आयुर्वेद दर्शन
Ayurveda Darshan
by वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक
Source: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (origin)
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आयुवेद-दर्शन
थे जैसा कि “ सौम्याः खलवापोऽन्तरिक्ष प्रभवतः प्रकृति शीता लघ्व्यश्चान्यत्करसाश्च । ” ( च. सू. अ. २६ ) इसपर से व्यक्त होता है। इसमें यद्यपि आरंभिक जलों का प्रधानता से उल्लेख है तथापि उनको ‘अन्यत्क रस’ और सोमात्मक कहा ही है। किंतु कुछ जो कि सोम धर्म का अस्तित्व स्वीकार नहीं करते थे; रस को आप्यगुण और जिह्वा वैषयिक भाव (अर्थात् व्यक्त रस) कहते थे जैसाकि ‘आकाशपवनदहनतोयभूभिषु यथा संख्येमकोत्तरपरिगुद्धाः शब्दस्पर्शरूपरसगंधाः; तस्मादाप्यो रसः ( सु. सू. ३० अ० ४२ ) और “ एक एव रस इत्युवाच भद्रकाप्यो यं तं पंचानामिन्द्रियार्थानामन्यतमं जिह्वावैषयिकं भावमाचक्षेत कुशलाः स पुनरुदकादनन्य इति ” । ( च. सू. अ. २६ ) इन विधानों पर से सिद्ध होता है।
उक्त रस विषयक मतभेद यहाँ समाप्त नहीं हुआ। क्योंकि इस रस से सचेतन सृष्टि, जिस क्रम से आरंभ होती है उसमें भी एतन्मूलक मतभेद दिखाई देता है। अतः अब उस पर विचार करें।
रसजन्य सचेतन घटक.
पंचात्मकलोक पक्षीय, चाहे फिर वे सोमसंज्ञक अन्यत्क रस के पक्षपाती हों अथवा आप्यगुण जिह्वा वैषयिक रस के; इस मूलभूत रस का आकाशादिकों के संसर्ग से सर्वे प्रथम मूर्तियों में और पश्चात् मधुर, अम्ल, लवण, तिक्त, कटु, कषाय इन छः आस्वादों में परि-