गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि
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न गन्तुमपि शक्नोति बन्धुभिः परिरक्ष्यते।
श्वमार्जाररादिदंष्ट्रिभ्यो दृप्तः कालवशात्ततः॥४०॥
यथेष्टं भाषते वाक्यं गच्छत्यपि सुदूरतः।
ततश्च यौवनोद्रिक्तः कामक्रोधादिसंयुतः॥४१॥
कुरुते विविधं कर्म पापपुण्यात्मकं पितः।
तदनन्तर वह जीव मेरी मायासे मोहित होकर उन दुःखोंको भूल जाता है और कुछ भी न कर सकनेकी स्थितिको प्राप्त होकर मांस-पिण्डकी भाँति स्थित रहता है। जबतक कफ आदिसे उसकी सुषुम्णा नाडी अवरुद्ध रहती है, तबतक वह स्पष्ट वाणी बोलनेमें तथा चल-फिर सकनेमें समर्थ नहीं होता है और दैवयोगसे जब वह कुत्ते, बिल्ली आदि दाढ़युक्त जन्तुओंसे पीड़ित होता है, तब स्वजनोंद्वारा उसकी सम्यक् रक्षा की जाती है। बादमें वह स्वेच्छया कुछ बोलने लगता है और दूर-दूरतक चलने भी लगता है। पिताजी! इसके बाद कुछ काल बीतनेपर यौवनके उन्मादमें आकर वह काम, क्रोध आदिसे युक्त होकर पाप तथा पुण्यकर्म करने लगता है॥ ३८—४१ १/२॥
कुरुते कर्मतन्त्राणि देहभोगार्थमेव हि॥४२॥
स देहः पुरुषाद्भिन्नः पुरुषः किं समश्नुते।
प्रतिक्षणं क्षरत्यायुश्चलत्पर्णस्थतोयवत्॥४३॥
जिस देहके भोगके लिये जीव सारे कर्म करता है, वह देह पुरुष (जीवात्मा)-से भिन्न है; क्योंकि जीवात्माका भोगोंसे क्या सम्बन्ध? प्रतिक्षण आयुका क्षरण हो रहा है और वह हिलते हुए पत्तेपर स्थित जलकणकी भाँति क्षणभंगुर है॥ ४२-४३॥
स्वप्नोपमं महाराज सर्वं वैषयिकं सुखम्।
तथापि न भवेद्ग्लानिरभिमानस्य देहिनाम्॥४४॥