बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)
Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans
by नरपति नाल्ह
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गूजर
'गूजर' मारवाड़ की सैनिक जातियों में से एक है। किसी समय गूजर
अत्यंत शक्तिशाली थे और गुजरात प्रान्त के अधिपति थे, लेकिन आज न तो
ये गुजरात के अधिपति हैं और न इनका कार्य ही सैनिक जातियों का-सा है।
आज इनका मुख्य व्यवसाय राजपूताने में पशु पालने का है और ये पशुओं का
क्रय विक्रय भी करते हैं।
'गूजर' शब्द संस्कृत भाषा के 'गुर्जर' शब्द का अपभ्रंश है। जनरल
कनिंघम के मतानुसार 'गुजरावाला', 'गुजरात', 'गुजरखां' आदि नगरों के
नामों के साथ गूजर शब्द का प्रयोग इस जाति के नाम के कारण ही है। ये
नगर पंजाब प्रान्त के आसपास हैं, जहाँ यह जाति पहले पहल पहुँचा था।
पंजाब से यह जाति दिल्ली आई, दिल्ली से अजमेर तथा सौराष्ट्र पहुँची,
और यहाँ से इसने वल्लभीपुर के सम्पूर्ण भू क्षेत्र पर अपना अधिकार स्थापित
किया। जब इनका अधिकार इस क्षेत्र पर स्थापित हो गया, तब इस क्षेत्र का
नाम वल्लभीपुर से परिवर्तित होकर 'गुजरात' पड़ा।
जेनरल कनिंघम के उपर्युक्त मत से ऐसा ज्ञात होता है कि यह जाति विदेशी
थी और पंजाब प्रान्त से होती हुई भारत में आई। लेकिन श्री के० एम० मुन्शी
आदि विद्वानों ने इस जाति की उत्पत्ति भारतीय राजपूतों से मानी है, जिसके
प्रमाण में इन विद्वानों ने ताम्रपत्रों तथा ६ ठी शताब्दी की रचनाओं का
उल्लेख किया है।१
राजपूताने के भाट भी 'गूजरों' की उत्पत्ति राजपूतों से ही मानते हैं। आज
भी गूजरों में पँवार, चौहान तथा चन्देल आदि राजपूतों के, अनेक गोत्र तथा
गूजरगौड़, बड़ गूजर तथा गूजर पठान आदि गूजरों के गोत्र राजपूतों, ब्राह्मणों
और मुसलमानों में पाये जाते हैं। ऐतिहासिक दृष्टि से इस जाति के सम्बन्ध में
जो सामग्री हमें प्राप्त है और जिसके आधार पर इनकी उत्पत्ति के विषय में
विचार किया गया है, वह विशेष प्रामाणिक ज्ञात होता है। सम्भव है इस जाति
१-द ग्लोरी दैट वाज गुर्जर देश-के० एम० मुन्शी पृ०-८ ।