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धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation

महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा

DevanagariHindipublished213 पृष्ठ

१६. पियवग्गो (प्रिय वर्ग)

११६ ] धम्मपदं [ १९।५
जेतवन वज्जिय ( भिक्खु )
२५८–न तेन पण्डितो होति यावता बहु भासति ।
खेमी अवेरी अभयो पण्डितो'ति पवुच्चति ॥३॥
( न तावता पंडितो भवति यावता बहु भाषते ।
क्षेमी अवैरी अभयः पंडित इत्युच्यते ॥३॥ )
'अनुवाद—बहुत भाषण करनेसे पंडित नहीं होता । जो क्षेमवान् अवैरी
और अभय होता है, वही पंडित कहा जाता है ।
जेतवन एकुद्दान ( थेर )
२५६–न तावता धम्मधरो यावता बहु भासति ।
यो च अप्पम्पि सुत्वान धम्मं कायेन पस्सति ।
स वे धम्मधरो होति यो धम्मं नप्पमज्जति ॥४॥
( न तावता धर्मधरो यावता बहु भाषते ।
यश्चाल्पमपि श्रुत्वा धर्मं कायेन पश्यति ।
स वै धर्मधरो भवति यो धर्मं न प्रमाद्यति ॥४॥ )
अनुवाद—बहुत बोलनेसे धर्मधर (=धार्मिक ग्रंथोका ज्ञाता ) नहीं
होता, जो थोड़ा भी सुनकर शरीरसे धर्मका आचरण करता
है, और जो धर्ममें असावधानी (=प्रमाद ) नहीं करता,
वही धर्मधर है ।
जेतवन लकुण्टक भदिय ( थेर )
२६०–न तेन थेरो होति येन'स्स पलितं सिरो ।
परिपक्को वयो तस्स मोघजिण्णो'ति वुच्चति ॥५॥

१९।८ ] धम्मट्ठवग्गो [ ११७
( न तेन स्थविरो भवति येनाऽस्य पलितं शिरः ।
परिपक्कं वयस्तस्य मोघजीर्ण इत्युच्यते ॥५॥ )
अनुवाद—शिरके ( बालके ) पकनेसे थे (=स्थविर, वृद्ध ) नहीं होता,
उसकी आयु परिपक्व हो गई ( सही ), ( किन्तु ) वह
व्यर्थका वृद्ध कहा जाता है ।
जेतवन लकुण्टक भद्दिय ( थेर )
२६१—यम्हि सच्चञ्च धम्मो च अहिंसा सञ्जमो दमो ।
स वे वन्तमलो धीरो थेरो 'ति पवुच्चति ॥६॥
( यस्मिन् सत्यं च धर्मश्चाहिंसा संयमो दमः ।
स वै वान्तमलो धीरः स्थविर इत्युच्यते ॥६॥ )
अनुवाद—जिसमें सत्य, धर्म, अहिंसा, संयम और दम हैं, वही
विगतमल, धीर और स्थविर कहा जाता है ।
जेतवन कितने ही भिक्षु
२६२—न वाक्करणमत्तेन वण्णपोक्खरताय वा ।
साधुरूपो नरो होति इस्सुकी मच्छरी सठो ॥७॥
( न वाक्करणमात्रेण वर्णपुष्कलतया वा ।
साधुरूपो नरो भवति ईर्षुर्को मत्सरी शठः ॥७॥ )
२६३—यस्स चेतं समुच्छिन्नं मूलघच्चं समूहतं ।
स वन्तदोसो मेधावी साधुरूपो 'ति वुच्चति ॥८॥
( यस्य चैतत् समुच्छिन्नं मूलघातं समुद्घातम् ।
स वान्तदोषो मेधावी साधुरूप इत्युच्यते ॥८॥ )

११८ ] धम्मपदं [ १९।११
अनुवाद—( यदि वह ) ईर्ष्यालु, मत्सरी और शठ है; तो, वक्ता
होने मात्रसे, सुन्दर रूप होनेसे, आदमी साधु-रूप नहीं
होता है। जिसके यह जड़मूलसे बिलकुल उच्छिन्न हो गये
हैं; जो विगतदोष, मेधावी है, वही साधु-रूप कहा
जाता है।
जेतवन हत्थक ( भिक्षु )
२६४-न मुण्डकेन समणो अब्बतो अलिकं भणं ।
इच्छालाभसमापन्नो समणो किं भविस्सति ॥६॥
( न मुंडकेन श्रमणो ऽव्रतोऽलीकं भणन् ।
इच्छालाभसमापन्नः श्रमणः किं भविष्यति ॥९॥ )
२६५-यो च समेति पापानि अणुं थूलानि सब्बसो ।
समितत्ता हि पापानं समणो'ति पवुच्चति ॥१०॥
( यश्च शमयति पापानि अणूनि स्थूलानि सर्वशः ।
शमितत्वाद्वि पापानां श्रमण इत्युच्यते ॥१०॥ )
अनुवाद—जो व्रतरहित, मिथ्याभाषी है, वह मुण्डित होने मात्र से
श्रमण नहीं होता । इच्छा लाभसे भरा ( पुरुष ), क्या श्रमण
होगा ? जो छोटे बड़े पापोंको सर्वथा शमन करनेवाला है,
पापको शमित होनेके कारण वह समण (=श्रमण ) कहा
जाता है ।
जेतवन कोई ब्राह्मण
२६६-न तेन भिक्खू [सो] होति यावता भिक्खते परे ।
विस्सं धम्मं समादाय भिक्खू होति न तावता ॥११॥

१९।१४ ] धम्मट्ठवग्गो [ १११
( न तावता भिक्षुः [स] भवति यावता भिक्षते परान् ।
विश्वं धर्मं समादाय भिक्षुर्भवति न तावता ॥११॥ )
अनुवाद—दूसरोंके पास जाकर भिक्षा माँगने मात्रसे भिक्षु नहीं होता,
( जो ) सारे ( बुरे ) धर्मों (=कामों )को ग्रहण करता है
( वह ) भिक्षु नहीं होता ।
जेतवन कोई ब्राह्मण
२६७-यो'ध पुञ्जञ्च पापञ्च बाहित्वा ब्रह्मचरियवा ।
सङ्ख्वाय लोके चरति स वे भिक्खू'ति वुच्चति ॥१२॥
( य इह पुण्यं च पापं च वाहयित्वा ब्रह्मचर्यवान् ।
संख्याय लोके चरित स वै भिक्षुरित्युच्यते ॥१२॥ )
अनुवाद—जो यहाँ पुण्य और पापको छोड़ ब्रह्मचारी बन, ज्ञानके
साथ लोकमें विचरता है, वह भिक्षु कहा जाता है ।
जेतवन तीर्थिक
२६८-न मोनेन मुनी होति मूळ्हरूपो अविद्दसु ।
यो च तुलं 'व पग्गय्ह वरमादाय पण्डितो ॥१३॥
( न मौनेन मुनिर्भवति मूढरूपोऽविद्वान् ।
यश्च तुलामिव प्रगृह्य वरमादाय पंडितः ॥१३॥ )
२६९-पापानि परिवज्जेति स मुनी तेन सो मुनि ।
यो मुनाति उभो लोके मुनी तेन पवुच्चति ॥१४॥
( पापानि परिवर्जयति स मुनिस्तेन स मुनिः ।
यो मनुत उभौ लोकौ मुनिस्तेन प्रोच्यते ॥१४॥ )

१२० ] धम्मपद [ १९।१७
अनुवाद—अविद्वान् और मूढ़समान ( पुरुष, सिर्फ ) मौन होनेसे
मुनि नहीं होता, जो पंडित कि तुलाकी भाँति पकड़कर,
उत्तम (तत्त्व ) को ग्रहण कर, पापोंका परित्याग करता
है, वह मुनि है, और उक्त प्रकारसे मुनि होता है। चूंकि
वह दोनों लोकोंका मनन करता है, इसलिये वह मुनि
कहा जाता है।
जेतवन अरिय बाळिसिक
२७०—न तेन अरियो होति येन पाणानि हिंसति ।
अहिंसा सब्बपाणानं अरियो'ति पवुच्चति ॥१५॥
( न तेनाऽऽर्यो भवति येन प्राणान् हिनस्ति ।
अहिंसया सर्वप्राणानां आर्य इति प्रोच्यते ॥१५॥ )
अनुवाद—प्राणियोंको हनन करनेसे ( कोई ) आर्य नहीं होता,
सभी प्राणियोंकी हिंसा न करनेसे ( उसे ) आर्य कहा
जाता है।
जेतवन बहुतसे शील-आदि-युक्त भिक्षु
२७१-न सीलब्बतमत्तेन बाहुसच्चेन वा पन ।
अथवा समाधिलाभेन विविच्चसयनेन वा ॥१६॥
( न शीलव्रतमात्रेण बाहुश्रुत्येन वा पुनः ।
अथवा समाधिलाभेन विविच्य शयनेन वा ॥१६॥ )
२७२-फुसामि नेक्खम्मसुखं अपुथुज्जनसेवितं ।
भिक्खू ! विस्सासमापादि अप्पत्तो आसवक्खयं ॥ १७॥

१९।१७ ] धम्मट्ठवग्गो [ १२१
(स्पृशामि नैष्कर्म्यसुखं अपृथग्जनसेवितम् ।
भिक्षो ! विश्वासं मा पादीः अप्राप्त आस्रवक्षयम् ॥१७॥ )
अनुवाद—केवल शील और व्रतसे, बहुश्रुत होने (मात्र) से,
या (केवल) समाधिलाभसे, या एकान्तमें शयन करनेसे,
पृथग्जन (=अज्ञ) जिसे नहीं सेवन कर सकते, उस
नैष्कर्म्य (=निर्वाण)-सुखको मैं अनुभव नहीं कर रहा
हूँ; हे भिक्षुओ ! जब तक आस्रवों (=चित्तमलो) का क्षय
न हो जाये, जब तक चुप न बैठे रहो ।
१९—धर्मस्थवर्ग समाप्त