बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)
Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans
by नरपति नाल्ह
DevanagariHindipublished315 pages
Page 310 of 315
Read in contextPage 310
- २०८ -
मदि-मदना । सगलप-नागल-सपल-सफल । गोचिति-यह हृदय में । सांयलउ-
संबल । सुमाइ-सुमग-आनन्द । गं-गाथ, से । रांड-गमान । भीम-जर ।
मझोभित-सुशोभित । मुणीजा-सनेही, स्नेहियों । गंरया-थोड़ा । पाग्-पान ।
पाल-निचले भूभाग (गड्ढे) । पेह-खेद-धूलि-रज । विसाइ-चमक जाती है ।
पास्ड-सार । पाउलि-चौरी । पाइ-पाने बैठना । सद-सद्यः । मुरस-स्ववश-
स्वतन्त्र । सोपारइ-लग्न की सुपारी । सीला-शीतल । मुमतउ-धीरे-धीरे । संचि-
जइ-सींचते हैं ।
'६'
हस वाहण-हंसवाहिनी, सरस्वती । तुउ-तुझा । हउँरि-मैं । हियडलइ-
हृदय । ढेली-ढोली । हलवइ-धीरे । हारि-पराभूत होना ।