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धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation

महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा

DevanagariHindipublished213 पृष्ठ

पृष्ठ 129, कुल 213 में से

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पृष्ठ 129

११८ ] धम्मपदं [ १९।११
अनुवाद—( यदि वह ) ईर्ष्यालु, मत्सरी और शठ है; तो, वक्ता
होने मात्रसे, सुन्दर रूप होनेसे, आदमी साधु-रूप नहीं
होता है। जिसके यह जड़मूलसे बिलकुल उच्छिन्न हो गये
हैं; जो विगतदोष, मेधावी है, वही साधु-रूप कहा
जाता है।
जेतवन हत्थक ( भिक्षु )
२६४-न मुण्डकेन समणो अब्बतो अलिकं भणं ।
इच्छालाभसमापन्नो समणो किं भविस्सति ॥६॥
( न मुंडकेन श्रमणो ऽव्रतोऽलीकं भणन् ।
इच्छालाभसमापन्नः श्रमणः किं भविष्यति ॥९॥ )
२६५-यो च समेति पापानि अणुं थूलानि सब्बसो ।
समितत्ता हि पापानं समणो'ति पवुच्चति ॥१०॥
( यश्च शमयति पापानि अणूनि स्थूलानि सर्वशः ।
शमितत्वाद्वि पापानां श्रमण इत्युच्यते ॥१०॥ )
अनुवाद—जो व्रतरहित, मिथ्याभाषी है, वह मुण्डित होने मात्र से
श्रमण नहीं होता । इच्छा लाभसे भरा ( पुरुष ), क्या श्रमण
होगा ? जो छोटे बड़े पापोंको सर्वथा शमन करनेवाला है,
पापको शमित होनेके कारण वह समण (=श्रमण ) कहा
जाता है ।
जेतवन कोई ब्राह्मण
२६६-न तेन भिक्खू [सो] होति यावता भिक्खते परे ।
विस्सं धम्मं समादाय भिक्खू होति न तावता ॥११॥