आयुर्वेद दर्शन
Ayurveda Darshan
by वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक
Source: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (origin)
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Read in contextवायोंविद का, रसवाद और त्रिधातुसिद्धांत.
राजार्षि वायोंविदः—शरलोमा के प्रति वायोंविद ने कहा कि:—
वायोंविदस्तु नेत्याह न ह्येकं कारणं मनः ।
नतं शरीरं शारीरं रोगा न मनसः स्थितिः ॥
अर्थात् सत्त्व को पुरुषरोगोत्पादक कहना सचित नहीं है । क्योंकि शरीरनिरपेक्ष सत्त्व कुछ भी नहीं कर सकता । सिवाय शारीररोग, शरीर ( वातपित्तश्लेष्मा ) के बिना हो ही नहीं सकते और ना ही सत्त्व की स्थिति हो सकती है ।
जिस तरह मौद्रल्य आत्मा को और शरलोमा सत्त्व को पुरुष-रोगोत्पादक कहते हैं उसी तरह वायोंविद भी शरीर को पुरुषरोगोत्पादक कहते हैं । इस तरह यज्ञः पुरुषीय परिषद् में क्रमशः आत्मा, सत्त्व और शरीर इस त्रयी के नितांत समर्थको का उल्लेख किया जाना आयुर्वेद दर्शन के अंतिम निर्णय पर प्रकाश डालता है । आगे इस विषय में कहा ही जायगा अस्तु ।