गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि
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Read in context- भगवतीगीता * ४४५
एक एवाद्वितीयश्च सर्वदेहगतः परः।
स्वप्रकाशेन देहादीन् भासयन् सुसमास्थितः॥ ६॥
वह आत्मा बुद्धि आदि उपाधियोंसे रहित, चिदानन्दस्वरूप, आनन्दमय, परम प्रभायुक्त, पूर्ण तथा सत्य-ज्ञान आदि लक्षणोंवाला है। वही एकमात्र अद्वितीय सर्वश्रेष्ठ आत्मा अपने प्रकाशसे सभी प्राणियोंके सूक्ष्म देहादिको प्रकाशित करते हुए सम्यक् रूपसे सबके भीतर विराजमान है॥ ५-६॥
इत्यात्मनः स्वरूपं ते गिरिराज मयोदितम्।
एवं विचिन्तयेन्नित्यमात्मानं सुसमाहितः॥ ७॥
गिरिराज! इस प्रकार मैंने आपसे आत्माके स्वरूपका वर्णन कर दिया। मनुष्यको एकाग्रचित्त होकर इस प्रकारके लक्षणवाले आत्माका नित्य चिन्तन करना चाहिये॥ ७॥
अनात्मनि शरीरादावात्मबुद्धिं विवर्जयेत्।
रागद्वेषादिदोषाणां हेतुभूता हि सा यतः॥ ८॥
रागद्वेषादिदोषेभ्यः सदोषं कर्म सम्भवेत्।
ततः पुनः संसृतिश्च तस्मात्तां परिवर्जयेत्॥ ९॥
देह आदि अनात्म पदार्थोंमें आत्मबुद्धिका परित्याग कर देना चाहिये; क्योंकि वैसी बुद्धि राग-द्वेष आदि दोषोंका मूल कारण है। राग-द्वेष आदि दोषोंसे दोषयुक्त कर्म ही सम्भव हैं। उनसे प्राणी जन्म-मरणकी प्रक्रियासे निरन्तर बँधा रहता है, अतः शरीरादि अनात्म पदार्थोंमें उस आत्मबुद्धिका परित्याग कर देना चाहिये॥ ८-९॥
हिमालय उवाच
अशुभादृष्टजनका रागद्वेषादयः शिवे।
कथं जनैः परित्याज्यास्तन्मे त्वं वक्तुमर्हसि॥ १०॥