आयुर्वेद दर्शन
Ayurveda Darshan
by वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक
Source: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (origin)
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आयुर्वेद-दर्शन
अन्यत्कं, महान्, अहंकारः पंचतन्मात्राणि चेत्यष्टौप्रकृतयः ।
अर्थात् ये पंचतन्मात्राओंका प्रकृति संज्ञक तत्त्वों में और आकाशादिकों का (शेषाः षोडशविकाराः) विकारों में उल्लेख करते हैं । किंतु आत्मवादी, ठीक इसके विपरीत अर्थात् आकाशादिकों को प्रकृतिसंज्ञक और शब्दादि गुणों को विकृतिसंज्ञक मानते हैं। दार्शनिकों ने इस मतभेद पर परदा डालने का यत्न किया है पर हमारी राय से इसको छिपाना आवश्यक नहीं है।
तत्र सर्व एव अचेतन एष वर्गः । पुरुषः पंच विशतितमः ।
सच्च कार्यकारणयुक्त श्वेतयिता भवति । सत्यप्यचैतन्ये प्रधानस्य
पुरुषस्य कैवल्यार्थं प्रवृत्ति मुपदिशति क्षीरादींश्च हेतूनुदाहरति ।
अब कहते हैं कि अष्ट प्रकृति और षोडशविकार सहित चौबीस तत्त्वों का यह वर्ग 'अचेतन' है । और पुरुष पचाँसवों है । वह, ( 'चेतनावान्' होने के कारण ) विकार और प्रकृति-संज्ञक तत्त्वों का 'चेतयिता' है । पर तावन्मात्र से उसको कर्ता नहीं कहा जा सकता क्योंकि सारा कर्तृत्व, अन्यत्क प्रकृति को ही है । सिर्फ इस प्रकृति को जोकि अचेतन है; चेतना धातु के साश्रिध्यमात्र की आवश्यकता है । जिस तरह बच्चे के साश्रिध्य से माता के स्तन में दुग्ध का 'ओहा' आता है उसी तरह क्षेत्रज्ञ के साश्रिध्य मात्र से अन्यत्क प्रकृति में तत्त्वोदय होता है ।