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बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans

by नरपति नाल्ह

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DevanagariHindipublished315 pages

Page 306 of 315

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Page 306

~ १०६ ~
भाटपर-भागे-भाटपद । भाग-गर्थं । भुह-भूमि । भाइम-भाई । भत्तार-
स्वामी । भमर-भ्रमर-घूमता है । भीनउ-भीग गया । भयग्य-भाग्यवाद ।
"म"

  • मुवि-मूंछें, मूर्ख । मंडिड-मोटा, गूँथा । मटिय-भग हुआ । मंगा-
    मांग । मेकलह-मोसरग्य-प्रेरित, भेजा हुआ । मोकल्या-मोकल्य-मोकलवु
    ( गुजराती )-भेजना । मुझ-मेग, मेरो । म्हारइउ-मेरे यहां । म्हारइ-मेरे ।
    मेलहउ-छोटा । मिलायउ-मिलागय, मिलायो । मुगवि-मुक्ति । मनइ-मनमें ।
    मेगा-मेघों का समूह । माय-माइ-मातृ या, मातृ या पूजन । मांडहउ-मंडरा,
    मंडप । मेल्था-मेलाय, मिलाप । मेलिह मेलह-छोड़ना । मज्न मेरुणि-नेदिनी ।
    मारू-मारवाड़ । मउतउ-मौदकर निकाल, देर से निकाल । मेटउ-मुड,
    संग्राम । माम-शामल ब्राह्मण सूचक अव्यय । महारि-महारिय-मेरा ।
    महला महल-पीछा-मर्दान । मुदि मुह मुग्म-मुह करना । गहर-गटि-दूषित ।
    म्हारी-मेरी । माहि-में । मेल्हाण-छोड़ना, परित्याग, छोड़ा । मशाण-श्मशान ।
    गढिया-गढिय-रचित, लगाकर । भोनइ-मुझे, मुझको । मेलउ, मेलय-सम्बन्ध,
    संयोग । मरेसि, मरेगा-मरेगी । मुया-मृतक । मिलण - मिलना । माजा-
    मस्त । मङ्गल-मङ्गलित ।
    'र'
    रावलउ-राना का । रावली-राजाओं की। रति-ऋतु । रया-सुन्दर । रोस-
    क्रोध । राजरउ-राजा के । रावडी-राबड़ी-शीश फूल । रिपग्यो-रखना ।
    राउ-राजा । रावलइ-राजभवन, (अन्त पुर) । रवि-अग्नि, नायक सरदार ।
    रोहणी-रोहिण-दिन का दूसरा पहर, नक्षत्र विशेष, शकेन्द्र की एक पटरानी,
    आषाढ़ के कृष्ण पक्ष में रोहिणी से चन्द्रमा का योग होता है । रनी-रुदन ।
    'ल'
    लपलहइ-लाज प्राप्त करने, पहचानने योग्य । लठि-२१ । लाल-लाल
    संख्या । लोपीय-लुप्त, अप्राप्त । लावीय-लाभ, सुन्दर रम्य । लुणिजइ-लुञ्च-
    काटा हुआ । लोवट्टी-लोभपत्री, सुन्दर बारीक । लूण-नीमक, लयण । लापा-
    लापा । लेइ-लेकर । लागिय-लगती थी । लाउ-प्रेम । लछण-लाछना ।
    लागामी-लगाम । लथइ-हिल जाता है ।