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गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि

DevanagariHindipublished675 pages

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Page 462

* भगवतीगीता * ४६१


श्रीपार्वत्युवाच

मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये।
तेषामपि सहस्रेषु कोऽपि मां वेत्ति तत्त्वतः॥ ३॥

श्रीपार्वतीजी बोलीं—हजारों मनुष्योंमें कोई-कोई सिद्धिके लिये प्रयास करता है और सिद्धिके लिये तत्पर उन हजार लोगोंमें भी कोई-कोई ही मुझे वस्तुतः जान पाता है॥ ३॥

रूपं मे निष्कलं सूक्ष्मं वाचातीतं सुनिर्मलम्।
निर्गुणं परमं ज्योतिः सर्वव्याप्येककारणम्॥ ४॥
निर्विकल्पं निरालम्बं सच्चिदानन्दविग्रहम्।
ध्येयं मुमुक्षुभिस्तात देहबन्धविमुक्तये॥ ५॥

तात! मुमुक्षुओंको देहबन्धसे मुक्तिके लिये मेरे निष्कल, सूक्ष्म, वाणीसे परे, अत्यन्त निर्मल, निर्गुण, परम ज्योतिस्वरूप, सर्वव्यापक, एकमात्र कारणरूप, विकल्परहित, आश्रयहीन और सच्चिदानन्दविग्रहवाले स्वरूपका ध्यान करना चाहिये॥ ४-५॥

अहं मतिमतां तात सुमतिः पर्वताधिप।
पृथिव्यां पुण्यगन्धोऽहं रसोऽप्सु शशिनः प्रभा॥ ६॥
तपस्विनां तपश्चास्मि तेजश्चास्मि विभावसोः।
कामरागादिरहितं बलीनां बलमप्यहम्॥ ७॥

तात! मैं बुद्धिमानोंकी सद्बुद्धि हूँ। पर्वतराज! मैं ही पृथ्वीमें पवित्र गन्धके रूपमें विद्यमान हूँ, मैं ही जलमें रसके रूपमें व्याप्त हूँ, चन्द्रमाकी प्रभा मैं ही हूँ, मैं ही तपस्वियोंकी तपस्या हूँ, सूर्यका तेज मैं ही हूँ और बलवान् प्राणियोंका काम-राग आदिसे रहित बल भी मैं ही हूँ॥ ६-७॥

सर्वकर्मसु राजेन्द्र कर्म पुण्यात्मकं तथा।
छन्दसामस्मि गायत्री बीजानां प्रणवोऽस्म्यहम्॥ ८॥