गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि
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विचारके द्वारा इच्छित तथा अनिच्छित पदार्थोंकी प्राप्तिमें मोहका परित्यागकर सुखी हो जाय॥ २९-३०१/२॥
देहमूलो मनस्तापो देहः संसारकारणम्॥ ३१॥
देहः कर्मसमुत्पन्नः कर्म च द्विविधं मतम्।
पापं पुण्यं च राजेन्द्र तयोरंशानुसारतः॥ ३२॥
देहिनः सुखदुःखं स्यादलङ्घ्यं दिनरात्रिवत्।
देह मनके सन्तापका मूल है और यह देह संसारका कारण भी है। यह देह कर्मसे उत्पन्न होता है और वह कर्म पाप तथा पुण्यभेदसे दो प्रकारका होता है। राजेन्द्र! उन्हीं पाप-पुण्यके अंशके अनुसार जीवको सुख तथा दुःख प्राप्त होते हैं। दिन एवं रातकी भाँति इन सुख और दुःखका उल्लंघन नहीं किया जा सकता॥ ३१-३२१/२॥
स्वर्गादिकामः कृत्वापि पुण्यं कर्मविधानतः।
प्राप्य स्वर्गं पतत्याशु भूयः कर्म प्रचोदितम्॥ ३३॥
तस्मात्सत्संगमं कृत्वा विद्याभ्यासपरायणः।
विमुक्तसङ्गः परमं सुखमिच्छेद्विचक्षणः॥ ३४॥
स्वर्ग आदिकी प्राप्तिकी कामना करनेवाला विधानपूर्वक पुण्य कर्म करके स्वर्ग प्राप्त करनेके बाद भी शीघ्र ही कर्मसे प्रेरित होकर पुनः मृत्युलोकमें गिरता है। अतएव विद्वान्को आसक्तिका त्याग करते हुए विद्याभ्यासमें तत्पर रहकर तथा सत्संग करके परम सुखकी अभिलाषा रखनी चाहिये॥ ३३-३४॥
॥ इति श्रीदेवीपुराणे भगवतीगीतायां श्रीपार्वती-हिमालयसंवादे द्वितीयोऽध्यायः॥ २॥