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बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans

by नरपति नाल्ह

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DevanagariHindipublished315 pages

Page 303 of 315

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Page 303
  • २०० -
    भाटी
    भाटी वंश के राजपूत अपनी उत्पत्ति भगवान् कृष्ण तथा चन्द्रवंशी राज-
    पूतों के पूर्व पुरुष यदु से मानते हैं। इस वंश के राजपूतों का स्थान राठौड वंश
    के पश्चात् आता है। कर्नल टाड ने भाटी राजपूतों को भारतवर्ष के समस्त
    राजपूतों की अपेक्षा अधिक प्रसिद्ध माना है।
    जैसा कि ऊपर कहा गया है, इस जाति की उत्पत्ति के विषय में यह कथा
    प्रचलित है कि महाभारत के युद्ध के बाद भगवान् श्रीकृष्ण के उत्तराधिकारी
    मध्य एशिया में चले गये थे, और वहाँ से उन्होंने गजनी आदि प्रदेशों की
    स्थापना की। जब उन्हें ये सब स्थान किसी कारणवश छोड़ने पड़े, तब वे लौट
    कर पञ्जाब आये और दीर्घ काल तक पञ्जाब प्रान्त के 'भटनेर' नगर में बसे
    रहे। यही कारण है कि इनका नाम भाटी प्रसिद्ध हुआ। लेकिन कर्नल वाल्टर और
    कर्नल इण्ट का मत है कि किसी काल में इस वंश में भाटी नाम का कोई वीर
    योद्धा हुआ था और उसी के नाम पर इस वंश के राजपूतों का नाम भाटी
    पड़ा। इनकी उत्पत्ति चाहे उपर्युक्त कारणों में से किसी भी एक कारण से
    हुई हो लेकिन ये लोग भटनेर में बसे अवश्य थे, जहाँ से ये दिरावल होते हुए
    जैसलमेर गये और वहां अवस्थित हो गये। इस समय जैसलमेर ही इस वंश
    का केन्द्र स्थान है। इस सम्बन्ध में निम्न दोहा सुना जाता है —
    मथुरा काशी प्रागवड गजनी अरु भटनेर ।
    दिगम दिरावल लोद्रवो नग्गो जैसलमेर ॥
    कर्नल टाड का कथन है कि भाटी राठौडों के समान न तो अन्य छत्री
    दीर्घकाय और पुष्ट शरीर वाले ही होते हैं और न कछवाहों की भाँति सुन्दर
    आकृति वाले ही, लेकिन इनकी रूपरेखा आकर्षक और सुडौल होती है तथा
    वर्ण स्वच्छ होता है।
    भाटियों की दो शाखाएँ—१. 'जैसा' और २ 'रावलोत' मारवाड में आबाद
    हैं। इस वंश का वैवाहिक सम्बन्ध राजाओं और जागीरदारों के साथ अधिक
    होने के कारण इनके पास अभी भी अनेक जागीरें वर्तमान हैं।