गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि
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तदाकृतिः सन्ततिः स्यात्तत्पश्येद्भर्तुराननम्।
पर्वतश्रेष्ठ! विषम दिनमें समागम करनेसे स्त्री और सम दिनमें समागम करनेसे पुरुषकी उत्पत्ति होती है। पिताजी! ऋतुस्नान की हुई कामार्त स्त्री जिसके मुखका दर्शन करती है, उसीकी मुखाकृतिकी सन्तान जन्म लेती है। अतः स्त्रीको उस समय अपने पतिका मुख देखना चाहिये॥ १४-१५१/२॥
तद्रेतो योनिरक्तेन युक्तं भूत्वा महामते॥ १६॥
दिनेनैकेन कललं जरायुपरिवेष्टितम्।
भूत्वा पञ्चदिनैरेव बुद्बुदाकारतामियात्॥ १७॥
या तु चर्माकृतिः सूक्ष्मा जरायुः सा निगद्यते।
शुक्रशोणितयोर्योगस्तस्मिन् सञ्जायते यतः॥ १८॥
तत्र गर्भो भवेद्यस्मात्तेन प्रोक्तो जरायुजः।
महामते! वह वीर्य स्त्रीके योनिस्थित रजसे मिलकर एक दिनमें कलल (अवस्थाविशेष) बन जाता है। वही कलल अत्यन्त सूक्ष्म झिल्लीसे पूर्णतया आवृत होकर पाँच दिनोंमें बुलबुलेके आकारका हो जाता है। अत्यन्त सूक्ष्म आकारकी जो चमड़ेकी झिल्ली होती है, उसे जरायु कहा जाता है। चूँकि उसमें वीर्य तथा रजका योग होता है और उसीसे गर्भ उत्पन्न होता है, इसलिये उसे 'जरायुज' कहा गया है॥ १६—१८१/२॥
ततस्तत्सप्तरात्रेण मांसपेशीत्वमाप्नुयात्॥ १९॥
पक्षमात्रेण सा पेशी तच्छोणितपरिप्लुता।
ततश्चाङ्कुर उत्पन्नः पञ्चविंशतिरात्रिषु॥ २०॥
स्कन्धो ग्रीवा शिरःपृष्ठोदराणि च महामते।
पञ्चधाङ्गानि जायन्ते एवं मासेन च क्रमात्॥ २१॥
तत्पश्चात् सात रातोंमें वह मांसपेशियोंसे युक्त हो जाता है और