (जीवात्मा)-से भिन्न है; क्योंकि जीवात्माका भोगोंसे क्या सम्बन्ध? प्रतिक्षण आयुका क्षरण हो रहा है और वह हिलते हुए पत्तेपर स्थित जलकणकी भाँति क्षणभंगुर है॥ ४२-४३॥

स्वप्नोपमं महाराज सर्वं वैषयिकं सुखम्।
तथापि न भवेद्ग्लानिरभिमानस्य देहिनाम्॥४४॥

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  • भगवतीगीता * ४५९

न चैतद्वीक्षते देही मोहितो मम मायया।
वीक्षते केवलान् भोगांस्तत्र शाश्वतिकानिव ॥ ४५ ॥
अकस्माद्ग्रसते कालः पूर्णे चायुषि भूधर।
यथा व्यालोऽन्तिके प्राप्तं मण्डूकं ग्रसते क्षणात् ॥ ४६ ॥

महाराज! विषय-वासनासम्बन्धी सभी सुख स्वप्नके समान (प्रतीतिमात्र) हैं, फिर भी जीवके अभिमानमें कोई कमी नहीं होती है, मेरी मायासे मोहित हुआ जीव यह सब नहीं देखता। वह भोगोंको शाश्वत समझकर केवल उन्हें ही देखता है और भूधर! आयुके पूरा हो जानेपर काल जीवको अकस्मात् उसी भाँति ग्रस लेता है, जैसे सर्प अपने पास आये हुए मेढकको क्षणभरमें ग्रस लेता है ॥ ४४–४६ ॥

हा हन्त जन्मैतदपि विफलं यातमेव हि।
एवं जन्मान्तरमपि विफलं जायते तथा ॥ ४७ ॥
निष्कृतिर्विद्यते नैव विषयानुसेविनाम्।
तस्मादात्मविचारेण त्यक्त्वा वैषयिकं सुखम् ॥ ४८ ॥
शाश्वतैश्वर्यमन्विच्छन्मदर्चनपरो भवेत्।
तदैव जायते भक्तिरियं ब्रह्मणि निश्चला ॥ ४९ ॥

महान् कष्टकी बात है कि यह भी जन्म व्यर्थ बीत गया और इसी प्रकार दूसरा जन्म भी व्यर्थ ही चला जाता है। विषय-भोगोंका सेवन करनेवालोंका उद्धार होता ही नहीं। अतः आत्मतत्त्वका विचार करके वासनात्मक सुखका परित्यागकर शाश्वत ऐश्वर्य*की प्राप्तिकी कामना करते हुए मेरी उपासनामें तत्पर रहना चाहिये, तभी ब्रह्मसे स्थिर सम्बन्ध बनता है ॥ ४७–४९ ॥


* शाश्वत ऐश्वर्यका तात्पर्य भौतिक ऐश्वर्यसे नहीं है, कारण वे शाश्वत होते ही नहीं। षडैश्वर्यसम्पन्न परमात्मप्रभुकी प्राप्ति ही शाश्वत ऐश्वर्यकी प्राप्ति है।

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४६० * गीता-संग्रह *

देहादिभ्यः पृथक्त्वेन निश्चित्यात्मानमात्मना।
देहादिममतां मिथ्याज्ञानजां परिसंत्यजेत्॥ ५० ॥
पितस्त्वं यदि संसारदुःखान्निर्वृत्तिमिच्छसि।
तदाराधय मां भक्त्या ब्रह्मरूपां समाहितः॥ ५१ ॥

अपनी आत्माको देह आदिसे पृथक् निश्चित करके मिथ्याज्ञानजनित देह आदिकी ममताका त्याग कर देना चाहिये। पिताजी! यदि आप सांसारिक दुःखोंसे छुटकारा चाहते हैं तो एकाग्रचित्त होकर भक्तिपूर्वक मुझ ब्रह्मरूपिणी भगवतीकी आराधना कीजिये॥ ५०-५१ ॥

॥ इति श्रीदेवीपुराणे भगवतीगीता श्रीपार्वती-हिमालयसंवादे तृतीयोऽध्यायः॥ ३ ॥


चौथा अध्याय

मोक्षयोगका उपदेश, दस महाविद्याओंका वर्णन तथा अनन्य शरणागतिकी महिमा

हिमालय उवाच
अनाश्रितानां त्वां देवि मुक्तिश्चेन्नैव विद्यते।
कथं समाश्रयेत्त्वां तत्कृपया ब्रूहि मे तदा॥ १ ॥
संध्येयं कीदृशं रूपं मातस्तव मुमुक्षुभिः।
त्वयि भक्तिः परा कार्या देहबन्धविमुक्तये॥ २ ॥

हिमालय बोले—देवि! यदि आपका आश्रय ग्रहण न करनेवालोंकी मुक्ति है ही नहीं तो कृपा करके मुझे यह बताइये कि मनुष्य किस प्रकार आपकी शरण प्राप्त करे। माता! देहबन्धनसे छुटकारेके लिये मोक्षकी इच्छा रखनेवालोंको आपके किस रूपका ध्यान करना चाहिये और आपकी कैसी परम भक्ति करनी चाहिये?॥ १-२ ॥

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* भगवतीगीता * ४६१


श्रीपार्वत्युवाच

मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये।
तेषामपि सहस्रेषु कोऽपि मां वेत्ति तत्त्वतः॥ ३॥

श्रीपार्वतीजी बोलीं—हजारों मनुष्योंमें कोई-कोई सिद्धिके लिये प्रयास करता है और सिद्धिके लिये तत्पर उन हजार लोगोंमें भी कोई-कोई ही मुझे वस्तुतः जान पाता है॥ ३॥

रूपं मे निष्कलं सूक्ष्मं वाचातीतं सुनिर्मलम्।
निर्गुणं परमं ज्योतिः सर्वव्याप्येककारणम्॥ ४॥
निर्विकल्पं निरालम्बं सच्चिदानन्दविग्रहम्।
ध्येयं मुमुक्षुभिस्तात देहबन्धविमुक्तये॥ ५॥

तात! मुमुक्षुओंको देहबन्धसे मुक्तिके लिये मेरे निष्कल, सूक्ष्म, वाणीसे परे, अत्यन्त निर्मल, निर्गुण, परम ज्योतिस्वरूप, सर्वव्यापक, एकमात्र कारणरूप, विकल्परहित, आश्रयहीन और सच्चिदानन्दविग्रहवाले स्वरूपका ध्यान करना चाहिये॥ ४-५॥

अहं मतिमतां तात सुमतिः पर्वताधिप।
पृथिव्यां पुण्यगन्धोऽहं रसोऽप्सु शशिनः प्रभा॥ ६॥
तपस्विनां तपश्चास्मि तेजश्चास्मि विभावसोः।
कामरागादिरहितं बलीनां बलमप्यहम्॥ ७॥

तात! मैं बुद्धिमानोंकी सद्बुद्धि हूँ। पर्वतराज! मैं ही पृथ्वीमें पवित्र गन्धके रूपमें विद्यमान हूँ, मैं ही जलमें रसके रूपमें व्याप्त हूँ, चन्द्रमाकी प्रभा मैं ही हूँ, मैं ही तपस्वियोंकी तपस्या हूँ, सूर्यका तेज मैं ही हूँ और बलवान् प्राणियोंका काम-राग आदिसे रहित बल भी मैं ही हूँ॥ ६-७॥

सर्वकर्मसु राजेन्द्र कर्म पुण्यात्मकं तथा।
छन्दसामस्मि गायत्री बीजानां प्रणवोऽस्म्यहम्॥ ८॥

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४६२ * गीता-संग्रह *


धर्माविरुद्धः कामोऽस्मि सर्वभूतेषु भूधर।
एवमन्येऽपि ये भावाः सात्त्विका राजसास्तथा॥ ९ ॥
तामसा मत्त उत्पन्ना मदधीनाश्च ते मयि।
नाहं तेषामधीनास्मि कदाचित्पर्वतर्षभ॥ १०॥

राजेन्द्र! मैं समस्त कर्मोंमें पुण्यात्मक कर्म हूँ, छन्दोंमें गायत्री नामक छन्द हूँ, बीजमन्त्रोंमें प्रणव (ओंकार) हूँ और सभी प्राणियोंमें धर्मानुकूल काम हूँ। भूधर! इसी प्रकार और भी जो सात्त्विक, राजस तथा तामस भाव हैं, वे मुझसे ही उत्पन्न हुए हैं, मेरे अधीन हैं और मुझमें विद्यमान हैं। पर्वतश्रेष्ठ! मैं उनके अधीन कदापि नहीं हूँ॥ ८—१०॥

एवं सर्वगतं रूपमद्वैतं परमव्ययम्।
न जानन्ति महाराज मोहिता मम मायया॥ ११॥
ये भजन्ति च मां भक्त्या मायामेतां तरन्ति ते।
ममैश्वर्यं न जानन्ति ऋगाद्याः श्रुतयः परम्॥ १२॥

महाराज! मायासे मोहित हुए लोग मेरे इस सर्वव्यापी, अद्वैत, परम तथा निर्विकार रूपको नहीं जान पाते हैं; किंतु जो लोग भक्तिपूर्वक मेरी उपासना करते हैं, वे इस मायाको पार कर जाते हैं। ऋक् आदि श्रुतियाँ भी मेरे परम ऐश्वर्यको नहीं जानती हैं॥ ११-१२॥

सृष्ट्यर्थमात्मनो रूपं मयैव स्वेच्छया पितः।
कृतं द्विधा नगश्रेष्ठ स्त्री पुमानिति भेदतः॥ १३॥
शिवः प्रधानः पुरुषः शक्तिश्च परमा शिवा।
शिवशक्त्यात्मकं ब्रह्म योगिनस्तत्त्वदर्शिनः॥ १४॥
वदन्ति मां महाराज तत्त्वमेवं परात्परम्।

पिताजी! नगश्रेष्ठ! सृष्टिके लिये मैंने ही अपने रूपको स्त्री तथा पुरुष-भेदसे दो भागोंमें विभक्त किया। शिव ही प्रधान पुरुष हैं और

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  • भगवतीगीता * | ४६३

शिवा ही परम शक्ति हैं। महाराज! तत्त्वदर्शी योगिजन मुझे ही शिव-शक्तिसे युक्त ब्रह्म एवं परात्पर तत्त्व कहते हैं॥ १३-१४ १/२ ॥

सृजामि ब्रह्मरूपेण जगदेतच्चराचरम् ॥ १५ ॥
संहरामि महारुद्ररूपेणान्ते निजेच्छया ।
दुर्वृत्तशमनाथाय विष्णुः परमपूरुषः ॥ १६ ॥
भूत्वा जगदिदं कृत्स्नं पालयामि महामते ।
अवतीर्य क्षितौ भूयो भूयो रामादिरूपतः ॥ १७ ॥
निहत्य दानवान्पृथ्वीं पालयामि पुनः पुनः ।
रूपं शक्त्यात्मकं तात प्रधानं यच्च मे स्मृतम् ॥ १८ ॥
यतस्तया विना पुंसः कार्यं नेहात्मना स्थितम् ।

मैं ब्रह्मरूपसे इस चराचर जगत्की सृष्टि करती हूँ, परम पुरुष विष्णु होकर इस सम्पूर्ण विश्वका पालन करती हूँ और अन्तमें अपनी इच्छासे दुराचारियोंके शमनके उद्देश्यसे महारुद्ररूपसे संहार करती हूँ। इसी तरह महामते! मैं राम आदि रूपोंसे पृथ्वीपर बार-बार अवतार लेकर दानवोंका वध करके पुनः-पुनः जगत्का पालन करती हूँ। तात! मेरा शक्त्यात्मक रूप ही प्रधान है; क्योंकि अपने स्वरूपमें स्थित रहता हुआ पुरुष उसके बिना कुछ भी करनेमें समर्थ नहीं है॥ १५-१८ १/२ ॥

रूपाण्येतानि राजेन्द्र तथा काल्यादिकानि च ॥ १९ ॥
स्थूलानि विद्धि सूक्ष्मं च पूर्वमुक्तं तवानघ ।
अनभिज्ञाय रूपं तु स्थूलं पर्वतपुङ्गव ॥ २० ॥
अगम्यं सूक्ष्मरूपं मे यद्दृष्ट्वा मोक्षभाग्भवेत् ।
तस्मात्स्थूले हि मे रूपं मुमुक्षुः पूर्वमाश्रयेत् ॥ २१ ॥
क्रियायोगेन तान्येव सम्भ्यर्च्य विधानतः ।
शनैरालोचयेत्सूक्ष्मं रूपं मे परमव्ययम् ॥ २२ ॥

राजेन्द्र! मेरे इन काली आदि रूपोंको स्थूलरूप जानो। निष्पाप!

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४६४ * गीता-संग्रह *


अपने सूक्ष्मरूपके विषयमें मैं आपसे पहले ही बता चुकी हूँ। पर्वतश्रेष्ठ! मेरे स्थूल रूपका ज्ञान किये बिना उस सूक्ष्मरूपका बोध नहीं किया जा सकता है, जिसका दर्शन करके प्राणी मोक्षका भागी हो जाता है। अतः मोक्षकी कामना करनेवाले प्राणीको पहले मेरे स्थूल रूपका आश्रय लेना चाहिये। मनुष्यको चाहिये कि वह क्रियायोगके द्वारा विधानपूर्वक मेरे उन स्थूल रूपोंकी उपासना करके ही धीरे-धीरे मेरे शाश्वत परम सूक्ष्म रूपका दर्शन करे॥१९—२२॥

हिमालय उवाच

मातर्बहुविधं रूपं स्थूलं तव महेश्वरि।
तेषु किं रूपमाश्रित्य सहसा मोक्षभागभवेत्॥ २३॥
तन्मे ब्रूहि महादेवि यदि ते मय्यनुग्रहः।
संसारान्मोचय त्वं मां दासोऽस्मि भक्तवत्सले॥ २४॥

हिमालय बोले— माता! आपके स्थूल रूप अनेक प्रकारके हैं। महेश्वरि! उनमें किस रूपका आश्रय लेकर मनुष्य शीघ्र मोक्षका भागी बन सकता है? महादेवि! यदि मुझपर आपकी कृपा हो तो मुझे उसे बताइये। भक्तवत्सले! मैं आपका दास हूँ, अतः इस संसारसे मुझे मुक्त कीजिये॥२३-२४॥

श्रीपार्वत्युवाच

मया व्याप्तमिदं विश्वं स्थूलरूपेण भूधर।
तत्राराध्यतमा देवीमूर्तिः शीघ्रं विमुक्तिदा॥ २५॥
सापि नानाविधा तत्र महाविद्या महामते।
विमुक्तिदा महाराज तासां नामानि मे शृणु॥ २६॥
महाकाली तथा तारा षोडशी भुवनेश्वरी।
भैरवी बगला छिन्ना महात्रिपुरसुन्दरी॥ २७॥