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आयुर्वेद दर्शन

आयुर्वेद दर्शन

Ayurveda Darshan

by वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक

Source: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (origin)

DevanagariHindipublished235 pages

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आयुर्वेद-दर्शन

सारंश निश्चय रहित ज्ञान को मन का कार्य कहते हैं। किंतु जो ज्ञान निश्चित रहता है वह बुद्धि का कार्य है। बुद्धि के विषय में यह भी कहा गया है कि—

या यदिन्द्रियमास्थाय जंतोर्बुद्धिः प्रवर्तते ।
याति सा तेन निर्देशं मनसा च मनोभवा ।
भेदात्कार्यैन्द्रियार्थानां बन्धो वै बुद्धयःस्मृताः ।
आत्मैन्द्रियमनोऽर्थानामैकैका सन्निकर्षजा ॥
अंगुल्यंगुष्ठतलजस्तंत्री वीणानखोद्भवः ।
दृष्टःशब्दो यथा बुद्धिर्दृष्टा संयोगजा तथा ॥

अंत में आत्मवादी कहते हैं कि—

बुद्धीन्द्रियमनोर्थानां विद्याद्योगधरंपरम् ।
चतुर्विंशक इत्येष राशिः पुरुषसंज्ञकः ॥
रजस्तमोभ्यां युक्तस्य संयोगोऽयमनंतवान् ।
ताभ्यांनिराकृताभ्यांनु सत्त्वबुद्ध्या निवर्तते ।

अर्थात् उक्त बुद्ध्यादि भावों का योगधर वह आत्मा ही है। जो इनके सब के परे रहता है। इस तरह चोवीस धातुओं के इस राशि को समुदायात्मक, हेतुज अथवा मोहेच्छाद्वेष कर्मज पुरुष कहते हैं। संसार में जो अनंत पुरुष (प्राणी) दिखाई देते हैं उसका कारण रजोगुण व तमोगुण इनके न्यूनातिरेक से उक्त समुदाय के होने वाले अनंत प्रभेद हैं।