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गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि

DevanagariHindipublished675 pages

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  • भगवतीगीता * | ४५१
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तीसरा अध्याय

गर्भस्थ जीवका स्वरूप तथा गर्भमें की गयी जीवकी प्रतिज्ञा, विषयभोगोंकी दुःखमूलकता तथा देवीभक्तिकी महिमा

हिमालय उवाच

दुःखस्य कारणं देहः पञ्चभूतात्मकः शिवे।
यतस्तद्विरहाद्देही न दुःखैः परिभूयते॥ १॥
सोऽयं सञ्जायते मातः कथं देहो महेश्वरि।
यं प्राप्य सुकृतान् कामान् कृत्वा स्वर्गमवाप्स्यति॥ २॥
क्षीणपुण्यः कथं जीवो जायते च पुनर्भुवि।
तद् ब्रूहि विस्तरेणाशु यदि ते मय्यनुग्रहः॥ ३॥

**हिमालय बोले—**शिवे! यह पंचभूतात्मक देह ही दुःखका कारण है; क्योंकि उससे विलग जीव दुःखोंसे प्रभावित नहीं होता है। माता! महेश्वरी! जिस देहको प्राप्तकर यह जीव पुण्यकार्य करके स्वर्ग प्राप्त करता है, वह यह देह किस प्रकार उत्पन्न होता है? और यह जीव पुण्यके क्षीण होनेपर पुनः पृथ्वीपर किस प्रकार उत्पन्न होता है। यदि आप मुझपर कृपा रखती हैं तो उन बातोंको शीघ्र ही विस्तारपूर्वक मुझसे बताइये॥ १–३॥

श्रीपार्वत्युवाच

क्षितिर्जलं तथा तेजो वायुराकाश एव च।
एतैः पञ्चभिराबद्धो देहोऽयं पाञ्चभौतिकः॥ ४॥

**श्रीपार्वतीजी बोलीं—**पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश—इन्हीं पंचमहाभूतोंसे यह देह निर्मित है, इसीलिये यह पांचभौतिक कहा गया है॥ ४॥