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आयुर्वेद दर्शन

Ayurveda Darshan

by वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक

Source: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (origin)

DevanagariHindipublished235 pages
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पारीक्षिमौद्रस्य का आत्मवाद

२१

से युक्त होता है तब ( शब्दरागान् श्रोत्रमस्य जायते विदितान्तमनः । रूपरागात्तथा चक्षुरार्धं प्राण जिघृक्षया ॥ ) उक्त इंद्रियों की रचना होती है ।

उक्त इंद्रियों में बुद्धि की 'वृत्तियों' का संचार रहता है । इन वृत्तियों को ही 'सत्त्व' अथवा 'मन' कहते हैं । 'एकैकाधिक युक्तानि खादीना भिद्रियाणितु । पंच कर्मानुमेयानि येभ्यो बुद्धिः प्रवर्तते ।' इसका आशय भी यही है । कुछ संप्रदाय इन वृत्तियों को इंद्रियों का परिणाम कहते थे किंतु आत्मवादी इनको आत्मा का ही गुण समझते हैं । जो संप्रदाय चेतना को इन वृत्तियों का परिणाम कहते थे वे इन वृत्तियों को अर्थात् सत्त्व को ही 'चेतस्' कहते थे । किंतु आत्मवादियों का कथन है कि सत्त्व, अचेतन है; उसको चेतनाधातु से चेतना प्राप्त होती है । चेतना प्राप्त होने पर ही सत्त्व स्वकार्य में प्रवृत्त होता है ।

मन के अस्तित्व और रूप के विषय में यह कहा गया है कि:—

लक्षणं मनसोज्ञानस्याभावोभाव एव वा ।
सतिद्यात्मेंद्रियाथार्थानां सन्निकर्षे न वर्तते ॥
वैवृत्त्यान्मनसो ज्ञानं सान्निध्यात्तच्च वर्तते ।
अणुत्वमथचैकत्वं द्वौ गुणौ मनसः स्मृतौ ॥

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२२

आयुर्वेद-दर्शन

अर्थात् ज्ञान का न होना अथवा होना ही मन के अस्तित्व का लक्षण है। यह तो नित्य का अनुभव है कि जब अपना चित्त किसी गंभीर विचार में मग्न रहता है तब अपने को पास में रखी हुई घड़ी की टिक २ सुनाई नहीं देती और न इस बात का ही ज्ञान होता है कि सामने से गुजरी हुई व्यक्ति कौन थी। वास्तव में देखा जाय तो घड़ी के आवाज की लहरें उस समय भी अपने श्रवणगत द्रवों तक पहुंचती रहती हैं और सामने गुजरनेवाली व्यक्ति का प्रतिबिंब भी नेत्रगत आदर्श पटल पर पड़ता है सिवाय आत्मा का साश्रिध्य रहता ही है फिर भी उस समय उन इंद्रियों में चित्त की वृत्तियों का अभाव रहने के कारण न तो टिक २ सुनाई देती है और न व्यक्ति ज्ञान होता है। किंतु जब मन की वृत्तियाँ ज्ञानेंद्रियों में संचार करती रहती हैं तब ज्ञान होता है। यहाँ आत्मवादियों का यह कथन भी ध्यान में रखना चाहिये कि:—

आत्माज्ञः करणैर्योगाद्ज्ञानं तस्य प्रवर्तते ।

करणानामवैकल्यादयोगाद्भ्रान्तवर्तते ॥

पश्यतोऽपि यथाऽऽदृशे संक्षिप्ते नास्ति दर्शनम् ।

तत्त्वं जले वा कलुषे चेतस्युपहते तथा ॥

सारंश ज्ञान के न होने और होने पर से मन का अस्तित्व सिद्ध होता है।

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पारीक्षिमौद्रव्य का आत्मवाद

२३

यह मन, आत्मा के सहस्र महान् अर्थात् सर्व-देह-व्यापक नहीं है, अपितु 'अणु' है। अणु होने के कारण वह एक ही समय में समस्त इन्द्रियों में सञ्चार नहीं कर सकता। जैसा कि उक्त उदाहरणों पर से भी सिद्ध होता है। उसी तरह वह एक है। इस पर यदि यह कहा जाय कि 'किसी फल को खाने के समय उसके स्पर्श, रूप, रस, गंध, कुरमुर शब्द आदि का जो ज्ञान होता है वह उसके महान् अथवा अनेक होने का परिचायक है' तो उसका उत्तर यह है कि मन अणु और एक होते हुए भी बड़ा चंचल है। उसकी चपलता के कारण ही उक्त सब प्रकार का ज्ञान एक ही समय में होने का भास होता है।

मन के कार्यों के विषय में यह कहा गया है कि:—

चिंत्यं विचार्यमूढांच ध्येयं संकल्प्यमेवच ।

यत्किंचिन्मनसांज्ञेयं तत्सर्वं ह्यर्थसंज्ञकम् ॥

इंद्रियाभिग्रहःकर्म मनसः स्वस्थ निग्रहः ।

ऊहोविचारश्रुततः परं बुद्धिःप्रवर्तते ॥

इंद्रियेणेंद्रियाथो हि समनस्केन गृह्यते ।

कल्प्यते मनसाप्यूर्ध्वं गुणतो दोषतो यथा ॥

जायते विषये तत्र या बुद्धिनिश्चयात्मिका ।

व्यवस्यति तथा वक्तुं कर्तुं वा बुद्धिपूर्वकम् ॥

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२४

आयुर्वेद-दर्शन

सारंश निश्चय रहित ज्ञान को मन का कार्य कहते हैं। किंतु जो ज्ञान निश्चित रहता है वह बुद्धि का कार्य है। बुद्धि के विषय में यह भी कहा गया है कि—

या यदिन्द्रियमास्थाय जंतोर्बुद्धिः प्रवर्तते ।
याति सा तेन निर्देशं मनसा च मनोभवा ।
भेदात्कार्यैन्द्रियार्थानां बन्धो वै बुद्धयःस्मृताः ।
आत्मैन्द्रियमनोऽर्थानामैकैका सन्निकर्षजा ॥
अंगुल्यंगुष्ठतलजस्तंत्री वीणानखोद्भवः ।
दृष्टःशब्दो यथा बुद्धिर्दृष्टा संयोगजा तथा ॥

अंत में आत्मवादी कहते हैं कि—

बुद्धीन्द्रियमनोर्थानां विद्याद्योगधरंपरम् ।
चतुर्विंशक इत्येष राशिः पुरुषसंज्ञकः ॥
रजस्तमोभ्यां युक्तस्य संयोगोऽयमनंतवान् ।
ताभ्यांनिराकृताभ्यांनु सत्त्वबुद्ध्या निवर्तते ।

अर्थात् उक्त बुद्ध्यादि भावों का योगधर वह आत्मा ही है। जो इनके सब के परे रहता है। इस तरह चोवीस धातुओं के इस राशि को समुदायात्मक, हेतुज अथवा मोहेच्छाद्वेष कर्मज पुरुष कहते हैं। संसार में जो अनंत पुरुष (प्राणी) दिखाई देते हैं उसका कारण रजोगुण व तमोगुण इनके न्यूनातिरेक से उक्त समुदाय के होने वाले अनंत प्रभेद हैं।

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पारौक्षिमौद्रूल्य का आत्मवाद

२५

जब उक्त गुणद्वयों का बाहुल्य कम होता है और सत्य की अभिवृद्धि होती है तब यह संयोग नष्ट होता है । सारांशः—

अव्यक्ताद्व्यक्ततांयाति व्यक्तादव्यक्ततां पुनः
रजस्तमोभ्यामाविष्टश्चक्रवत् परिवर्तते ॥

अर्थात् मुष्ट्यारंभ में अव्यक्त आत्मा से ही समस्त जगत् व्यक्त होता है और प्रलय के समय पुनश्च अव्यक्त में ही समाजाता है । और यह परिवर्तन चक्र के सदृश वारंवार होता रहता है ।

मालूम होता है कि आत्मवादी, केवल आत्मा के अस्तित्व और उसके पुरुषरोगोत्पादकत्व को सुप्रतिष्ठित करने के लिये ही आयुर्वेद क्षेत्र में प्रविष्ट हुए । इनका आयुर्वेद के प्रायोगिक क्षेत्र में तनिक भी प्रवेश नहीं है और वह संभव भी नहीं था । क्योंकि इनके आत्मवाद में वातपित्तश्लेष्माओं का कहीं भी उल्लेख नहीं है और इनको उनका अस्तित्व भी मान्य नहीं है । यही कारण है कि पारौक्षिमौद्रूल्य वातकलाकलीयपरिषद् में जिस में कि वातपित्तश्लेष्माओं के तात्विक रूप पर विचार हुआ; अनुपस्थित थे । आत्रेयभद्रकाषीयसपरिषद् में भी ये अनुपस्थित थे ।

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शरलोमा का सत्त्ववाद

शरलोमाः—पारीक्षिमौद्रल्य के बाद शरलोमा ने कहा किः—

शरलोमातुनेत्याह न ज्ञात्मात्मानमात्मना ।

योजयेद्वयाधिभिर्दुःखैर्दुःखद्वेषी कदाचन ॥

रजस्तमोभ्यांतुमनः परीतं सत्त्वसंज्ञकम् ।

शरीरस्य समुत्पत्तौ विकाराणांच कारणम् ॥

अर्थात् आत्मा को शरीर का तथा रोगों का उत्पादक कहना उचित नहीं है; क्योंकि दुःखद्वेषी आत्मा अपने आपको कदापि दुःख में नहीं डाल सकता। वास्तव में सत्त्व—संज्ञक मन ही जब रजोगुण तमोगुणों से व्याप्त होता है तब वह शरीर तथा रोगों की उत्पत्ति में कारण बन जाता है।

इस पर से ज्ञात होता है कि सत्त्ववादी आत्मा का अस्तित्व स्वीकार करते हुए भी उसको कर्ता नहीं मानते बल्कि उदासीन मानते हैं। इस तरह एक को उदासीन व दूसरे को कर्ता मानना यह भी व्यक्त करता है कि सत्त्ववादी, आत्मा व सत्त्व दोनों को अनादि मानते हैं।

उक्त श्लोकद्वय पर से सत्त्ववाद के विषय में इससे अधिक अनुमान नहीं होसकता और यह भी निश्चय पूर्वक

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शर्लोम' का सत्त्ववाद

२७

नहीं कहा जा सकता कि चरकसंहिता में सत्त्ववादीविषयक और कौन २ अंश हैं। किंतु साधारणतः यह प्रतीत होता है कि जिस बात का स्पष्टीकरण चरकसंहिता में उपलब्ध नहीं होता उसका सुश्रुतसंहिता में उपलब्ध होता है। सुश्रुतसंहिता में जिस पंचविशतितत्वात्मक स्मृष्टि-विज्ञान का व प्रकृति-पुरुषवाद का उल्लेख है वह हमारी राय में सत्त्ववाद का ही उत्तर रूप है। अतः हम उसको यहाँ उद्धृत करते हैं। उसमें यह कहा गया है कि:—

सर्वभूतानां कारणमकारणं सत्वरजस्तमोलक्षण-
मष्टरूपमखिलस्य जगतः संभवहेतुरन्यत्कं नाम, तदेकं
बहूनां क्षेत्रज्ञानामविद्यानं समुद्र इवोदकानां भावानाम्।

इसमें 'अन्यत्क' शब्द से त्रिगुणात्मिका प्रकृति की 'साम्यावस्था' का उल्लेख है। इस अन्यत्क को एक माना गया है और क्षेत्रज्ञों को बहुत। किंतु यह स्पष्ट नहीं है कि क्षेत्रज्ञों का यह बहुत्व, स्वरूपतः है या उपाधितः। आत्मवादी, आत्मा को 'अन्यत्क' कहते हैं और उस अन्यत्क से बुद्धि का प्रादुर्भाव बताते हैं, पर ये आत्मा या क्षेत्रज्ञ से अन्यत्क प्रकृति का पैदा होना स्वीकार नहीं करते अतः वे सृष्टयुत्पत्ति का विवेचन अन्यत्क प्रकृति से आरंभ करते हैं। जैसा कि:—

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आयुर्वेद-दर्शन

तस्मादव्यक्तान्महानुत्पद्यते तत्सिंह एव, तत्सिंहाश्च महत्-स्वसिंह एवाहंकार उपद्यते । स च त्रिविधो वैकारिक-स्वैजसोभूतादिरिति ।

इस पर से यह ज्ञात होता है कि ये सत्य रज तम की साम्यावस्था को 'अव्यक्त' और वैषम्यावस्था को 'महत्' अर्थात् बुद्धि कहते हैं । इन के मत से गुणों में विषमता पैदा होना ही अव्यक्त से बुद्धि का पैदा होना है । आत्मवादी, साम्यावस्थ सत्वरजतमें को आत्मा के गुण कहते हैं और उनकी साम्यावस्था का 'अव्यक्त' शब्द से अलग उल्लेख नहीं करते । बाकी महत् अथवा बुद्धि शब्द से आत्मवादी भी त्रिगुणों की वैषम्यावस्था को संबोधित करते हैं । त्रिगुणात्मिका बुद्धि से त्रिगुणात्मक अहंकार का पैदा होना दोनों को स्वीकार है । आगे इनका यह कथन है कि:-

तत्र वैकारिकादहंकारात्तैजस् साहाय्यात् तल्लक्षणान्येव एकादशेन्द्रिया ण्युत्पद्यंते । तद्यथा श्रोत्रत्वक् चक्षुर्जिह्वा घ्राणवाक् हस्तोपस्थ पायूपाद् मनसासीति । तत्र पूर्वाणि पंच बुद्धीन्द्रियाणि, इतराणि पंच कर्मेन्द्रियाणि उभय्यात्मकं मनः । भूतादेरपितैजस साहाय्यात्तल्लक्षणान्येव पंचतन्मात्राण्युत्पद्यंते । तद्यथा शब्द-तन्मात्रं, स्पर्शतन्मात्रं, रूपतन्मात्रं, रसतन्मात्रं, गंधतन्मात्रमिति । तेषां विशेषाः शब्दस्पर्शरूपरसगंधाः । तेष्यो भूतानि व्योमानिला-

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शारलोमा का सत्त्ववाद

२९

नलजलोऽर्थः । एवमेषांतत्त्वचतुर्विंशतिवर्ण्यारूढ्याता । तत्र बुद्धी-
द्वियाणां शब्दादयो विषयाः । कर्मेन्द्रियाणां यथासंख्यं वचनान-
दानानंद विसर्ग विहरणानि ।

इसमें वैचारिक व तैजस गुणाधिक अहंकार से जिन
इंद्रियों का पैदा होना बतलाया है वे भौतिक नहीं हैं अपितु
ज्ञान के प्रकार हैं । उसी तरह भूतादि व तैजस गुणाधिक
अहंकार से जिन तन्मात्राओं की पैदाइश बतलाई गई है
वह भी ज्ञान के प्रकार हैं । इनके मत से आगे यह ज्ञान
ही शब्दादि गुणों में और ये गुण भी आकाशादि द्रव्यों
में परिणत होते हैं । तत्पश्चात् भौतिक इंद्रिय भी पैदा होते
हैं । जो संप्रदाय ज्ञान को प्रधान मानते हैं और ज्ञान से ही
कर्तृत्व का उदित होना स्वीकार करते हैं उनकी भाषा इसी
प्रकार की होती है । आत्मवादी भी इस मत के हैं पर उनमें
व इन में भेद यह है कि ये त्रिगुणात्मक अहंकार में गुणोत्पन्न
दृष्ट्या दो प्रकार करके एक से एकादश इंद्रियों की व
दूसरे से शब्दादि तन्मात्राओं की उत्पत्ति का विधान करते
हैं । किंतु आत्मवादी, अहंकार के दो भेद नहीं करते और
आकाशादि के उत्पत्ति के पूर्व तन्मात्राओं का अस्तित्व
स्वीकार नहीं करते । इस मत भेद का स्पष्ट चित्र उनके प्रकृति
संज्ञक आठ तत्वों के उल्लेख में भी दिखाई देता है । क्योंकि
अष्टप्रकृतियों के विषय में इनका यह कथन है कि:—

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आयुर्वेद-दर्शन

अन्यत्कं, महान्, अहंकारः पंचतन्मात्राणि चेत्यष्टौप्रकृतयः ।

अर्थात् ये पंचतन्मात्राओंका प्रकृति संज्ञक तत्त्वों में और आकाशादिकों का (शेषाः षोडशविकाराः) विकारों में उल्लेख करते हैं । किंतु आत्मवादी, ठीक इसके विपरीत अर्थात् आकाशादिकों को प्रकृतिसंज्ञक और शब्दादि गुणों को विकृतिसंज्ञक मानते हैं। दार्शनिकों ने इस मतभेद पर परदा डालने का यत्न किया है पर हमारी राय से इसको छिपाना आवश्यक नहीं है।

तत्र सर्व एव अचेतन एष वर्गः । पुरुषः पंच विशतितमः ।
सच्च कार्यकारणयुक्त श्वेतयिता भवति । सत्यप्यचैतन्ये प्रधानस्य
पुरुषस्य कैवल्यार्थं प्रवृत्ति मुपदिशति क्षीरादींश्च हेतूनुदाहरति ।

अब कहते हैं कि अष्ट प्रकृति और षोडशविकार सहित चौबीस तत्त्वों का यह वर्ग 'अचेतन' है । और पुरुष पचाँसवों है । वह, ( 'चेतनावान्' होने के कारण ) विकार और प्रकृति-संज्ञक तत्त्वों का 'चेतयिता' है । पर तावन्मात्र से उसको कर्ता नहीं कहा जा सकता क्योंकि सारा कर्तृत्व, अन्यत्क प्रकृति को ही है । सिर्फ इस प्रकृति को जोकि अचेतन है; चेतना धातु के साश्रिध्यमात्र की आवश्यकता है । जिस तरह बच्चे के साश्रिध्य से माता के स्तन में दुग्ध का 'ओहा' आता है उसी तरह क्षेत्रज्ञ के साश्रिध्य मात्र से अन्यत्क प्रकृति में तत्त्वोदय होता है ।

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शरलोमा का सत्त्ववाद

३१

इस कथन की पुष्टि शरलोमाने इन शब्दों में की है। कि दुःखद्वेषी आत्मा अपने आपको कदापि दुःख में नहीं डाल सकता; सत्त्व ही सब कुछ करता धरता है। किंतु इस पर यह सवाल पैदा होता है कि जब कि आत्मा स्वयं होकर कुछ नहीं करता तो बंध मोक्ष का किसके साथ संबंध है ? सर्ग प्रलय का यह चक्र क्यों चलाया जा रहा है ? इसपर कहते हैं कि यह सब कुछ पुरुष के 'कैवल्यार्थ' अर्थात् मोक्ष के हेतु हो रहा है। अस्तु।

अत उर्ध्वं प्रकृति पुरुषयोः साधर्म्यं वैधर्म्यं न्वाख्यास्यामः। तद्यथा उभावप्यनादी, उभावप्यनंतौ, उभावप्यलिङ्गौ, उभावपिनित्यौ, उभावप्यपरी उभौ च सर्वगताविति। एका तु प्रकृतिरचेतना, त्रिगुणा, बीजधर्मिणी, प्रसवधर्मिणी अमध्यस्थधर्मिणी चेति। बहवस्तुपुरुषाश्चेतनावंतो, अगुणा, अबीजधर्मिणो, अप्रसवधर्मिणो मध्यस्थधर्मिणश्चेति।

इसमें प्रकृति पुरुष दोनों को अनादि कहा गया है। मालूम होता है कि चरक संहितांतर्गत " आदिनास्त्यात्मनः क्षेत्रपारंपर्यमनादिकम् । अतस्तयोरनादित्वात्किंपूर्वमिति नोच्यते " ( च. शा. अ. १ ) इस विधान का संबंध इसी प्रकृति पुरुष वाद अर्थात् ही सत्त्ववाद से है। ये असंख्य आत्माओं को स्वीकार करते हैं पर उनको सर्वगत भी कहते हैं। सुश्रुत संहितामें इस मत को 'परमत' इति

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३२

आयुर्वेद-दर्शन

एकें भाष्ये ’ कहकर इसका निषेध किया गया है और यह कहा गया है कि:—

नचायुर्वेदेषूपदिश्यंते सर्वगताः क्षेत्रज्ञा नित्याश्च असर्व-
गतेषुच क्षेत्रज्ञेषु पुरुषरूपापकान् हेतुनुदाहरंति । आयुर्वेदेत्स-
सर्वगताः क्षेत्रज्ञानित्याश्च तिर्यग्ग्येनि मानुष देवेषु संचरंति
धर्माधर्म निमित्तम् । त एतेऽनुमानग्राह्याः परमसुक्ष्मा श्रेतना-
वंतः शाश्वता लोहित रेतसोः संज्ञिपाते ष्वभिन्व्यज्यते ।

सारंश इसमें क्षेत्रज्ञों को ‘ असर्वगत ’ माना है और इसी को आयुर्वेदसम्मत कहा गया है । यह तो स्पष्ट ही है कि उक्त मत चरकसंहितांतर्गत आत्मवाद, सत्ववाद और षड्धातुवाद को स्वीकृत नहीं है पर इसमें भी संदेह नहीं है कि इस मतका आयुर्वेदमें बहुत प्राचीन समय से प्रचार है । क्योंकि इसका निषेध आत्मवादियोंने समाध्यवस्थापन्न मनका उदाहरण देकर किया है । सुश्रुतसंहिता में इसी के आगे यह कहा गया है कि ‘ यतोऽभिहितं पंचमहाभूत शरीरि क्षमवायः पुरुष इति स एव कर्मपुरुषश्रिकित्साधिकृतः ’ । इस परसे दो तर्क हो सकते हैं; एक यह कि षड्धातुवादियों के अंतर्गतही यह एक संप्रदाय था और दूसरा यह कि धातुपंचक वादियों मेंहि एक संप्रदाय ऐसा था जोकि परिणाम स्वरूप पुरुषों को असर्वगत मानता था । इसमें पहिला अधिक संभवनीय है । सिवाय यह भी संभव है कि आत्मा को असर्वगत मानने वाले उनका बहुत्व स्वरूपतः मानते थे ।

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शरलोमा का सत्ववाद

३३

सत्ववादियों का अथवा प्रकृतिपुरुषवादियों का मुख्य सिद्धांत यह है कि:—

‘ तत्र कारणानुरूपं कार्यमिति कृत्वा सर्वं एवैते विशेषाः सत्त्वरजस्तमोमया भवन्ति, तद्वजन्तत्वात्तन्मयत्वात्तद्गुणा एव पुरुषा भवन्ति ’ ।

‘ कार्य सर्वदा कारण के अनुरूप होता है ’ तदनुसार आकाशादि धातु सत्त्वरजस्तमोमय हैं और कर्म पुरुष भी तद्गुण ही हैं क्योंकि इनकी अभिव्यक्ति इन गुणों से होती है और इनमें गुणों के पसार के अतिरिक्त कुछ नहीं है ।

सुश्रुत संहिता में इस मत को ‘ इति एकं भाष्यते ’ अर्थात् परमत बतलाया है । आयुर्वेद के प्रायोगिक क्षेत्र में आत्मवाद के सद्दश इसका भी अधिक प्रवेश नहीं है ।

शरलोमा, रसपरिषद् में और वातकलाकलीय परिषद् में उपस्थित नहीं थे ।

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वायोंविद का, रसवाद और त्रिधातुसिद्धांत.

राजार्षि वायोंविदः—शरलोमा के प्रति वायोंविद ने कहा कि:—

वायोंविदस्तु नेत्याह न ह्येकं कारणं मनः ।
नतं शरीरं शारीरं रोगा न मनसः स्थितिः ॥

अर्थात् सत्त्व को पुरुषरोगोत्पादक कहना सचित नहीं है । क्योंकि शरीरनिरपेक्ष सत्त्व कुछ भी नहीं कर सकता । सिवाय शारीररोग, शरीर ( वातपित्तश्लेष्मा ) के बिना हो ही नहीं सकते और ना ही सत्त्व की स्थिति हो सकती है ।

जिस तरह मौद्रल्य आत्मा को और शरलोमा सत्त्व को पुरुष-रोगोत्पादक कहते हैं उसी तरह वायोंविद भी शरीर को पुरुषरोगोत्पादक कहते हैं । इस तरह यज्ञः पुरुषीय परिषद् में क्रमशः आत्मा, सत्त्व और शरीर इस त्रयी के नितांत समर्थको का उल्लेख किया जाना आयुर्वेद दर्शन के अंतिम निर्णय पर प्रकाश डालता है । आगे इस विषय में कहा ही जायगा अस्तु ।

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वायोंविद का रसवाद और त्रिधातुसिद्धांत

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सत्त्ववादी, सत्त्व को ही मानसिक और शारीर रोगों का जनक कहते हैं। क्योंकि उनके मत से सत्त्व ही मन का और शरीर का जनक है। किंतु वायोंविद का कथन है कि शरीर के बिना सत्त्व की स्थिति ही नहीं है अर्थात् सत्त्व, शरीर का परिणाम है। मानसिक रोगों में यद्यपि सत्त्व कारण है तथापि शरीरनिरपेक्ष सत्त्व उनको भी पैदा नहीं कर सकता। और शारीर रोग तो बिना शरीर के पैदा हो ही नहीं सकते; उनमें सत्त्व का कुछ भी अधिकार नहीं है। सारांश जब कि शरीर मानस रोगों का तथा सत्त्व का भी जनक शरीर है तब शरीर को ही सत्त्वोत्पादक और रोगोत्पादक कहना उचित है।

इस विवाद पर से यह सुस्पष्ट हो जाता है कि सत्त्व-वादी, सत्त्व को शरीर का जनक कहते थे तो ठीक उसके विपरीत शरीरवादी, शरीर को सत्त्व का जनक कहते थे।

हम आगे चलकर देखेंगे कि वायोंविद, अमीपोम लोकपक्षीय त्रिधातु-सिद्धांतवादी हैं। उनकी दृष्टि से शरीर त्रिधातुओं का बना हुआ है और सत्त्व या चेतना भी त्रिधातुओं का ही परिणाम है। सारांश त्रिधातु ही पुरुष व रोग को पैदा करते हैं। इनकी भाषा में 'शरीर' शब्द त्रिधातुओं का वाचक होकर 'पुरुष' शब्द प्राणी अथवा सचेतन सृष्टि का वाचक है। इस तरह सिद्धांत पक्ष में उनका यह कथन है कि त्रिधातुओं से

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आयुवद-दर्शन

सचेतन स्मृष्टि पैदा होती है। फिर भी यज्ञः-पुरुषीय-पारिषद् में उन्होंने 'रस' को पुरुषरोगोत्पादक कहा। जैसा कि:—

रसजानितु भूतानि व्याधयश्च प्रुथग्विघ्नाः।

आपो हि रसवत्यस्ताः स्मृता निर्वृत्ति हेतवः ॥

अर्थात् समस्त प्राणी और उनकी व्याधियाँ 'रस' से पैदा होती हैं। रस जलो में रहता है अतः जलों को भी सचेतन स्मृष्टि के उत्पत्ति में कारण कहते हैं।

वायोंविद् के इस रस को जानने के पूर्व यह स्वीकार करना होगा कि यह रस उनके त्रिधातु-सिद्धांत की ही कोई वस्तु है। इस दृष्टि से देखा जाय तो आर्तविक जलों में रहनेवाला यह रस वही है जिसको श्रुतियों में 'सोम' शब्द से संबोधित किया है। वैदिक ऋषि, सचेतनस्मृष्टि की उत्पत्ति का संबंध सामान्यतः आर्तविक जलों के साथ प्रस्थापित करते ही थे। क्योंकि जहां आर्तविक जलों की संभावना रहती है वहां सचेतन स्मृष्टि की भी संभावना रहती है फिर भी उनका लक्ष्य जलगत उस 'धर्म' पर था जो कि आर्तविक जलों के घटक में प्रधान घटक है।

इस विषय में “सा प्रथमा संस्कृतिर्विश्ववारा स प्रथमो-भिन्नोऽवरुणोऽअग्निः।” (यजु० अ० ७ मं. १४) यह मंत्र मन्त्रीय है। इसमें यह कहा गया है कि सोम की विश्व

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वायोविद् का रसवाद और त्रिधातु सिद्धान्त

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( सचेतन ) रूप-धारिणी वह ( आर्तविक जलरूपा ) पहिली संस्कृति है जिसमें ( घटक के रूप में ) सोम, प्रधान होकर मित्र, वरुण और अग्नि भी हैं। सारांश सचेतन स्मृति को पैदा करनेवाला आर्तविक जल जिन घटकों का मिश्रण है उनमें सोम ही प्रधान होकर सचेतन स्मृति को पैदा करने के पूर्व आर्तविक जलों को पैदा करना उसका पहिला संस्कार है। इस सोम को ही ‘ अदभ्यः संश्रुतः प्रथिव्यैरसाच्छ विश्वकर्मणः समवर्तताम्रे ’ ( यजु० अ० ३१ मं० १७ ) इस मंत्र में ‘ रस ’ शब्द से संबोधित किया है। ( आगे प्रजापतिवाद के विवेचन के समय सोम तथा जलों पर हम अधिक विचार करेंगे )

त्रिधातु-सिद्धान्तवादी वायोविद् की दृष्टि से भी आर्तविक जल, वायु ( मित्र वरुण ) अग्नि और सोम इनका अर्थात् त्रिधातुओं का ही मिश्रण है। और जलगत सोम को ही वे ‘ रस ’ शब्द से संबोधित करते हैं। यद्यपि सिद्धान्त पक्ष में वे वायु-अग्नि-सोम इस त्रयी को पुरुषरोगोत्पादक कहते हैं तथापि यहां रसवाद का समर्थन करके उन्होंने यह व्यक्त किया है कि अचेतन द्रव्यों को सचेतन द्रव्यों में संगठित करनेवाला धर्म मुख्यतः जलगत रस अर्थात् सोम ही है।

उक्त रस विषयक मत अग्नीपोमलोक-पक्षियों का है। पंचात्मक लोक पक्षियों में भी कुछ उक्त मत को स्वीकार करते

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३८

आयुवेद-दर्शन

थे जैसा कि “ सौम्याः खलवापोऽन्तरिक्ष प्रभवतः प्रकृति शीता लघ्व्यश्चान्यत्करसाश्च । ” ( च. सू. अ. २६ ) इसपर से व्यक्त होता है। इसमें यद्यपि आरंभिक जलों का प्रधानता से उल्लेख है तथापि उनको ‘अन्यत्क रस’ और सोमात्मक कहा ही है। किंतु कुछ जो कि सोम धर्म का अस्तित्व स्वीकार नहीं करते थे; रस को आप्यगुण और जिह्वा वैषयिक भाव (अर्थात् व्यक्त रस) कहते थे जैसाकि ‘आकाशपवनदहनतोयभूभिषु यथा संख्येमकोत्तरपरिगुद्धाः शब्दस्पर्शरूपरसगंधाः; तस्मादाप्यो रसः ( सु. सू. ३० अ० ४२ ) और “ एक एव रस इत्युवाच भद्रकाप्यो यं तं पंचानामिन्द्रियार्थानामन्यतमं जिह्वावैषयिकं भावमाचक्षेत कुशलाः स पुनरुदकादनन्य इति ” । ( च. सू. अ. २६ ) इन विधानों पर से सिद्ध होता है।

उक्त रस विषयक मतभेद यहाँ समाप्त नहीं हुआ। क्योंकि इस रस से सचेतन सृष्टि, जिस क्रम से आरंभ होती है उसमें भी एतन्मूलक मतभेद दिखाई देता है। अतः अब उस पर विचार करें।

रसजन्य सचेतन घटक.

पंचात्मकलोक पक्षीय, चाहे फिर वे सोमसंज्ञक अन्यत्क रस के पक्षपाती हों अथवा आप्यगुण जिह्वा वैषयिक रस के; इस मूलभूत रस का आकाशादिकों के संसर्ग से सर्वे प्रथम मूर्तियों में और पश्चात् मधुर, अम्ल, लवण, तिक्त, कटु, कषाय इन छः आस्वादों में परि-

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वायौविद का रसवाद और त्रिधातु सिद्धान्त

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गत होना स्वीकार करते हैं। जैसा कि 'तास्वंतंरिद्वाद्भ्रज्य-
मानाभ्रद्वाष्ट्र पंचमहाभूतगुणसमन्विता जंगमस्थावराणां भूतानां
मूर्तिरिभ्रीणयंति यासुमूर्तिषु षड्भिर्भूच्छीति रसाः। तेषां षण्णां
सोमातिरेकात् ( अन्यमते भूम्यंबुगुणबाहुल्यात् ) मधुगोरसः।
पृथिव्यभिभूयिष्ठत्वादम्लः। सलिखाभिभूयिष्ठत्वाक्ष्वणः। वायव
त्रिभूयिष्ठत्वाऋतुकः। वाय्वाकाशातिरेक्तत्वात्तिकः। पवन
पृथिव्यतिरेकात् कषाय इति। एवमेषां षण्णां रसानां षट्त्व-
मुपपन्नमुनातिरेक विशेषान्महाभूतानां भूतानामिव जंगमस्था-
वराणां नानावर्णाकृतिविशेषाः। षड्भूतुकत्वाच्चकालस्य
उपपन्नो महाभूतानाम् ऊनातिरेक विशेषः। (च. सू. अ. २६)

यहाँ यह ध्यान में रखना चाहिये कि वर्षाजलगत रस
का पंचमहाभूतों के गुणों से संबंध होकर स्थावर जंगम
प्राणियों की जो 'मूर्तियाँ' पैदा होती हैं उनको पंचात्मक-
लोकपक्षीय, 'षड्सात्मक' कहते हैं अर्थात् उनकी दृष्टि से
'मूर्ति' शब्द उन सचेतन द्रव्यों का वाचक है जो स्थावर
जंगम प्राणियों के 'घटक' हैं। इन घटक द्रव्यों को वे छः
आस्वादों में विभक्त करते हैं। उनका कथन है कि उक्त मूर्ति
संज्ञक सचेतन आस्वाद, आर्तविकजलगत रस के साथ पंच-
महाभूतों के गुणों का संबंध होकर बने हुए हैं।

अभीषोम लोकपक्षीय भी सोमसंज्ञक रस से सर्व
प्रथम मूर्तियों का संगठित होना स्वीकार करते हैं। वैदिक

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आयुर्वेद-दर्शन

मत के अनुसार इन मूर्तियों ( विशेषतः सचेतन द्रव्यों ) के औषधि, अन्न, रेतस् और पुरुष ये चार प्रकार हैं जो कि क्रमशः पैदा होते हैं । आयुर्वेद में भिन्न २ दृष्टि से भिन्न २ प्रकार स्वीकार किये गये हैं । उदा० (१) दोष व देह, (२) औषधि (विहजितेबल) व पुरुष ( एनिमल ) और (३) गुणप्रसादाख्यधातु व द्रव्यप्रसादाख्यधातु । इनमें अन्न व रेतस् का इस लिये उल्लेख नहीं है कि पहिले में औषधि व पुरुष दोनों का समावेश है और दूसरे का द्रव्य प्रसादाख्यधातुओं में अंतर्भाव है ।

रस से सर्व प्रथम औषधि संज्ञक सचेतन द्रव्य पैदा होते हैं । ये अन्न व देह दोनों के घटक हैं । षड्रसवादी, इनको सामन्यतः ' दोष ' कहते थे और इनका तथा अन्न का भी वर्गीकरण मधुरादि छः आस्वादों में करते थे । किन्तु जिनका लक्ष्य गुर्वादि गुणों पर अधिक था वे उनके गुरुत्वादि प्रधान स्वभाव के अनुसार उनका २० गुणों में वर्गीकरण करते थे । और इसी हेतु से उनको सामान्यतः 'गुणप्रसादाख्यधातु,' ' शारीरधातुगुण ' ' धातुगुण ' अथवा ' आहार गुण ' कहते थे । आगे इन गुणप्रसादाख्यधातुओं को ओज, तेज, धातुप्रसाद इन तीन विभागों में अथवा ओज व तेज


१ जिन पदार्थों में दूषित होने का अर्थात सड़ने का धर्म हो उनकी यह संज्ञा है । अचेतन द्रव्यों में सड़ने का धर्म नहीं है ।