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आयुर्वेद दर्शन

आयुर्वेद दर्शन

Ayurveda Darshan

by वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक

Source: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (origin)

DevanagariHindipublished235 pages

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आयुर्वेद-दर्शन

अर्थात् ज्ञान का न होना अथवा होना ही मन के अस्तित्व का लक्षण है। यह तो नित्य का अनुभव है कि जब अपना चित्त किसी गंभीर विचार में मग्न रहता है तब अपने को पास में रखी हुई घड़ी की टिक २ सुनाई नहीं देती और न इस बात का ही ज्ञान होता है कि सामने से गुजरी हुई व्यक्ति कौन थी। वास्तव में देखा जाय तो घड़ी के आवाज की लहरें उस समय भी अपने श्रवणगत द्रवों तक पहुंचती रहती हैं और सामने गुजरनेवाली व्यक्ति का प्रतिबिंब भी नेत्रगत आदर्श पटल पर पड़ता है सिवाय आत्मा का साश्रिध्य रहता ही है फिर भी उस समय उन इंद्रियों में चित्त की वृत्तियों का अभाव रहने के कारण न तो टिक २ सुनाई देती है और न व्यक्ति ज्ञान होता है। किंतु जब मन की वृत्तियाँ ज्ञानेंद्रियों में संचार करती रहती हैं तब ज्ञान होता है। यहाँ आत्मवादियों का यह कथन भी ध्यान में रखना चाहिये कि:—

आत्माज्ञः करणैर्योगाद्ज्ञानं तस्य प्रवर्तते ।

करणानामवैकल्यादयोगाद्भ्रान्तवर्तते ॥

पश्यतोऽपि यथाऽऽदृशे संक्षिप्ते नास्ति दर्शनम् ।

तत्त्वं जले वा कलुषे चेतस्युपहते तथा ॥

सारंश ज्ञान के न होने और होने पर से मन का अस्तित्व सिद्ध होता है।