बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)
Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans
by नरपति नाल्ह
DevanagariHindipublished315 pages
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३—राजावत जयपुर राजवंश के निकटतम कुटुम्बी हैं।
पछूदाहा जाति में स्त्रियों की संख्या पुरुषों से अधिक है। ये लोग प्रधानत
वैष्णव धर्मको मानने वाले हैं। शैव तथा शाक्त धर्म के अनुयायी इस जाति में
बहुत कम पाये जाते हैं। इनकी कुलदेवी का नाम जमुराय माता है। इनके
घर की स्त्रियाँ हाथ और कान में स्वर्ण के अतिरिक्त अन्य किसी धातु के गहने
का व्यवहार नहीं करतीं।
पंवार
आबू पर्वत के यज्ञकुण्ड से उत्पन्न चार अग्निकुलों में से पंवार भी एक
है। पूर्वकाल में यह वंश अत्यन्त शक्तिशाली था। परम प्रतापी राजा भोज तथा
राजा विक्रमादित्य इसी वंश के भूषण थे।
मारवाड़ में इस वंश की जो कथा प्रचलित है, उसके अनुसार वहाँ के
बाड़मेर स्थान के किसी "धरणीवराह" नाम के राजा का नाम लिया जाता है,
जो इस वंश के आदि पूर्वज थे। इनके नौ भाई थे। धरणीवराह ने मारवाड़
को नौ भागों में बांट कर एक एक भाग प्रत्येक भाई को सौंप दिया और 'कोट
किराड़ू' अपने पास रखा। यही विभाजन आज भी मारवाड़ में नौकोट मारवाड़
के नाम से प्रसिद्ध है। एक पद भी इस सम्बन्ध में लोग गाते पाये जाते हैं—
मंडोवर सावत हुओ अजमेर सिधसू ।
गढ़ पूगल गजमल्ल हुओ, लूदवे भान भू ॥
आलपाल अर्बुद भोजराजा जालन्धर ।
जोग राज पर घाट हुओ हसू पारक्कर ॥
नवकोट किरोट संजुगत थिर पवारा थापिया ।
धरणीवराह घर भाइयों को बाँट भुजगुण किया ॥
अर्थात् धरणीवराह ने पंवारों की सारी जमीन नौ भागों में विभाजित कर
अपने नौ भाइयों को दे दिया और कोट किराडू अपने पास रखा। इस विभा-
जन के अनुसार मंडोर सावन्त को अजमेर सिधु को, पूगलगढ़ गजमल्ल को,
लुद्रवा भान को, आबू आलपाल को, जालंधर अर्थात् जालोर भोजराज को,
तथा जोगराज को 'घात' और उमरकोट, एवं पारकर हंसराज को प्राप्त हुआ।
इस विभाजन से पंवारों की शक्ति क्षीण हो गयी और चौहान, राठौर, पड़िहार
आदि राजपूताने की अन्य छेत्री जातियों ने इन नौ राजाओं को धीरे धीरे जीत
लिया। आज भी पंवारों की कुछ शाखाएँ 'सोढा', 'साखला', 'भयाल' आदि
मारवाड़ में पाई जाती हैं। इन शाखाओं की जीविका निर्वाह का साधन अब