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गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि

DevanagariHindipublished675 pages

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Page 457

४५६ * गीता-संग्रह *


नाभि बन जाती है और सातवें महीनेमें केश, रोम आदि उग आते
हैं। आठवें महीनेमें गर्भमें सभी अवयव स्पष्टरूपसे अलग-अलग बन
जाते हैं। इस प्रकार पिताजी! जन्मके पश्चात् उगनेवाले दाढ़ी,
मूँछ और दाँत आदिको छोड़कर सभी अंग क्रमसे निर्मित हो जाते
हैं॥ २४-२७१/२ ॥
नवमे मासि जीवस्तु चैतन्यं सर्वशो लभेत्॥ २८॥
मातृभुक्तानुसारेण वर्धते जठरे स्थितः।
प्राप्य वै यातनां घोरां खिद्यते च स्वकर्मतः॥ २९॥
स्मृत्वा प्राक्तनदेहोत्थकर्माणि बहुदुःखितः।
मनसा वचनं ब्रूते विचार्य स्वयमेव हि॥ ३०॥
एवं दुःखमनुप्राप्य भूयो जन्म लभेत्क्षितौ।
अन्यायेनार्जितं वित्तं कुटुम्बभरणं कृतम्॥ ३१॥
नाराधिता भगवती दुर्गा दुर्गतिहारिणी।
यद्यस्मान्निष्कृतिर्मे स्याद् गर्भदुःखात्तदा पुनः॥ ३२॥
विषयान्नानुसेविष्ये विना दुर्गां महेश्वरीम्।
नित्यं तामेव भक्त्याहं पूजये यतमानसः॥ ३३॥
वृथा पुत्रकलत्रादिवासनावशतोऽसकृत्।
निविष्टसंसारमनाः कृतवानात्मनोऽहितम्॥ ३४॥
तस्येदानीं फलं भुञ्जे गर्भदुःखं दुरासदम्।
तन्न भूयः करिष्यामि वृथा संसारसेवनम्॥ ३५॥
नौवें महीनेमें जीवमें पूर्णरूपसे चेतनाशक्ति आ जाती है। वह
उदरमें स्थित रहकर माताके द्वारा ग्रहण किये गये भोजनके अनुसार
वृद्धिको प्राप्त होता रहता है। वहाँपर अपने जन्मान्तरके कर्मोंके अनुसार
घोर यातना प्राप्त करके वह जीव खिन्न हो उठता है और पूर्वजन्ममें
अपने शरीरसे किये गये कर्मोंको यादकर अत्यन्त दुःखी हो जाता