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आयुर्वेद दर्शन

आयुर्वेद दर्शन

Ayurveda Darshan

by वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक

Source: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (origin)

DevanagariHindipublished235 pages

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शर्लोम' का सत्त्ववाद

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नहीं कहा जा सकता कि चरकसंहिता में सत्त्ववादीविषयक और कौन २ अंश हैं। किंतु साधारणतः यह प्रतीत होता है कि जिस बात का स्पष्टीकरण चरकसंहिता में उपलब्ध नहीं होता उसका सुश्रुतसंहिता में उपलब्ध होता है। सुश्रुतसंहिता में जिस पंचविशतितत्वात्मक स्मृष्टि-विज्ञान का व प्रकृति-पुरुषवाद का उल्लेख है वह हमारी राय में सत्त्ववाद का ही उत्तर रूप है। अतः हम उसको यहाँ उद्धृत करते हैं। उसमें यह कहा गया है कि:—

सर्वभूतानां कारणमकारणं सत्वरजस्तमोलक्षण-
मष्टरूपमखिलस्य जगतः संभवहेतुरन्यत्कं नाम, तदेकं
बहूनां क्षेत्रज्ञानामविद्यानं समुद्र इवोदकानां भावानाम्।

इसमें 'अन्यत्क' शब्द से त्रिगुणात्मिका प्रकृति की 'साम्यावस्था' का उल्लेख है। इस अन्यत्क को एक माना गया है और क्षेत्रज्ञों को बहुत। किंतु यह स्पष्ट नहीं है कि क्षेत्रज्ञों का यह बहुत्व, स्वरूपतः है या उपाधितः। आत्मवादी, आत्मा को 'अन्यत्क' कहते हैं और उस अन्यत्क से बुद्धि का प्रादुर्भाव बताते हैं, पर ये आत्मा या क्षेत्रज्ञ से अन्यत्क प्रकृति का पैदा होना स्वीकार नहीं करते अतः वे सृष्टयुत्पत्ति का विवेचन अन्यत्क प्रकृति से आरंभ करते हैं। जैसा कि:—