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आयुर्वेद दर्शन

आयुर्वेद दर्शन

Ayurveda Darshan

by वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक

Source: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (origin)

DevanagariHindipublished235 pages

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शरलोमा का सत्त्ववाद

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इस कथन की पुष्टि शरलोमाने इन शब्दों में की है। कि दुःखद्वेषी आत्मा अपने आपको कदापि दुःख में नहीं डाल सकता; सत्त्व ही सब कुछ करता धरता है। किंतु इस पर यह सवाल पैदा होता है कि जब कि आत्मा स्वयं होकर कुछ नहीं करता तो बंध मोक्ष का किसके साथ संबंध है ? सर्ग प्रलय का यह चक्र क्यों चलाया जा रहा है ? इसपर कहते हैं कि यह सब कुछ पुरुष के 'कैवल्यार्थ' अर्थात् मोक्ष के हेतु हो रहा है। अस्तु।

अत उर्ध्वं प्रकृति पुरुषयोः साधर्म्यं वैधर्म्यं न्वाख्यास्यामः। तद्यथा उभावप्यनादी, उभावप्यनंतौ, उभावप्यलिङ्गौ, उभावपिनित्यौ, उभावप्यपरी उभौ च सर्वगताविति। एका तु प्रकृतिरचेतना, त्रिगुणा, बीजधर्मिणी, प्रसवधर्मिणी अमध्यस्थधर्मिणी चेति। बहवस्तुपुरुषाश्चेतनावंतो, अगुणा, अबीजधर्मिणो, अप्रसवधर्मिणो मध्यस्थधर्मिणश्चेति।

इसमें प्रकृति पुरुष दोनों को अनादि कहा गया है। मालूम होता है कि चरक संहितांतर्गत " आदिनास्त्यात्मनः क्षेत्रपारंपर्यमनादिकम् । अतस्तयोरनादित्वात्किंपूर्वमिति नोच्यते " ( च. शा. अ. १ ) इस विधान का संबंध इसी प्रकृति पुरुष वाद अर्थात् ही सत्त्ववाद से है। ये असंख्य आत्माओं को स्वीकार करते हैं पर उनको सर्वगत भी कहते हैं। सुश्रुत संहितामें इस मत को 'परमत' इति