बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)
Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans
by नरपति नाल्ह
DevanagariHindipublished315 pages
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चींत-चिन्ता । चतइ-चित्त । चंपीया-दबा हुआ। चउरी-चउरिया-शुभ मण्डप ।
चंडीयउ-प्रबल, उग्र । चउरासिया-विशिष्ट पदाधिकारी । चिन्तवइ-चिन्ता
करना, विचार करना । चऊथि-चतुर्थी ( गणेश चतुर्थी ) । चौरजउ-जिस
प्रकार चोर रखता है । चउपंडी-चार खण्ड, चार खण्ड का राजमहल ।
चीड़ीय-चिड़िया । चीरी-चिट्ठी । चउरा-चौपाल । चाउ-चादर ।
"छ"
छाइड-छाना। छुंडी-छोड़ दी । छिवणी-स्पर्श करना, छूना । छार-राख ।
छोड़ि-डाल दी । छोटीय-छोटी छाड़ई-छांट ।
"ज"
जूवा-जुव-तरुण । जइतूं-जो तू । जनम हूयउ-जन्म हुआ । जान-यान-
बारात । जोसि-ज्योतिषी-पण्डित । जोग-युक्ति । जूठउ-झूठा । जोगनी-
जोइणी-योगिनी (ये ६४ हैं) । जुइ (जुड़ई)-जुड़ जाते हैं । जिहा-जिस । जोइ
ज्योँ-देखना, खोजना । जइरि-यदि । जमडाढ़-तलवार । जुहारण-नमस्कार ।
जोड़इ-आरम्भ करना । जायता-जीवता । जाइ-जाता है, जाकर । ज-प्रमान ।
"झ"
झलवलइ-चमकना । झूग्ता-चिन्ता, झूरना, सूखना, पछताना, विलाप
करना । झुण कार-रुनझुन । झिगमिगइ-जगमगाना । झंपियउ-झांपना,
व्यथित हुआ । झीड़ई-पतली । झलकय-झलकती है, चमकती है । झलमलई-
चमकता है । झाल-ज्वाला । झुनाकउ-जूनागढ़ का ।
"ट"
टसकला मुसकला-घटकना, मटकना । टउरि-मैं जिस प्रकार । टेकि-
पकड़कर ।
"ठ"
ठअकती-ठुमकती चाल, रुक कर चलना । ठयइ-ठह्रइ-ठविय-रखता ।
ठाकुर-राजा । ठामोठामि-जगह-जगह । ठांइ-स्थान ।
"ड"
डालीयउ-फेंकना ।