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बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans

by नरपति नाल्ह

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DevanagariHindipublished315 pages

About this granth

Bisaldev Raso (बीसलदेव रासो) is a poem by Narapati Nalha and one of the much-discussed early works of Hindi and old Rajasthani literature. Its hero is the Chauhan king Bisaldev of Sambhar and Ajmer, usually identified with a Vigraharaja; both its date and its linguistic affiliation have been debated by scholars.

It is a poem of separation more than of war. Bisaldev marries Rajmati, daughter of King Bhoja of Malwa; stung by a remark of hers, he leaves for Orissa, and for twelve years Rajmati sends him messages in her longing until he returns and they are reunited. Her laments, arranged through the months of the year, are its most remembered passages.

This scan is of the critical edition by Dr. Tarak Nath Agrawal. His foreword explains that although Satyajivan Varma's edition already existed, Suniti Kumar Chatterji and Sukumar Sen asked him to prepare a new text from all available manuscripts and printed editions. A note of appreciation by Sukumar Sen, dated 7 May 1962, opens the book. It has 315 pages.

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  • १६४ -

है। पण्डितों ने इस नाम की उत्पत्ति और इसके अर्थ पर विभिन्न विचार प्रकट
किये हैं। ओड्र बहुत पुराना नाम है और आज का नाम ओड़ीसा या उड़ीसा
इसी से बना ज्ञात होता है। जैसे ओद्र + देश = ओड़ीसा। इस शब्द का
सम्बन्ध इसी नाम के लाल गुलाब के फूल से लगाया जाता है, जिसे यहाँ के
रहनेवाले स्वर्ग के पाँच फूलों में से एक समझते हैं। लेकिन पण्डितों ने इस
शब्द की उत्पत्ति के सम्बन्ध में कहा है कि इस शब्द का अर्थ गढ़ा या धूल
है। और इस शब्द के अपने कथित अर्थ को यह कह कर ठीक बनाते हैं कि
चूंकि इस प्रदेश के लोग संस्कृत विद्वानों की दृष्टि में बहुत ऊँचे नहीं समझे
जाते थे इसलिये यह अर्थ ठीक है। इसका दूसरा नाम उत्कल अवश्य संस्कृत
नाम है, जिसका अर्थ उन्नतिशील प्रदेश होता है। (The glorius country)
कुछ लोग इस शब्द का अर्थ Land of Bird killer लगाते हैं। तथा कुछ
ऐसे भी विद्वान् हैं, जो इसका अर्थ (The outlying Stup) बताते हैं।
इस प्रदेश का प्राचीन इतिहास यह बताता है कि यहाँ के आदि निवासी
भुइयाँ, सवर, गोंड और खोंट थे जो अपनी अपनी जातियों के प्रधान के साथ
पृथक-पृथक समूह बना कर रहते थे। कुछ काल के बाद आर्य गणों का यहाँ
प्रवेश हुआ और ये लोग अपनी बुद्धि और क्षमता के द्वारा उन आदि वासियों
पर अपना प्रभुत्व स्थापित करने में समर्थ हुए। इतिहास यह भी बताता है कि
किस प्रकार "आर्य गण जिनमें मुख्यतया राजपूत थे, उत्तर से तीर्थ यात्रा के
हेतु "पुरी" में आकर बस गये और अपना राज्य स्थापित किया। आर्यों के
राज्य स्थापित कर लेने के बाद भी उड़ीसा में छोटे-छोटे राज्यों की बहुलता
रही तथा इसके मध्यकालीन इतिहास को जानने के लिए इसके निमित्त
छोटे छोटे राज्यो के सम्बन्ध में जानना आवश्यक है। पटना राज्य के आधु-
निक राज्य-परिवार वाले आज से प्राय ६०० वर्ष पूर्व यहाँ आये थे और
उन्होंने अठारह गढ़ जात को जीतकर इस राज्य की स्थापना की। ऐसा कहा
जाता है कि इस राज्य परिवार के लोग चौहान जाति के राजपूत थे, जो मैनपुरी
के समीप रहते थे और वहाँ से मुसलमानों द्वारा भगा दिये गये थे। पटना में इस
जाति के लोगोंने बस कर अपने बल और पौरुष के द्वारा शीघ्र ही आजकल के
सम्बलपुर कहे जाने वाले जिले तथा इसके आसपास के राज्यों सोनपुर और
बामरा पर अपना आधिपत्य जमा लिया। इसके बाद ही यह जीता हुआ
भूखण्ड इस परिवार के दो भाइयों में विभाजित हो गया। इस विभाजन में
जिस भाई के हिस्से में सम्बलपुर का राज्य मिला, वही महान् हुआ और पटना
को हिस्से में पाने वाला भाई उसके अधीन हुआ। मराठों ने पहले पहल

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  • १६५ -

सम्बलपुर राज्य को जीता और सम्बलपुर राज्य के जीतने के साथ उनका
अधिकार पटना राज्य पर भी हो गया ।
मयूरभज का १३०० वर्षों का पुराना इतिहास बताता है कि यहाँ जयसिंह
नामक एक राजा हुए थे । उनके बाद उनका ज्येष्ठ पुत्र यहाँ का राजा हुआ
था, उनका मझला पुत्र क्यौन्झार का राजा हुआ । बौड और दसपल्ला राज्य
के प्रमुख भी इसी राजा जयसिंह के वंशज अपने को बताते हैं । अथ मल्लिक,
नरसिंगपुर,पाललहरा, तालचर और टिगिरिया राज्य के राजा गण भी अपने को
राजपूत कुल का मानते हैं । नयागढ को बसाने वाले रीवा के राजपूत थे और
उन्हीं के कुल के पूर्वज खण्डपरा राज्य के अधिष्ठाता थे ।
उडीसा का रनपुर राज्य सबसे प्राचीन माना जाता है और यहाँ के
राजाओं का इतिहास प्रायः ३६०० वर्ष पुराना माना गया है । इस राज
परिवार का ही एक ऐसा इतिहास है जिसमें यहाँ के आदि आगन्तुकों का चिन्ह
वर्तमान है । यहाँ के राजाओं की सार्वभौमता सर्वदा अक्षुण्ण रही । मुगल
और मराठा काल में भी यहाँ के आन्तरिक मामलों में उनके द्वारा कभी हस्त-
क्षेप नहीं किया गया ।
सन् १८०३ में मराठों से ही अंगरेजो ने उडीसा को अपने अधिकार में
लिया था ।

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परिशिष्ट ( ख )
गूजर
'गूजर' मारवाड़ की सैनिक जातियों में से एक है। किसी समय गूजर
अत्यंत शक्तिशाली थे और गुजरात प्रान्त के अधिपति थे, लेकिन आज न तो
ये गुजरात के अधिपति हैं और न इनका कार्य ही सैनिक जातियों का-सा है।
आज इनका मुख्य व्यवसाय राजपूताने में पशु पालने का है और ये पशुओं का
क्रय विक्रय भी करते हैं।
'गूजर' शब्द संस्कृत भाषा के 'गुर्जर' शब्द का अपभ्रंश है। जनरल
कनिंघम के मतानुसार 'गुजरावाला', 'गुजरात', 'गुजरखां' आदि नगरों के
नामों के साथ गूजर शब्द का प्रयोग इस जाति के नाम के कारण ही है। ये
नगर पंजाब प्रान्त के आसपास हैं, जहाँ यह जाति पहले पहल पहुँचा था।
पंजाब से यह जाति दिल्ली आई, दिल्ली से अजमेर तथा सौराष्ट्र पहुँची,
और यहाँ से इसने वल्लभीपुर के सम्पूर्ण भू क्षेत्र पर अपना अधिकार स्थापित
किया। जब इनका अधिकार इस क्षेत्र पर स्थापित हो गया, तब इस क्षेत्र का
नाम वल्लभीपुर से परिवर्तित होकर 'गुजरात' पड़ा।
जेनरल कनिंघम के उपर्युक्त मत से ऐसा ज्ञात होता है कि यह जाति विदेशी
थी और पंजाब प्रान्त से होती हुई भारत में आई। लेकिन श्री के० एम० मुन्शी
आदि विद्वानों ने इस जाति की उत्पत्ति भारतीय राजपूतों से मानी है, जिसके
प्रमाण में इन विद्वानों ने ताम्रपत्रों तथा ६ ठी शताब्दी की रचनाओं का
उल्लेख किया है।१
राजपूताने के भाट भी 'गूजरों' की उत्पत्ति राजपूतों से ही मानते हैं। आज
भी गूजरों में पँवार, चौहान तथा चन्देल आदि राजपूतों के, अनेक गोत्र तथा
गूजरगौड़, बड़ गूजर तथा गूजर पठान आदि गूजरों के गोत्र राजपूतों, ब्राह्मणों
और मुसलमानों में पाये जाते हैं। ऐतिहासिक दृष्टि से इस जाति के सम्बन्ध में
जो सामग्री हमें प्राप्त है और जिसके आधार पर इनकी उत्पत्ति के विषय में
विचार किया गया है, वह विशेष प्रामाणिक ज्ञात होता है। सम्भव है इस जाति
१-द ग्लोरी दैट वाज गुर्जर देश-के० एम० मुन्शी पृ०-८ ।

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  • १६७ -
    के राजपूताने में बसने के बाद इनका मिश्रण राजपूताने के अन्य जातियों के
    साथ हुआ हो और तब से इनके गोत्रों का अन्य अन्य जातियों में पाया जाना
    सम्भव हुआ हो। भाटों का कथन इसी आधार पर स्थित ज्ञात होता है।
    आज भी मारवाड़ के पूर्वी परगनों तथा 'पर्वतसर' आदि स्थानों में यह
    जाति पर्याप्त संख्या में विद्यमान है। यह जाति अपना घर बस्ती से दूर बनाती है
    क्योकि ऐसा करने में इन्हें अपने व्यवसाय पशु-पालन में सुविधा होती है।
    कहावत प्रसिद्ध है, 'गूजर जहाँ ऊजड़'। ये छप्पर छाने के कार्य में पटु होते हैं
    और विशेषकर इस जाति की स्त्रियाँ इस कार्य को करती हैं। उन्हे अपने इस
    कार्य की दक्षता का अभिमान भी है।
    ये लोग 'गूजरे डेरीमाता', देवजी¹ तथा 'भैरोजी' की उपासना करते हैं
    तथा अपने देवताओं के सम्मान में गले में फूल पहनते हैं। ये मास और मदिरा
    के सेवन के अभ्यस्त हैं। इनके यहाँ मृतक के शव की हजामत बना कर उसकी
    दाह क्रिया की जाती है और मृतक का श्राद्ध दीपावली पर करने की इनकी
    परम्परा है।
    'कछवाहा'
    कछवाहा जाति के राजपूत अपने वंश की उत्पत्ति महाराज रामचन्द्र जी
    के द्वितीय पुत्र 'कुश' से मानते हैं। ऐसा कहा जाता है कि यह जाति अयोध्या
    से स्थानान्तरित होकर 'नरवर' आयी और वहाँ से रोहतास और 'रोहतास' से
    'आमेर' आयी। यहाँ आकर यह जाति बस गयी। अभी भी आमेर में इनकी
    तीन मुख्य शाखाएँ मिलती हैं :-१. शेखावत, २. नरूका तथा ३. राजावत।
    १—शेखावत शेखा जी के वंशज हैं। कहा जाता है कि शेख बुरहान
    नामक किसी मुसलमान फकीर की कृपा से शेखा को जन्म हुआ था। इनके
    पिता का नाम मोकल जी था। अतः, इनसे चलने वाली शाखा का नाम शेखा-
    वत पड़ा। शेखावत अपनी सन्तानों को छह वर्ष की अवस्था तक नीले रंग की
    टोपी और पायजामा पहनाते हैं। ये लोग सूअर के मांस का भक्षण नहीं करते।
    २—नरूका अलवर राज्य का शासक वंश है।
    १. नोट—लगभग ६५० वर्ष पूर्व मेवाड़ में 'देवजी' नाम के एक महात्मा
    हुए थे। उन्होंने मेवाड़ में अनेक करामातें दिखाई थीं। गूजर इन्हीं 'देवजी'
    के भक्त हैं।
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  • १६८ -
    ३—राजावत जयपुर राजवंश के निकटतम कुटुम्बी हैं।
    पछूदाहा जाति में स्त्रियों की संख्या पुरुषों से अधिक है। ये लोग प्रधानत
    वैष्णव धर्मको मानने वाले हैं। शैव तथा शाक्त धर्म के अनुयायी इस जाति में
    बहुत कम पाये जाते हैं। इनकी कुलदेवी का नाम जमुराय माता है। इनके
    घर की स्त्रियाँ हाथ और कान में स्वर्ण के अतिरिक्त अन्य किसी धातु के गहने
    का व्यवहार नहीं करतीं।
    पंवार
    आबू पर्वत के यज्ञकुण्ड से उत्पन्न चार अग्निकुलों में से पंवार भी एक
    है। पूर्वकाल में यह वंश अत्यन्त शक्तिशाली था। परम प्रतापी राजा भोज तथा
    राजा विक्रमादित्य इसी वंश के भूषण थे।
    मारवाड़ में इस वंश की जो कथा प्रचलित है, उसके अनुसार वहाँ के
    बाड़मेर स्थान के किसी "धरणीवराह" नाम के राजा का नाम लिया जाता है,
    जो इस वंश के आदि पूर्वज थे। इनके नौ भाई थे। धरणीवराह ने मारवाड़
    को नौ भागों में बांट कर एक एक भाग प्रत्येक भाई को सौंप दिया और 'कोट
    किराड़ू' अपने पास रखा। यही विभाजन आज भी मारवाड़ में नौकोट मारवाड़
    के नाम से प्रसिद्ध है। एक पद भी इस सम्बन्ध में लोग गाते पाये जाते हैं—
    मंडोवर सावत हुओ अजमेर सिधसू ।
    गढ़ पूगल गजमल्ल हुओ, लूदवे भान भू ॥
    आलपाल अर्बुद भोजराजा जालन्धर ।
    जोग राज पर घाट हुओ हसू पारक्कर ॥
    नवकोट किरोट संजुगत थिर पवारा थापिया ।
    धरणीवराह घर भाइयों को बाँट भुजगुण किया ॥
    अर्थात् धरणीवराह ने पंवारों की सारी जमीन नौ भागों में विभाजित कर
    अपने नौ भाइयों को दे दिया और कोट किराडू अपने पास रखा। इस विभा-
    जन के अनुसार मंडोर सावन्त को अजमेर सिधु को, पूगलगढ़ गजमल्ल को,
    लुद्रवा भान को, आबू आलपाल को, जालंधर अर्थात् जालोर भोजराज को,
    तथा जोगराज को 'घात' और उमरकोट, एवं पारकर हंसराज को प्राप्त हुआ।
    इस विभाजन से पंवारों की शक्ति क्षीण हो गयी और चौहान, राठौर, पड़िहार
    आदि राजपूताने की अन्य छेत्री जातियों ने इन नौ राजाओं को धीरे धीरे जीत
    लिया। आज भी पंवारों की कुछ शाखाएँ 'सोढा', 'साखला', 'भयाल' आदि
    मारवाड़ में पाई जाती हैं। इन शाखाओं की जीविका निर्वाह का साधन अब
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  • १६६ -

किसानी है । कहीं-कहीं पंवारों में लोग शव को उलटा रख कर शवदाह करते
हैं । इनके पूर्व वैभव का एक सोरठा प्रसिद्ध है:—
पृथ्वो बडा पयार, पृथ्वी पंवारातणी ।
एक उजेणी धार, दूजो आवू नैठणूं ॥
चौहान
पंवार की तरह चोहान भी उन चार अग्निकुल वंशीय राजपूतों में से एक
है, जिनकी उत्पत्ति आवू पर्वत पर किये गये यज्ञ के अग्निकुण्ड से मानी जाती
है । कर्नल टाड के मतानुसार राजपूत जाति की समस्त शाखाओं में से ये वीरता
में सर्वश्रेष्ठ हैं । पंवर वंश के पश्चात् कुछ काल तक दिल्ली पर इन्हीं का शासन
रहा । मारवाड में भी अनेक स्थानों पर इनका अधिकार था और ये उन
स्थानों के शासक रह चुके हैं । बीसलदेव रासो के अध्ययन से पता चलता
है कि ११ वीं शताब्दी में अजमेर के शासक चोहान वंशीय राजा ही थे । आज
भी मारवाड के विभिन्न भागो में ये अपनी वीरता की सेवाओं के उपलक्ष्य में
प्राप्त भूभाग को लिये हुए बसे हुए हैं ।
चौहान वंश से जिन शाखाओं का विकास हुआ है, उनमें मुख्य और महत्व-
पूर्ण 'देवडा', 'हाडा', 'सोनगरा', 'निवाणपुर्विया' और 'सांचोरा' हैं । इन विभिन्न
शाखाओं के अतिरिक्त एक शाखा मुसलमान चौहाना की भी है, जो सन् १३८३
ई० में फिरोजशाह तुगलक के शासन काल में मुसलमान हो गये थे । इस शाखा
के चोहान 'कायमखानी' नाम से प्रसिद्ध हैं ।
चौहान वंश की कुलदेवी शाकंभरी माता हैं । इस वंश के राजपूतों में
'गोगा जी' का नाम बहुत प्रसिद्ध है । ये लोग उनके नाम का एक धागा
धारण करते हैं और विश्वास करते हैं कि यह धागा साँप के काटे व्यक्ति को
स्वस्थ करने में समर्थ है । भाद्र सुदी ६ को ये लोग 'गागानवमी' नामक उत्सव
मनाते हैं । ये गोगाजी कान थे कहा नहीं जा सकता । लेकिन इनकी मान्यता
और प्रसिद्धि को देखते हुए ज्ञात होता है कि ये अवश्य कोई सिद्ध पुरुष,
इनके वंश में हुए होंगे । 'कायमखानी' भी गोगा जी को गोगापीर के नाम से
पूजते हैं । पश्चिमी प्रान्तो के निवासी चौहानों में उत्तराधिकार में प्राप्त सम्पत्ति
को पुत्रों एव विधवा स्त्रियो में बाँटने की प्रथा है । इसी वंश ने सर्व प्रथम
'नाता प्रथा' का प्रचलन किया और 'नातरायत' के नाम से नवीन समुदाय की
नींव डाली । जालोर के राजा कानडदेव ही वे प्रथम राजा थे, जिन्होने अपनी
विधवा पुत्री का पुनर्विवाह चित्तौड के राणा के साथ कर 'नाता प्रथा' को
आरम्भ किया था ।

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  • २०० -
    भाटी
    भाटी वंश के राजपूत अपनी उत्पत्ति भगवान् कृष्ण तथा चन्द्रवंशी राज-
    पूतों के पूर्व पुरुष यदु से मानते हैं। इस वंश के राजपूतों का स्थान राठौड वंश
    के पश्चात् आता है। कर्नल टाड ने भाटी राजपूतों को भारतवर्ष के समस्त
    राजपूतों की अपेक्षा अधिक प्रसिद्ध माना है।
    जैसा कि ऊपर कहा गया है, इस जाति की उत्पत्ति के विषय में यह कथा
    प्रचलित है कि महाभारत के युद्ध के बाद भगवान् श्रीकृष्ण के उत्तराधिकारी
    मध्य एशिया में चले गये थे, और वहाँ से उन्होंने गजनी आदि प्रदेशों की
    स्थापना की। जब उन्हें ये सब स्थान किसी कारणवश छोड़ने पड़े, तब वे लौट
    कर पञ्जाब आये और दीर्घ काल तक पञ्जाब प्रान्त के 'भटनेर' नगर में बसे
    रहे। यही कारण है कि इनका नाम भाटी प्रसिद्ध हुआ। लेकिन कर्नल वाल्टर और
    कर्नल इण्ट का मत है कि किसी काल में इस वंश में भाटी नाम का कोई वीर
    योद्धा हुआ था और उसी के नाम पर इस वंश के राजपूतों का नाम भाटी
    पड़ा। इनकी उत्पत्ति चाहे उपर्युक्त कारणों में से किसी भी एक कारण से
    हुई हो लेकिन ये लोग भटनेर में बसे अवश्य थे, जहाँ से ये दिरावल होते हुए
    जैसलमेर गये और वहां अवस्थित हो गये। इस समय जैसलमेर ही इस वंश
    का केन्द्र स्थान है। इस सम्बन्ध में निम्न दोहा सुना जाता है —
    मथुरा काशी प्रागवड गजनी अरु भटनेर ।
    दिगम दिरावल लोद्रवो नग्गो जैसलमेर ॥
    कर्नल टाड का कथन है कि भाटी राठौडों के समान न तो अन्य छत्री
    दीर्घकाय और पुष्ट शरीर वाले ही होते हैं और न कछवाहों की भाँति सुन्दर
    आकृति वाले ही, लेकिन इनकी रूपरेखा आकर्षक और सुडौल होती है तथा
    वर्ण स्वच्छ होता है।
    भाटियों की दो शाखाएँ—१. 'जैसा' और २ 'रावलोत' मारवाड में आबाद
    हैं। इस वंश का वैवाहिक सम्बन्ध राजाओं और जागीरदारों के साथ अधिक
    होने के कारण इनके पास अभी भी अनेक जागीरें वर्तमान हैं।
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परिशिष्ट (ग)
शब्दार्थ
'अ'
अठार—अठारह, प्रहारह । अडहव—अनोखा, अद्वितीय । अकुलीणीय—
अकुलीन । अवफर--अपशब्द । अगध—दोष । अछइ—है । अगुहार—अगुशारि,
अनुकरण करने वाला, समान । अरथ-अर्थ, धन । अस-ऐसा । अपहछ-
अपद छू, अपच्छ, अहितकर । अनइ-अरण-जाना, नाग, पानी । अम्हि-मेरे ।
अवली सवली-सजी धजी । अहिनाण-अभिज्ञान, चिन्ह । अरण—आदि ।
'आ'
आपणइ-अपने । आभर-आभरण-गहना । आपडीया-आँख । आहेटीय-
अहेरी । आखदियउ-आनन्दित हुआ । आगिला-आगे । आजणी-अजन ।
आवासइ-रहने का स्थान । आसजीयउ-आरुजिन्न-आसक्त । आगली-बढ कर,
अच्छी, सुन्दर । आल-दोषारोपण, आड, अवलम्ब । आखरी-तेज । आणि-
आनि-लाकर । आगलउ-आगे । आपि-ठमका—पलक मारते ही ।
'इ'
इसउ—ऐसे ।
"उ ऊ"
उलगाणा-प्रवासी । ऊलगइ-स्मरणीय । उछाह-उत्साह । उघरउ-उद्धार ।
उलीभ-उलीय-कुलीय-उभइइ-निकलता है, सान से निकलता है । उलग-
परदेश, प्रवास । उलगायउ-प्रवास के निमित्त । उचाय-उभय-त्याग देना,छोड़
देना । उछइ-उच्छइ-आच्छादित । उसीस-उस्सास-उच्छ्वास ( उस्रं प्रबल :
श्वास • उच्छ्वास : ) ऊँचा श्वास लेना । उमाईयउ-उमग पर । उलट्यउ-
उलट पडा हो । ऊतउ-वहा । उजला-उज्ज्वल । उसाकी-उसकी । उधर-उदर-
पेट । उमाहियउ-उम्भाहियउ-विनाथित । उलपउ-देख सकना । उशनइ-
उनको । उभादियउ-आवेगा । उबरउ-उसका, उनका । उरिआ-हृदय में ।
उमाही-उमग । उससाइ-उत्साह । उल्ली-गहरा रही है । उभलयउ-अच्छा ।

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  • २०३ -
    चींत-चिन्ता । चतइ-चित्त । चंपीया-दबा हुआ। चउरी-चउरिया-शुभ मण्डप ।
    चंडीयउ-प्रबल, उग्र । चउरासिया-विशिष्ट पदाधिकारी । चिन्तवइ-चिन्ता
    करना, विचार करना । चऊथि-चतुर्थी ( गणेश चतुर्थी ) । चौरजउ-जिस
    प्रकार चोर रखता है । चउपंडी-चार खण्ड, चार खण्ड का राजमहल ।
    चीड़ीय-चिड़िया । चीरी-चिट्ठी । चउरा-चौपाल । चाउ-चादर ।
    "छ"
    छाइड-छाना। छुंडी-छोड़ दी । छिवणी-स्पर्श करना, छूना । छार-राख ।
    छोड़ि-डाल दी । छोटीय-छोटी छाड़ई-छांट ।
    "ज"
    जूवा-जुव-तरुण । जइतूं-जो तू । जनम हूयउ-जन्म हुआ । जान-यान-
    बारात । जोसि-ज्योतिषी-पण्डित । जोग-युक्ति । जूठउ-झूठा । जोगनी-
    जोइणी-योगिनी (ये ६४ हैं) । जुइ (जुड़ई)-जुड़ जाते हैं । जिहा-जिस । जोइ
    ज्योँ-देखना, खोजना । जइरि-यदि । जमडाढ़-तलवार । जुहारण-नमस्कार ।
    जोड़इ-आरम्भ करना । जायता-जीवता । जाइ-जाता है, जाकर । ज-प्रमान ।
    "झ"
    झलवलइ-चमकना । झूग्ता-चिन्ता, झूरना, सूखना, पछताना, विलाप
    करना । झुण कार-रुनझुन । झिगमिगइ-जगमगाना । झंपियउ-झांपना,
    व्यथित हुआ । झीड़ई-पतली । झलकय-झलकती है, चमकती है । झलमलई-
    चमकता है । झाल-ज्वाला । झुनाकउ-जूनागढ़ का ।
    "ट"
    टसकला मुसकला-घटकना, मटकना । टउरि-मैं जिस प्रकार । टेकि-
    पकड़कर ।
    "ठ"
    ठअकती-ठुमकती चाल, रुक कर चलना । ठयइ-ठह्रइ-ठविय-रखता ।
    ठाकुर-राजा । ठामोठामि-जगह-जगह । ठांइ-स्थान ।
    "ड"
    डालीयउ-फेंकना ।
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~ १०६ ~
भाटपर-भागे-भाटपद । भाग-गर्थं । भुह-भूमि । भाइम-भाई । भत्तार-
स्वामी । भमर-भ्रमर-घूमता है । भीनउ-भीग गया । भयग्य-भाग्यवाद ।
"म"

  • मुवि-मूंछें, मूर्ख । मंडिड-मोटा, गूँथा । मटिय-भग हुआ । मंगा-
    मांग । मेकलह-मोसरग्य-प्रेरित, भेजा हुआ । मोकल्या-मोकल्य-मोकलवु
    ( गुजराती )-भेजना । मुझ-मेग, मेरो । म्हारइउ-मेरे यहां । म्हारइ-मेरे ।
    मेलहउ-छोटा । मिलायउ-मिलागय, मिलायो । मुगवि-मुक्ति । मनइ-मनमें ।
    मेगा-मेघों का समूह । माय-माइ-मातृ या, मातृ या पूजन । मांडहउ-मंडरा,
    मंडप । मेल्था-मेलाय, मिलाप । मेलिह मेलह-छोड़ना । मज्न मेरुणि-नेदिनी ।
    मारू-मारवाड़ । मउतउ-मौदकर निकाल, देर से निकाल । मेटउ-मुड,
    संग्राम । माम-शामल ब्राह्मण सूचक अव्यय । महारि-महारिय-मेरा ।
    महला महल-पीछा-मर्दान । मुदि मुह मुग्म-मुह करना । गहर-गटि-दूषित ।
    म्हारी-मेरी । माहि-में । मेल्हाण-छोड़ना, परित्याग, छोड़ा । मशाण-श्मशान ।
    गढिया-गढिय-रचित, लगाकर । भोनइ-मुझे, मुझको । मेलउ, मेलय-सम्बन्ध,
    संयोग । मरेसि, मरेगा-मरेगी । मुया-मृतक । मिलण - मिलना । माजा-
    मस्त । मङ्गल-मङ्गलित ।
    'र'
    रावलउ-राना का । रावली-राजाओं की। रति-ऋतु । रया-सुन्दर । रोस-
    क्रोध । राजरउ-राजा के । रावडी-राबड़ी-शीश फूल । रिपग्यो-रखना ।
    राउ-राजा । रावलइ-राजभवन, (अन्त पुर) । रवि-अग्नि, नायक सरदार ।
    रोहणी-रोहिण-दिन का दूसरा पहर, नक्षत्र विशेष, शकेन्द्र की एक पटरानी,
    आषाढ़ के कृष्ण पक्ष में रोहिणी से चन्द्रमा का योग होता है । रनी-रुदन ।
    'ल'
    लपलहइ-लाज प्राप्त करने, पहचानने योग्य । लठि-२१ । लाल-लाल
    संख्या । लोपीय-लुप्त, अप्राप्त । लावीय-लाभ, सुन्दर रम्य । लुणिजइ-लुञ्च-
    काटा हुआ । लोवट्टी-लोभपत्री, सुन्दर बारीक । लूण-नीमक, लयण । लापा-
    लापा । लेइ-लेकर । लागिय-लगती थी । लाउ-प्रेम । लछण-लाछना ।
    लागामी-लगाम । लथइ-हिल जाता है ।
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  • २०७ -

«व तथा य»

अनवउ-वर्णन करना । वरथीसल-वीर बीसलदेव । बिचिदण-विचक्षण ।
वेगम-शीघ्र । वरि-निकृष्ट । वइसार-बैठा कर । वसउ-वसइ-स्थान । वासउ-
वास । गल्या-किया। विचाल-बिचाल-अन्तराल । गरहा-बारह । वढ़िया-बढ़ना ।
वरधू-वरधू-वाद्यविशेष । विहूणया-दो वालों से । वयग्ण-कथन, वाणी । वेपि-
भेप । विहुणोअ-विहूण-अलग करना, बिना । वालि-राजा । बार-बारह ।
विरास्या-कष्ट दिया । बोलियइ-बोलना । वाटी-चेरी । वारि-द्वार । वाहला-
वाहलीया या वाहली-क्षुद्र नदी, छोटा नद । वीध-विधि, प्रकार । वइसवाइ-
बैठने के लिये । वासीयउ-राखिय-सुगन्धित किया हुआ, सत्कारित । वाउडइ-
वाहुडइ-वाहुट्टिअ-लज्जित । वाहुड्ड्याउ-लौटा । वज्र-यज्ञ । वार-मार्ग । वाह-
वायु । वाठुब्या-लौटना । बीज-बिजली । वाटल्ल-बाटल । वउलावीया-बुलाया ।
वुढडइ-वृद्ध । वजारि-मार्जार (बिल्ली) वायीया-बाँधा । विह-उसके । बार-
शीघ्र । वाणिया-बनियों । विहुणी-बिना । वाभतउ-उठते हुए । नवामणी-बधाई ।
वहिनडी-बहन । वुहार-झाडना । वइगा-शीघ्र । वीप-पग । विसहर-विषधर-
सर्प । वाकरउ-निर्वाह करूँगा । वीरा-भाई । वारउ-मना करना । वेस-वयस ।
वइसतउ-बैठने के लिये ।

«स” और “ष”

सवारइ-सुसज्जित करना । सरसीय-सरस, साथ । सगुण-सउण-प्रसिद्ध
शुभाशुभ सूचक नाड़ीस्पन्दन, काक-दर्शन आदि निमित्त, सगुन, गुण । सामाया-
समान । सामाणसा-सुपुरुषजन । सिंदिव्यो-सीलना । सुबाए-सुन्दर, चतुर ।
सुवर-अच्छा वर । समदीय उल्हूर-बिदा करना । सोनउ-सोगण, सोना । सिउ-
ससुरा । सगलउ-सकल, सब । सजहु-सजाना, सजाओ । सरगल-सदग-सौ की
कीमत का, अनेक । सजर-सजना । सावा-सगा १८ । सुहय-सुभग । सरिसिउ-
समान । सगल-सइल-सफल । सावटू-वस्त्र विशेष । संडहि-चादर । रहास-
सास । सगलीहि-सगल-सइल-सकल । सवालपड-सपादलक्ष, देश विशेष ।
सोवन-सोयण-सोना, सुवर्ण । सवाहीयउ-प्रशंसा । सु-से । सीपि-शिल्पा ।
साहणी-साहुनी । सुचग-धग-सुन्दर । सुणाउ-सुनो । सूकट-सिकोड़ना ।
साथि-साथ । स-सग । सिरि-सिर से । सहिणाण-चिन्ह, (पहचान) ।
सुणवियउ-सुनाना । सार-मूल्य । उत्कृष्ट, अच्छी । सायर-सागर-समुद्र ।
सूरि-गूर कर । सारिणी-सारिखस-समान, सरीखा । सारिपउ-सारिखस-सदृश,
समान । सउण-शकुन-सगुन । सउचरि-चार सौ । साढि-ऊँट । सकउ-सकना।

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  • ३०४ -
    “ढ”
    ढाफणउ-ढापा जाना, छिपाना। दुलई-चल रहा है।
    “त”
    तणउ-तण-तृण-घास। तुरीय-तुरग-घोड़ा। ताजीय-ताजी। ताणीया-
    तणिअ-ताना हुआ। तिउरि-उसी प्रकार। तलइ-नीचे। तह-तेरे। तत-
    तप्त। ताजणउ-घोड़े का। तापडउ-धूप। तुमनह-तुमसे। तूठउ-संतुष्ट।
    तेजी-ताजो, घोड़े की एक जाति। तंगारह-तंबोलि-रान। तोरणि-बहिर्द्वार
    तूठी-तुष्ट, प्रसन्न। तपई-तप्पइ 'तप करना', गरम होना, तपाना। वती-से।
    “थ”
    थोटी-थोटी-कुछ-कुछ।
    “द”
    देखउ-देखना। दातार-देने वाला, दाता। देउयो-दे। दीन-दिया।
    दीयठ-दरवाजे पर। देडवढी-दुंदुभी। दाहिमा-दक्षिण दिशा, दक्षिण देश।
    दाइजउ-दहेज। दिहाडउ-दिन। दावडी-लड़की, छोकड़ी। दीज-द्वितीया।
    दाधा-जलाया हुआ। दिठि-दृष्टि दिटि-नजर, नेत्र। दवरती-दमयंती। दुषि-
    दुःख। दुधू-दुग्ध-दूध। देवरुइ-देवता का। देव-देवता 'दृश्य' यहाँ बीसल
    देव। दीप-दीपक (राजमती)।
    “ध”
    धीरियउ-धार का। धारइ-धारण किया। धान-धान्य, अन्न। धीन-
    धान्य। धण-स्त्री राजमती। धवल्या-सफेद, सफेदी कराना। धवलीय-धौरी।
    धीरय-वीर्य्य-धैर्य। धण का नाह-पति। धण-राजमती।
    “न”
    नवि-णवि (वैपरीत्य सूचक अव्यय) नहीं। नइ-णइ-नदी, नम्रतापूर्वक।
    नवसर, नव-णव, नया। नावइ-न आवइ-नहीं आता है। नावीया-नहीं
    आवोगे। नल्ह-नाल्ह कवि। नगर-शहर। नीकी-अच्छी, सुन्दर। नयण-
    नयन-आँख। नीसरइ-णिस्सरइ, बाहर निकलना। णिवात-नवनीत-मक्खन।
    नयर-नगर। नाह-णाह, नाथ। नरेश-नरों के स्वामी। नीसाणौ-नगाड़ा।
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  • २०५ -

नालेर-नारिकेल-नारियल । निवार, णिवार-निवारण । नवकरि-नमस्कार
करना । नयीण-नम्रतापूर्वक, नम्र होकर । निहालती-निरीक्षण करना-देखना ।
नाद-शान । न्हांग-नहाना । निरममां-निष्ठुर । नहड़ा-निकट ।
"प"
पयाण-प्रयाण-गमन, प्रस्थान । पाणही, पाणहा-जूता । पूगी-पूरा कर ।
पीक-पान का पीक । परिहसि-परिहास । पउलि-पौरि । पयउहर-पयोधर ।
पूहुउ-पूछो । पुरिणी-पूर्व का (उड़ीसा का) । पूति-पुत्त-पुत्र । पारण्ड-
पारण । परिगह-परिणगाह-ममत्व । परिमाण-प्रमाण । पूरव्वउ-पूर्व का ।
पाटलउ-पाटा । पृठि-पृष्ठि, पिठ्ठो, पृष्ठ, पीठ । परहरउ-छोड़ना (छोड़ा)
पहुता-पहुँचा । पग-पांव । पातलउ-पतला । पधारउ-पधारना, जाना । पछहं-
पीछे । पूरवी-पूर्व का । पाका-पका । पटोली-पट्ट, पहनने का कपड़ा । पसाउ-
प्रसादन-प्रसन्न करना । पलाणि-पलोँड । पाणइ-पानी । पालि-तालाब आदि का
बन्ध । पायस्या-पायस-खीर । पगर-पगड़ी । पोष-पौष मास । पालपी-पालकी ।
पहिरावणं-पहिरामण-पहिरावण-भेंट में दिया जाता है वस्त्र जो । परणि-विवाह ।
पश्चिम-पश्चिम । पहिरणइ-परिधान । पातली-पतली । परगास परकास-प्रकास-
दिया, इसा । पतंगउ-पन्ना, पंचांग । प्रथमइ-पहले । पठाइ-भेज दे । पालउ-
पालन करो । पतीयं-विश्वास करना । पाषारह-पाखार, काठी (घोड़ों पर पाखर
काठी) । पपालिज्यो-पतारना । पाट-रेशम । पटंबर-रेशमी वस्त्र । पऊत-
लउ-पहुँचा । पाइअइ-पाना । परिणवा-विवाह । पाइक-प्यादा, पैर से चलने
वाला सैनिक । पाटि-पीठ । पलाणीया-पलाणिअ-भागा, दौड़ा, भागा हुआ,
गया । पडलि-पडलिअ-पका हुआ, जला हुआ दुग्ध । पौरि-ड्योढ़ी । पहर-
पहनना । पतीजी-प्रतीति, विश्वास । परकाइ-दूसरों के शरीर में । पंषी-पक्षी ।
पउहर-पयोधर । परजल-प्रज्ज्वलित । पाइसुं-पायस-खीर ।
"फ"
फाटि-फटकर । फेडियउ-छोड़ना । फट्फइ-फड़कना । फिऱ्या-घूमा ।
फूला-फुलरा । फेरवी-फेरना ।
"भ"
भवण-उत्पत्ति, जन्म, मकान, असुर कुमार आदि देवों का विमान, सत्ता ।
भेदइ-भेदना, तोड़ना । भेरि-भेरी, वाद्य विशेष । भोगवउ-भोग करना ।

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  • २०८ -
    मदि-मदना । सगलप-नागल-सपल-सफल । गोचिति-यह हृदय में । सांयलउ-
    संबल । सुमाइ-सुमग-आनन्द । गं-गाथ, से । रांड-गमान । भीम-जर ।
    मझोभित-सुशोभित । मुणीजा-सनेही, स्नेहियों । गंरया-थोड़ा । पाग्-पान ।
    पाल-निचले भूभाग (गड्ढे) । पेह-खेद-धूलि-रज । विसाइ-चमक जाती है ।
    पास्ड-सार । पाउलि-चौरी । पाइ-पाने बैठना । सद-सद्यः । मुरस-स्ववश-
    स्वतन्त्र । सोपारइ-लग्न की सुपारी । सीला-शीतल । मुमतउ-धीरे-धीरे । संचि-
    जइ-सींचते हैं ।
    '६'
    हस वाहण-हंसवाहिनी, सरस्वती । तुउ-तुझा । हउँरि-मैं । हियडलइ-
    हृदय । ढेली-ढोली । हलवइ-धीरे । हारि-पराभूत होना ।
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  • सहायक ग्रन्थों की सूची *,
    'छंद, रस, और अलंकार तथा भाषा'
    १. उक्ति व्यक्ति प्रकरणम्— सं० मुनि जिनविजय तथा डा० सुनीति
    कुमार चाटुर्ज्या ।
    २ छंदोऽनुशासनम्— संपादक प्रो०एच० डी० वेलणकर ।
    ३ छंद प्रभाकर— जगन्नाथ प्रसाद "भानु" ।
    ४. पिंगल छंद सूत्रम्— पिंगलाचार्य, स्व०पं० सीतानाथ समाध्यायी
    भट्टाचार्य द्वारा सम्पादित तथा श्री
    गोविन्द चन्द्र काव्यतीर्थ पुराणाशास्त्री
    द्वारा संशोधित ।
    ५. रघुनाथ रूपक गीतारा— मंश कवि 'त० महताब चन्द्र रांकेड,
    'विशारद'जयपुरवाल । 'नागरी प्रचारिणी
    सभा काशी ।'
    ६. अपभ्रंश मीटर्स— प्रो० एच० डी० वेलणकर, 'बम्बई
    यूनिवर्सिटी जर्नल १६३३-३४ पृ०
    ३२-३४ ।'
    ७. राजस्थानी लोकगीत— स्व० श्री सूर्यकिरण पारीक, एम० ए० ।
    ८. रस गंगाधर— जगन्नाथ पण्डितराज 'सं०—पं०
    पुरुषोत्तम शर्मा चतुर्वेदी, नागरी प्रचा-
    रिणी सभा ।'
    ६ काव्य कल्पद्रुम— कन्हैयालाल पोद्दार ।
    १० हिन्दी व्याकरण— कामताप्रसाद गुरु ।
    ११. नोट्स आन दि ग्रामर आफ
    दी ओल्ड वेस्टर्न राजस्थानी— तेस्सितोरी ।
    १२. हिन्दी भाषा का इतिहास — डा० धीरेन्द्र वर्मा ।
    १३. राजस्थानी भाषा — डा० सुनीति कुमार चाटुर्ज्या ।
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  • २१० -
    १४. राजस्थानी भाषा और साहित्य- पं० मोतीलाल मेनारिया।
    १५. डिंगल में वीररस- " " "
    १६. कम्परेटिव फाइलोलाजी- डा० पी० डी० गुने।
    १७. लिंग्विस्टिक सर्वे आफ इण्डिया- वोल्यूम ६।
    १८. अ ग्रामर आफ कम्पेरेटिव
    आर्यन लैंग्वेज- जान बीम्स।
    १६. अ ग्रामर आफ गाडियन
    लैंग्वेज- ए० एफ० आर० हार्नले।
    इतिहास, भूगोल, तथा अन्य पुस्तकें
    २०. नागरी प्रचारिणी पत्रिका- संवत् १६५८, १६७६, १६८२, १६६५,
    १६६६, १६६७.
    २१. राजस्थानी पत्रिका- भाग ३
    २२. एनुअल रिपोर्ट आन दी सर्च
    फार हिन्दी मैन्युस्क्रिप्ट फार
    दी इयर १६००।
    २३. बार्दिक सेलेक्शन्स - लाला सीताराम।
    २४. मिश्रबन्धुविनोद-
    २५. पृथ्वीराज विजयाख्य महाकाव्यम्-जौनराज कृत टीका सहित
    'बिब्लोथेका इंडिका प्रकाशन।'
    २६. भारत के प्राचीन राजवंश-
    २७ इण्डियन एन्टिक्वेरी 'वाल्यूम १४।'
    २८. वेलिकृष्ण रुक्मिणीरी
    २६. राजपूताने का इतिहास- डा० गौरी शंकर हीराचन्द्र ओझा।
    ३०. रिपोर्ट्स आफ दी आर्के
    लाजिकल सर्वे आफ इण्डिया।
    ३१. हिस्ट्री आफ ओरीसा- श्री आर० डी० बनर्जी
    ३२ एनल्स एण्ड ऐन्टिक्लीटीज
    आफ राजस्थान- कर्नल टाड।
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  • २११ -
    ३३ राजपूताने का इतिहास- जगदीश सिंह गहलोत ।
    ३४. हिस्ट्री आफ मालवा- मालकम ।
    ३५ वंश भास्कर- सूर्यमल्ल मिश्र ।
    ३६. अजमेर मारवाड़ गजेटियर सी० सी० वाटसन ।
    ३७. अजमेर हिस्टारिकल एण्ड
    डेसक्रिप्टिव- एच० बी० शारदा ।
    ३८ डाइनेस्टिक हिस्ट्री आफ
    नादर्न इण्डिया । वाल० १ एव २ डा० एच० सी० राय ।
    ३६ राजा भोज- विश्वेश्वर नाथ रेऊ ।
    ४०. एन्स्येन्ट जोमफी आफ इंडिया-एलेक्जेण्डर कनिंघम ।
    ४१ सेन्ट्रल इण्डिया गजेटियर ।
    ४२. एन्शियन्ट हिस्ट्री आफ इण्डिया वा० ए० स्मिथ ।
    ४३ इण्डियन क्रानोलगी- एल० डी० कन्नास्वामी पिल्लइ
    ४४ हिस्ट्री आफ ओरीसा- एल० के० महताब ।
    ४५ जर्नल आफ द एशियाटिक
    सोसाइटी 'बंगाल' ।
    ४६ इण्डियन एराभ - एलेक्जेण्डर कनिंघम ।
    ४७ एन्शियन्ट इण्डियन हिस्ट्री-विनायक राव ।
    ४८ मगरह मेरवाड़े की कौमों का
    इतिहास ।
    ४६ द ग्लोरी दैत वाज गुजरात
    देश (भाग ३)- श्री के० एम० मुन्शी ।
    ५०. हिस्टोरिकल इन्सक्रिप्शन्स
    आफ गुजरात- जी० वी० आचार्य ।
    ५१. हिस्ट्री आफ मेडिवियल हिन्दू
    इण्डिया- सी० सी० वैद्य ।
    ५२. हिस्ट्री आफ पारमार्स आफ
    मालवा- डी० सी० गांगुली ।
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  • २१२ -
    ५३. एन्सियन्ट इण्डिया ऐज डेसक्राइब्ड् बाई टालेमो ।
    ५४ वीर काय— डा० उदयनारायण तिवारी ।
    ५५ बीसलदेव रासो— श्री सत्यजीवन वर्मा ।
    ५६ बीसलदेव रासो— डा० माताप्रसाद गुप्त ।
    ५७ हिन्दी साहित्य का इतिहास-आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ।
    ५८. हिन्दी साहित्य का आलो
    चनात्मक इतिहास— डा० रामकुमार वर्मा ।
  • शब्द कोष *
    ५६ पाइ अ - सद् - महार्णवो ।
    ६०. अभिधान राजेन्द्र ।
    ६१ संस्कृत हिन्दी डिक्शनरी -- मानियर विलियम ।
    ६२ वैदिक इंडेक्स । मैकडोनेल और कोय ।
    ६३ हिन्दी शब्द सागर ।
    ६४ ढोला मारू रा दूहा ।
    ६५ डिंगल रा सबद । रायल एशियाटिक सोसाइटी में सुरक्षित
    पाण्डुलिपि । राजस्थाना पाण्डुलिपियों
    की सूची पत्र स० ३८ सी० १६ ।
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अंग्रेजी ग्रन्थ
1 Introduction to the Principles of Textual Criticism—
Dr. Katre
2 The Grammar of Old Western Rajasthani—Dr L P.
Tissitori
3. Comperative Philology—Dr. P. D. Gune.
4 Linguistic Survey of India—Vol IX.
5 History of Orrisa—R. D Banerjee
6 Rajasthan—Todd (Crooke's Edition)
7. History of Malwa—Malcolm.
8 Hindi Search Reports
9 A Grammer of Comperative Aryan Language—John Beams.
10 A Grammar of Gandhian Language—A. F R Horenle.
11 Gujrati Language & Literature—N B Divatia
12 Ajmer-Merwara Gazetteer—C C Watson
13 Dynastic History of Rajput (Vol I & II)—Dr Hem Ray
14. History of Kanauj—Dr R S Tripathy
15 Ancient Geography of India—Cunningham
16 Gazetteer of C. India—(Malva Dhar)
17 Ancient History of India—V A Smith
18. Ajmer—H B. Sarda
19 Marwar Ka Itihas—Biswesuar Nath Reu
20. Indian Chronology—L D Swami K. Pillai
21. History of Orrissa—H. K Mahatab
22 Indian Eras—Cunningham.
23 Bardic Chronicals of Rajsthan.
24. The Glory that was Gujarat-Desha P. III—K. M. Munshi.
25 Historical Inscriptions of Gujrat—G. V Acharya
26 History of Mediawal Hindu India—C V. Vaidya
27 History of the Parmars of Malwa—D C. Ganguly.
28 Ancient India as described by—Ptolemy.
29. Rajputana Gazetteer Vol I & II