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गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि

DevanagariHindipublished675 pages

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४४८ * गीता-संग्रह *


अन्यो वा कोऽस्मि देहेऽस्मिन् दुःखभोक्ता महेश्वरि।
एतन्मे ब्रूहि तत्त्वेन मयि ते यद्यनुग्रहः॥ २१॥

हिमालय बोले—देवि! यदि देह तथा परमात्मस्वरूप जीवका इस लोकमें अपकार नहीं होता और ये दोनों दुःखके भागी नहीं होते तो फिर जिस दुःखका साक्षात् अनुभव होता है, वह किसे होता है? महेश्वरि! इस शरीरमें दुःख भोगनेवाला दूसरा कौन है? यदि मुझपर आपकी कृपा है तो आप मुझे इस विषयको यथार्थ रूपसे बताइये॥ १९—२१॥

श्रीपार्वत्युवाच
नैव दुःखं हि देहस्य नात्मनोऽपि परात्मनः।
तथापि जीवो निर्लेपो मोहितो मम मायया॥ २२॥
सुख्यहं दुःख्यहं चैव स्वयमेवाभिमन्यते।
अनाद्यविद्या सा माया जगन्मोहनकारिणी॥ २३॥
जातमात्रं हि सम्बद्धस्तया सञ्जायते पितः।
संसारी जायते तेन रागद्वेषादिसंकुलः॥ २४॥

श्रीपार्वतीजी बोलीं—न तो इस देहको और न तो इस परमात्मस्वरूप आत्माको ही दुःख होता है; फिर भी यह निर्लेप (विशुद्ध) आत्मा मेरी मायासे मोहित होकर स्वयं मैं सुखी हूँ, मैं दुःखी हूँ—ऐसा मान लेता है। वह माया अनादि, अविद्यास्वरूपिणी तथा जगत्‌को मोहित करनेवाली है। पिताजी! वह आत्मतत्त्व उत्पन्न होते ही उस मायासे आबद्ध हो जाता है और उसीसे वह राग-द्वेष आदि विकारोंसे व्याप्त होकर संसारी हो जाता है॥ २२—२४॥

आत्मा स्वलिङ्गं तु मनः परिगृह्य महामते।
निलीना वासना यत्र संसारे वर्ततेऽवशः॥ २५॥

महामते! यह आत्मा अपने लिंगरूप मन, जिसमें वासना निहित