गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि
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Read in context- भगवतीगीता * ४५५
फिर एक पक्षमें वह जो पेशी होती है, उसमें रक्तप्रवाह होने लगता
है। तत्पश्चात् पचीस रातोंमें देहके अवयव अंकुरित होने लगते हैं।
महामते ! एक महीनेमें क्रमसे स्कन्ध (कन्धा), गर्दन, सिर, पीठ और
पेट—ये पाँच प्रकारके अंग निर्मित हो जाते हैं॥ १९-२१॥
द्वितीये मासि जायन्ते पाणिपादादयस्तथा।
अङ्गानां सन्धयः सर्वे तृतीये सम्भवन्ति हि॥ २२॥
अङ्गुल्यश्चापि जायन्ते चतुर्थे मासि सर्वतः।
अभिव्यक्तिश्च जीवस्य तस्मिन्नेव हि जायते॥ २३॥
ततश्चलति गर्भोऽपि जनन्या जठरे स्थितः।
दूसरे महीनेमें हाथ और पैर हो जाते हैं तथा तीसरे महीनेमें
अंगोंकी सभी सन्धियाँ उत्पन्न हो जाती हैं। पुनः चौथे महीनेमें सभी
अंगुलियाँ बन जाती हैं और उसी महीनेमें उसके भीतर जीवकी
अभिव्यक्ति हो जाती है। तब माताके उदरमें स्थित गर्भ चलने भी
लग जाता है॥ २२-२३१/२॥
श्रोत्रे नेत्रे तथा नासा जायन्ते मासि पञ्चमे॥ २४॥
तथैव च मुखं श्रोणिर्गुह्यं तस्मिन् प्रजायते।
पायुर्मेढ्रमुपस्थं च कर्णछिद्रद्वयं तथा॥ २५॥
तथैव मासि षष्ठे तु नाभिश्चापि भवेन्नृणाम्।
सप्तमे केशरोमाद्या जायन्ते च तथाष्टमे॥ २६॥
विभक्तावयवत्वं च जायते गर्भमध्यतः।
विहाय श्मश्रुदन्तादीन् जन्मान्तरसमुद्भवात्॥ २७॥
समस्तावयवा एवं जायन्ते क्रमशः पितः।
पाँचवें महीनेमें कान, नेत्र और नाकका निर्माण होता है एवं
उसी महीनेमें मुख, कमर, गुदा-शिश्न—लिंग आदि गुह्य अंग और
कानोंमें दोनों छिद्र भी बन जाते हैं। उसी तरह छठे महीनेमें मनुष्योंकी